आश्रय शर्मा: दादा से मिली राजनीतिक विरासत को बचाने की चुनौती

आश्रय के राजनैतिक जीवन की शुरूआत बचपन से ही हो गई. दादा पंडित सुखराम राजनीति के चाणक्य रहे और परिवार में राजनीति का ही माहौल रहा, इसलिए बचपन से ही राजनीति की बातें सुनने और देखने को मिली. साथ ही दादा की कार्यशैली को देखकर काफी प्रभावित हुए.

News18 Himachal Pradesh
Updated: May 16, 2019, 4:40 PM IST
आश्रय शर्मा: दादा से मिली राजनीतिक विरासत को बचाने की चुनौती
आश्रय शर्मा मंडी से कांग्रेस प्रत्याशी हैं.
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Updated: May 16, 2019, 4:40 PM IST
हिमाचल प्रदेश की छोटी काशी मंडी सूबे की हॉट सीट है. यहां से कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है. यहां से भाजपा के मौजूदा सांसद रामस्वरूप शर्मा और आश्रय शर्मा में टक्कर हैं.

32 वर्षीय आश्रय शर्मा युवा तुर्क हैं और हिमाचल की राजनीति के चाणक्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम के पोते हैं.आश्रय शर्मा की शादी किक्रेटर गौतम गंभीर की कजिन से हुई है.



आश्रय के राजनैतिक जीवन की शुरूआत बचपन से ही हो गई. दादा पंडित सुखराम राजनीति के चाणक्य रहे और परिवार में राजनीति का ही माहौल रहा, इसलिए बचपन से ही राजनीति की बातें सुनने और देखने को मिली. साथ ही दादा की कार्यशैली को देखकर काफी प्रभावित हुए.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ आश्रय और उनके दादा सुखराम.


दादा से ही राजनीति में आने की प्रेरणा मिली
17.12.1986 को जन्मे आश्रय शर्मा 12वीं तक की शिक्षा डीपीएस आरके पुरम दिल्ली से हासिल की और उसके बाद यूके से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की. 22 वर्ष की आयु में आश्रय शर्मा ने राजनीति में कदम रख लिया. सबसे पहले एक कार्यकर्ता के रूप में शुरूआत की और बाद में मंडी जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने. इसके बाद प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव का दायित्व सौंपा गया और साथ में सराज विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी नियुक्त किया गया. 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में फिर से कांग्रेस में घर वापसी कर ली. अब कांग्रेस के टिकट पर मंडी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं.

आश्रय शर्मा.
दादा से मिली राजनीति में आने की प्ररेणा
आश्रय शर्मा बताते हैं कि उन्हें दादा पंडित सुखराम से राजनीति में आने की प्रेरणा मिली. दादा एक नेता के रूप में जिस तरह से काम करते थे, वह उन्हें काफी पसंद आया और उन्होंने ठान लिया कि दादा की तरह ही जनता की सेवा करनी है. उसी से प्रभावित होकर आश्रय ने राजनीति में कदम रखा और अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत कर डाली.

आश्रय शर्मा बताते हैं कि किसी जरूरतमंद की मदद करके उसकी आंखों से जो खुशी छलकती है, उसका आनंद ही कुछ और होता है. ऐसे ही लोगों की मदद करके उन्हें खुशियां पहुंचाना, उन्हें काफी अच्छा लगता है. साथ ही अधिक से अधिक लोगों से मिलना और उनके साथ समय बिताना भी काफी अच्छा लगता है.

पिता की राजनीति भी दांव पर
मंडी जिले में सुखराम का खासा प्रभाव माना जाता है. ऐसे में मुकाबला कांटे का होने वाला है. दरअसल, आश्रय के पिता अब भी भाजपा में ही हैं. उन्होंने भाजपा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया. दादा का राजनीतिक करियर तो पहले ही खत्म हो चुका है, लेकिन पिता का सियासत भी दांव पर हैं. वह मंडी सदर से भाजपा विधायक हैं और मजबूरन अपने बेटे के लिए प्रचार नहीं कर रहे हैं. आश्रय के पिता राज्यसभा सांसद के अलावा, प्रदेश में दो बार मंत्री भी रहे हैं.

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