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बर्थडे स्पेशल: जानिये कौन थे हिमाचल निर्माता परमार की टीम के अहम सदस्य गौरी प्रसाद

Virender Bhardwaj | News18 Himachal Pradesh
Updated: October 18, 2019, 12:46 PM IST
बर्थडे स्पेशल: जानिये कौन थे हिमाचल निर्माता परमार की टीम के अहम सदस्य गौरी प्रसाद
पंडित गौरी प्रसाद. (File Photo)

Pandit Gauri Prashad Birthday Special: पंडित गौरी प्रसाद ने मंडी जिला के रिवालसर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लडा और विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए

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मंडी. हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार (Dr. Yashwant Singh Parmar) की टीम के महत्वपूर्ण सदस्य पंडित गौरी प्रसाद प्रदेश के विकास की आधारशीला के रचनाकार थे. प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रदेश की पहली निर्वाचित सरकार के महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री पंडित गौरी प्रसाद ने हिमाचल निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

लाहौर से पढ़ाई
गौरी प्रसाद का जन्म 18 अक्तूबर 1920 में मंडी रियासत के बल्ह गांव में पंडित जय किशन और माता दुर्गा देवी के घर में हुआ. बल्ह से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद आगे की पढाई के लिए वह सन 1935 में लाहौर चले गए और यहां उन्होंने पंजाब विश्विद्यालय से मैट्रिक की पढाई पूरी की. इसी दौरान वह लाहौर में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और डा. गोपी चंद भार्गवा और डॉ. सत्य पाल के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया.

लौटे और बल्ह में खोली फार्मेसी शॉप

सन 1939 में उन्होंने सनातन धर्म प्रेम गिरी आयुर्वेदिक कालेज लाहौर से श्री वैद्या कवि राज परीक्षा उर्तीण की. अगले ही साल उन्होने इसी संस्थान से आयुर्वेदाचार्य की पढाई मुक्कमल की. लाहौर में आयुर्वेदाचार्य की डिग्री पूरी करने के बाद वह घर लौट आए और बल्ह (नेरचौक) में फार्मेशी स्थापित करके प्रैक्टिस शुरू की. देश की आजादी को लेकर चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के चलते जल्द ही उन्होंने आयुर्वेद की प्रैक्टिस और फार्मेसी का व्यापार बंद कर दिया और छोटे पहाडी राजाओं व शासकों के राज को उखाडने के लिए चलाए जा रहे प्रजा मंडल आंदोलन में शामिल हो गए.

प्रजामंडल आंदोलन के जिला अध्यक्ष बने
वह सन 1942 में मंडी रियासत में सक्रिय जिला प्रजा मंडल आंदोलन के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने सन 1947 तक आंदोलन को नई दिशा प्रदान की. वह सन 1940 से 1945 तक मंडी रियासत के राजा की विधान परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे. उन्होंने बल्ह निर्वाचन क्षेत्र से प्रजा मंडल के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हुए मंडी रियासत के प्रायोजित प्रत्याशी को हराया था.
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छह माह जेल भेज गए
स्वतंत्रता संग्राम और प्रजा मंडल आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हे मंडी के राजा ने सन 1947 में जेल भेज दिया था और उन्हें करीब छह माह के बाद जेल से छोडा गया था. पंडित गौरी शंकर को सन 1947 में जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष चुना गया और वह सन 1951 तक इस पद पर रहे. इसके अलावा, वह प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे. आजादी के बाद 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल प्रदेश को भारत के चीफ कमीश्नर प्रोविंस के रूप में पहचान मिली. पंजाब और शिमला हिल्स की 30 रियासतों को मिलाकर हिमाचल का गठन हुआ, जिसके चार जिले चंबा, महासू, मंडी और सिरमौर बनाए गए. सन 1951 में हिमाचल प्रदेश को पार्ट-सी राज्य घोषित किया गया. प्रदेश में विधानसभा का गठन करके पहले चुनाव नवंबर 1951 में आयोजित किए गए.

रिवालसर से लड़ा चुनाव और मंत्री बने
पंडित गौरी प्रसाद ने मंडी जिला के रिवालसर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लडा और विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए. मार्च 1952 में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी और पंडित गौरी प्रसाद को मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार के तीन सदस्यीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. उन्हें लोक निर्माण विभाग, स्वास्थय, आयुर्वेद, ट्रांसपोर्ट और सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए. पंडित पदम देव को गृह मंत्री का पद दिया गया.

स्वतंत्रता सैनानियों के लिए सहयोग दिया
पंडित गौरी प्रसाद सन 1956 तक मंत्री के रूप में कार्यरत रहे. उनके कार्यकाल के दौरान प्रदेश के भविष्य के विकास की सुदृढ आधारशिला रखी गई. सन 1954 में उन्हे राज्य स्वतंत्रता सेनानी एसोसिएशन का राज्य अध्यक्ष चुना गया और वह उम्र भर इस पद पर कार्य करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए कार्य करते रहे. वह हरिजन सेवक संघ के जिला अध्यक्ष और भारत सेवक समाज के संयोजक के रूप में सन 1957 से 1962 तक सक्रिय रहे. उन्होंने अस्पृश्यता हटाने और दलितों के उत्थान के लिए बढ़चढ़ कर भाग लिया. इसी दौरान वह सर्वोदय आंदोलन से जुडे और जिला संयोजक व राज्य सदस्य के रूप में कार्य करते रहे. सन 1959 से 1963 तक पंजाब, जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेश (इंटक) के उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने काम किया, जिनमें हाइडल वर्कर यूनियन जोगिन्द्र नगर, ट्रांसपोर्ट वर्कर यूनियन, मंडी हिल ट्रांसपोर्ट यूनियन, आयुर्वेदिक फार्मेसी यूनियन जोगिन्द्र नगर, साल्ट माइन वर्कस यूनियन द्रंग, ब्यास सतलुज लिंग प्रोजेक्ट वर्कस यूनियन पंडोह व सुंदरनगर, हिमाचल इलेक्ट्रिकल वर्कस यूनियन ढली और मंडी शामिल हैं.

ताम्र पत्र से नवाजा गया
गौरी प्रसाद सन 1964 में हिमाचल प्रदेश इंटक के अध्यक्ष बने और 1970 तक इस पद पर रहे. 15 अगस्त 1988 में स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान के लिए उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ताम्र पत्र से नवाजा था. उन्हे सन 1994 में मुखयमंत्री वीरभद्र सिंह की अध्यक्षता वाली राज्य फ्रीडम फाइटर वेलफेयर बोर्ड का उपाध्यक्ष चुना गया.

मांडव रत्न सम्मान से नवाजा
मंडी नगर परिषद ने पंडित गौरी प्रसाद को दो अप्रैल 2000 में मांडव रत्न सम्मान से नवाजा था. करीब 94 साल की उम्र में 18 मई 2014 को मंडी में उनका देहांत हो गया था. सामाजिक जीवन में वह अपनी ईमानदारी और चरित्र के कारण जाने जाते थे.

पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के साथ गौरी प्रसाद. (FILE PHOTO)
पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के साथ गौरी प्रसाद. (FILE PHOTO)


महात्मा गांधी के समर्थक थे- बेटा
पंडित गौरी प्रसाद के सपुत्र हितेन्द्र शर्मा बताते हैं कि वह महात्मा गांधी के अटूट समर्थक थे. उन्होंने जीवन भर महात्मा गांधी की शिक्षाओं का अनुसरण किया. पंडित जी बहुत सादा जीवन व्यतीत करते थे और जीवन पर्यन्त हमेशा खादी वस्त्र ही धारण करते थे. हिमाचल प्रदेश वासियों व खासकर अपने जिला मंडी के वासियों से खूब स्नेह रखते थे. उन्होंने अपने मंत्रीपद के दौरान स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया करवाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया था. लोक निर्माण मंत्री होने के नाते उन्हे राज्य की महत्वपूर्ण सडकों जैसे मंडी-शिमला सडक आदि के निर्माण का श्रेय है. वह पंडित जवाहर लाल नेहरू और पंडित गोविंद वल्लभ पंत के बहुत करीब थे. हिमाचल प्रदेश को अलग राज्य का दर्जा दिलाने में पंडित गौरी प्रसाद के इन राष्ट्रीय नेताओं से संबंधों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. इसके अलावा प्रदेश के विकास की सुदृढ आधारशीला रखने में उनके मंत्रीपद के कार्यकाल का विशेष महत्व है.

कांग्रेस थे फिर भी किया था आपातकाल का विरोध
गौरी प्रसाद जनविरोधी फैसलों और अन्याय के विरूद्ध हमेशा आवाज उठाई. हालांकि, वह कांग्रेसी थे, लेकिन बावजूद आपातकाल का जमकर विरोध किया. वह आपातकाल हटाने के लिए बनी जिला संघर्ष समिति के सक्रिय सदस्य रहे और वह मोरारजी देसाई की कांग्रेस (ओ) के कुछ समय तक सदस्य बन गए. वह हमेशा अपने सिद्धांतों पर खडे रहे और उन्होंने व्यक्तिगत लाभों के लिए राजनैतिक जीवन में इस सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया.

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First published: October 18, 2019, 12:46 PM IST
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