इस बार किन्नर कैलाश यात्रा पर संकट के बादल, ये है वजह

1993 से पहले 24 हजार फीट ऊंचे इस स्थान पर आम लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध था. 1993 में पर्यटकों के लिए खोल गया. किन्नर कैलाश के बारे में कई मान्यताएं हैं.

News18 Himachal Pradesh
Updated: June 21, 2019, 6:27 PM IST
इस बार किन्नर कैलाश यात्रा पर संकट के बादल, ये है वजह
किन्नर कैलाश पर्वत. (सांकेतिक तस्वीर)
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Updated: June 21, 2019, 6:27 PM IST
हिमाचल के किन्नौर जिले में किन्नर कैलाश यात्रा पर इस वर्ष संकट के बादल मंडरा रहे हैं. मौसम की बेरुखी को देखते प्रशासन भी किन्नर कैलाश यात्रा पर रोक लगाने के मूड में है. इस वर्ष मौसम खराबी के कारण श्रद्धालुओं को यात्रा से वंचित होना पड़ सकता है. स्थानीय लोग कैलाश पर्वत के आसपास गंदगी फैलाने और बिना योजना के यात्रा करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे है.

कैलाश दर्शन के लिए देश-विदेश से भी लोग आते हैं. किन्नर कैलाश यात्रा के दौरान प्रतिवर्ष लोगों की मौत होती है. आधिकारिक तौर पर यह रूट दस दिन के लिए खोला जाता है.

मौसम पर निर्भर,बिना अनुमति गए तो कार्रवाई
एसडीएम कल्पा सुरेन्द्र ठाकुर ने बताया कि किन्नर कैलाश की यात्रा पूरी तरह से मौसम पर निर्भर रहेगी. जल्द ही इस बारे में बैठक होगी. जो बिना अनुमति के यात्रा कर रहे या यह करवा रहे है, उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाई की जाएगी. स्थानीय निवासी चंद्र मोहन नेगी का कहना है कि पिछले कुछ साल से चली इस यात्रा के लिए भंडारा लगाने की अनुमति प्रशासन ने दी है, इसलिए बहुत से लोगों बिना तैयारी के आते है. उन्होंने कहा कि प्रशासन के पास भी कोई डाटाबेस नही होता है.

1993 से शुरू हुई यात्रा, कई मान्यताएं हैं
1993 से पहले 24 हजार फीट ऊंचे इस स्थान पर आम लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध था. 1993 में पर्यटकों के लिए खोल गया. किन्नर कैलाश के बारे में कई मान्यताएं हैं. माना जाता है कि महाभारत काल में कैलाश का नाम इन्द्रकील पर्वत था. यहां भगवान शंकर और अर्जुन का युद्ध हुआ था और अर्जुन को पशुपात अस्त्र की प्राप्ति हुई थी. यह भी मान्यता है कि पांडवों ने वनवास काल का अंतिम समय यहीं गुजारा था. ऐसा भी मत है कि किन्नर कैलाश के आगोश में ही भगवान कृष्ण के पोते अनिरुध का विवाह ऊषा से हुआ था.

(रिकॉन्ग पिओ से अरुण नेगी की रिपोर्ट)
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First published: June 21, 2019, 4:31 PM IST
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