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हिमाचल: कांग्रेस की खिचड़ी महफिल में आए 'कोड़कू', क्‍या बस इतिहास के भरोसे सत्‍ता में होगी वापसी?

हिमाचल: कांग्रेस की खिचड़ी महफिल में आए 'कोड़कू', क्‍या बस इतिहास के भरोसे सत्‍ता में होगी वापसी?

कांग्रेस इतिहास के भरोसे हिमाचल प्रदेश की सत्‍ता में वापसी का ख्‍वाब दे रही है.

कांग्रेस इतिहास के भरोसे हिमाचल प्रदेश की सत्‍ता में वापसी का ख्‍वाब दे रही है.

Himachal Congress News: हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सत्‍ता में वापसी के लिए संगठन को मजबूत करने की कवायद में लगी है. लेकिन प्रदेश के सबसे बड़े जिले कांगड़ा में आयोजित कांग्रेस की खिचड़ी महफिल के फ्लॉप हो जाने से तरह तरह के सवाल उठ रहे है. इसमें प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh Rathore) के अलावा दिवंगत वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह और उनके विधायक बेटे विक्रमादित्य सिंह (Vikramaditya Singh) तो पहुंचे, लेकिन 15 विधानसभा क्षेत्रों में से सिर्फ 5 नेता ही शामिल हुए.

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शिमला/ धर्मशाला. सोशल मीडिया पर कांग्रेसियों (Himachal Congress) के लिए कॉमन मैन की एक कॉमन लाइन अक्सर नजर आती है कि कांग्रेसी सिर्फ 2022 में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, बकाया कुछ नहीं. बस यही भरोसा है कि 2017 में हम गए तो 2022 में हम ही वापस आएंगे. फिर मेहनत क्यों करनी? जनता तो भाजपा से दुखी है ही,जाएगी कहां, वह हमारे पास ही तो अपना वोट लेकर आएगी. पर क्या सच में ऐसा होने जा रहा है? क्‍या कांग्रेस हकीकत में इतनी पॉवरफुल है और जनता को प्यारी है?

बहरहाल, इन दोनों सवाल का जवाब साफ तौर पर ‘न’ में है. इस न के पीछे की मौजूदा वजह आज उस वक्‍त कांगड़ा में सामने आई जब सत्ता के लिए तड़प रहे कांग्रेसियों ने लोहड़ी से पहले ही खिचड़ी पकाई और खुद आपस में ही मिलजुल कर खाई. इस दौरान कोई कार्यकर्ता नहीं, कोई दरी-कुर्सी बिछाने-लगाने वाला नहीं. बस नेता जमा हुए और बकाया सब मनफी में चले गए.

दो महीने पक रही थी खिचड़ी की महफिल
खैर, यह वो खिचड़ी की महफिल थी, जिसकी खिचड़ी कांग्रेसी बीते दो महीनों से पका रहे थे. हैरानगी यह हुई कि महफिल सजी तो जरूर, लेकिन उजड़े चमन की कहानी बन कर रह गई. जबकि प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर (Kuldeep Singh Rathore) सबसे बड़े 15 विधानसभा क्षेत्रों वाले कांगड़ा में तीन दिन से मौजूद थे. खिचड़ी वाले दिन कांग्रेस के एकमात्र एकछत्र राज करने वाले दिवंगत वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह और उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह भरी बरसात में पहुंचे, लेकिन आपको हैरानगी होगी कि इस पॉलिटिकल खिचड़ी के आयोजन में कांगड़ा के फ्रंट लाइनर कांग्रेसियों में से सिर्फ पांच नेता ही शामिल हुए. वह भी पूर्व विधायक या प्रत्याशी. बकाया दस विधानसभा हलकों के कांग्रेसी गायब हो गए. मजा ऐसा किरकिरा हुआ जैसे मानों खिचड़ी से देसी घी गायब हो गया हो.

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कांग्रेस की खिचड़ी महफिल में 15 विधानसभा क्षेत्रों से सिर्फ पांच नेता आए.

यह उस कांग्रेस की हालत थी जिसके प्रदेशाध्यक्ष यहीं डेरा जमाए हुए थे. यह वही कांग्रेस थी जो एक दौर में वीरभद्र सिंह की एक दहाड़ पर झुण्ड में बनकर उनके सामने खड़ी हो जाती थी. लेकिन हुआ यह कि किसी ने किसी की कोई परवाह नहीं की. एक चमत्कार जरूर हुआ कि आशा कुमारी के अनन्य भक्त और जिला कांग्रेस के अध्यक्ष अजय महाजन इस खिचड़ी की महफिल में हाजिर देखे गए.यह उस जिले में कांग्रेस की ताजा हकीकत है जो सबसे बड़ा है और सत्ता का प्रवेश द्वार है.

कांग्रेसियों की आपसी कलह पड़ रही भारी
वजह सिर्फ और सिर्फ कांग्रेसियों की आपसी कलह है. कांग्रेस के स्थापित नेता कांग्रेस और कांग्रेसियों के साथ चलने की जगह उनको अपने साथ ‘घसीटने’ पर उतारू हैं. कांग्रेस के नेता अपने कैडर को मजबूत करने की बजाए खुद को सीएम, प्रदेशाध्यक्ष, नेता विपक्ष बनकर मजबूत करने में जुटे हुए हैं. वहीं, जो बकाया हैं वो अपनी-अपनी टिकट पक्की-मजबूत करने में लगे हुए हैं. आज जो हालात बने वह तो यही बयान कर रहे हैं कि टिकट के लिए कांग्रेसी अपने हाईकमान के बाद लोकल लीडर्स की दया तलाश रहे हैं. इसके साथ भाजपा से नाराज जनता के वोट की आस है. जबकि इस बात का अंदाजा किसी को नहीं है कि भाजपा का संगठन है, सत्ता सुख है, धनबल के साथ जनबल भी है. भले ही इसमें अभी क्षरण है, लेकिन ताकत कम नहीं है.

खैर, इसके अंदर की कहानी और भी दिलचस्प है. मौजूदा कांग्रेसी खिचड़ी का स्वाद तो माह की दाल में आने वाले ‘कोड़कूओं’ ( माह की दाल में पत्थर की तरह न गलने वाले दाने ) की वजह से खराब तो हो ही गया.

Tags: CM Jai Ram Thakur, Himachal Congress, Himachal news, Himachal Politics

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