हिमाचल में रोजाना 3 सुसाइड: लॉकडाउन के 3 महीने में करीब 250 लोगों ने की आत्महत्या!
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हिमाचल में रोजाना 3 सुसाइड: लॉकडाउन के 3 महीने में करीब 250 लोगों ने की आत्महत्या!
हिमाचल में सुसाइड के मामले. (सांकेतिक तस्वीर)

बीते दस साल में 5000 लोगों ने हिमाचल में सुसाइड किया है. 2016 में 642 लोगों ने अपनीजीवन लीला समाप्त की. वहीं, 2014 में 644 लोगों ने सुसाइड किया. इस तरह औसतन हर साल पांच सौ से अधिक लोग हिमाचल में सुसाइड कर रहे हैं.

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शिमला. हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) की राजधानी शिमला (Shimla) के न्यू-शिमला 20 साल के युवक ने घर में युवक ने फांसी लगाकर आत्महत्या (Suicide) कर ली. अंशुल कश्यप (20) न्यू शिमला की पूर्व महिला पार्षद (Councilor) का बेटा था. लेकिन, उसने यह आत्मघाती कदम क्यों उठाया, पता नहीं चल पाया है. ऊना में गांव लोअर देहलां के वार्ड 7 निवासी 37 वर्षीय ने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली है.

लोअर देहलां निवासी शेर सिंह कारोबार में घाटे और बीमारी के चलते तनाव में था. इसी तरह बीते सोमवार को शिमला (Shimla), कुल्लू और मंडी (Mandi) में तीन लोगों ने सुसाइड कर लिया. ऐसे कई मामले रोजाना सूबे में आ रह हैं. अहम बात यह है कि कोरोना काल में मानसिक तनाव के चलते लोग ऐसे आत्मघाती कदम उठा रहे हैं.

छह महीने में 365 सुसाइड केस



हिमाचल प्रदेश में 2020 में छह महीने में कुल 365 सुसाइड केस रिपोर्ट हुए हैं.अकेले तीन महीनों अप्रैल, मई और जून में 250 लोगों ने सुसाइड किया है. जून में 114 लोगों ने सुसाइड किया है. अप्रैल में 47 और मई में 88 लोगों ने सुसाइड किया है. साल 2020 में सबसे अधिक केस 54 कांगड़ा जिले में रिपोर्ट हुए हैं. इसके बाद, मंडी में 43 केस सामने आए हैं. शिमला में 23, सिरमौर में 20, कुल्लू में 15, ऊना में 21, सोलन में 13, बिलासपुर में 14, चंबा में 6, हमीरपुर में 16, किन्नौर में पांच और बद्दी में 7 सुसाइड पेश आए हैं. केवल लाहौल स्पीति में कोई मामला नहीं है.
दस साल में पांच हजार लोगों ने दी जान
बीते 3 माह में लॉकडाउन के बीच 250 सुसाइड केस आए हैं. अप्रैल और मई 2018 में यह आंकड़ा 122 था. वहीं, इन दो महीनों में 14 मामले (306-IPC) और 122 मामले (174-CRPC) के हैं. ब्लैक ब्लेंकेट एजूकेशन सोसायटी की ओर से किए सर्वे के अनुसार, 2010 से लगातार 2016 तक प्रदेश में खुदकुशी करने वाले मामलों में बढ़ोतरी हुई है.बीते दस साल में 5000 लोगों ने हिमाचल में सुसाइड किया है. 2016 में 642 लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त की. वहीं, साल 2014 में 644 लोगों ने सुसाइड किया. इस तरह औसतन हर साल पांच सौ से अधिक लोग हिमाचल में सुसाइड कर रहे हैं.

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हार्मोन्स में असंतुलन होने से आदमी अजीब तरह का व्यवहार करने लगता है.


क्या बोले IGMC के मनोचिकित्सा विभाग के सहायक प्रोफेसर देवेश शर्मा
आईजीएमसी के मनोचिकित्सा विभाग के सहायक प्रोफेसर देवेश शर्मा मानते हैं कि लॉकडाउन में कई तरह की दिक्कतें सामने आई हैं. सुसाइड के मामले पहले भी आते रहे हैं और ऐसी कई वजहें हो सकती हैं, जब कोई शख्स अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेता है. आत्महत्या करने वालों में 80 से 90 फीसदी मानसिक रोग से पीड़ित होते हैं. ऐसे रोगियों में डिप्रेशन, सिजोफ्रेनिया, मूड डिसऑर्डर, नशे एक कारण है. आत्महत्या करने वाले पहले ही संकेत देने लगते हैं, जैसे अब जिंदगी भारी लगने लगी है, जीने की इच्छा न रहना, भूख न लगना, नींद न आना. ऐसे में समय पर संकेतों को समझ कर अवसाद के रोगियों की जान बचाई जा सकती है. दरअसल, भारत में डिप्रेशन को लेकर खुलकर बात ना करना इसकी एक बड़ी वजह है. ज्यादातर लोग अपने अवसाद की वजह अपने रिश्तेदार या दोस्तों को नहीं बताते हैं. ऐसे में मेंटल हेल्थ को लेकर काम करने वाली संस्थाएं भी अपनी भूमिका निभाती हैं.

रांची के नामकुम में बेटे के बाद उसके गम में मां ने भी खुदकुशी कर ली.
हिमाचल में सुसाइड के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.


परिजन या दोस्त कर सकते हैं मदद
हिमाचल में डिप्रेशन का शिकार लोगों की मदद करने वाली संस्था ब्लैक ब्लेंकेट सोसायटी की सदस्य मीनाक्षी बताती हैं कि डिप्रेशन से बाहर निकलने में सबसे ज्यादा मददगार अपने परिजन या दोस्त ही साबित होते हैं. कुल मिलाकर डिप्रेशन को भी एक रोग की ही तरह है. इसके बारे में किसी रोग की तरह ही खुलकर बात करनी होगी, ताकि वक्त रहते इसका इलाज हो सके और ये तभी मुमकिन है जब डिप्रेशन के शिकार किसी शख्स के साथ उसके अपनों को भी जिम्मेदारी उठानी होगी. कोरोना संक्रमण काल में भले सामाजिक दूरी रहे, लेकिन मानसिक दूरी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए.

युवाओं में बढ़ते स्ट्रेस और डिप्रेशन को ऑनलाइन कॉउंलसिंग
तनाव और डिप्रेशन से बाहर निकालने के लिए ऑनलाइन कॉउंलसिंग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इस काउंसलिंग की मदद से ही प्रदेश में 15 से 20 फीसदी युवाओं को तनावमुक्त करने का काम ब्लैक ब्लेंकेट एजुकेशन सोसायटी की ओर से किया जा रहा है. ब्लैक ब्लेंकेट सोसायटी के पास इन दिनों तनाव और डिप्रेशन से संबंधित फोन कॉल्स की संख्या काफी बढ़ गई है. डिप्रेशन की शिकायत करने वाले अधिकतर युवा हैं. ज्यादातर युवा 15 से लेकर 25 साल तक के हैं. कुछ युवा अपनी पढ़ाई, कुछ अपने घरेलू मसलों और कुछ बेरोजगारी के साथ-साथ कोरोना काल में अपने व्यवसाय में हो रहे नुकसान के कारण डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं.

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डिप्रेशन का शिकार आदमी ऐसी हरकतें करता हैं, जिनसे वह इसे छिपाना चाहता है.


मेंटल हेल्थ पर काम
सोसायटी की सचिव मीनाक्षी रघुवंशी ने बताया कि उनकी सोसायटी साल 2009 से ही मेंटल हेल्थ पर काम कर रही है. इसके साथ ही वे स्कूल में पढ़ रहे बच्चों की मेंटल हेल्थ पर भी काम कर रहे हैं, लेकिन इस समय कोरोनाकाल में बीते दो माह से बढ़ते सुसाइड के मामलों को देखते हुए ऑनलाइन कॉउंलसिंग की यह सुविधा सभी को मुहैया करवाई जा रही है.
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