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हिमाचल: लुप्त होती जड़ी बूटियों को संरक्षित करेगा बायोडाइवर्सिटी बोर्ड, पंचायतें होंगी मालामाल

हिमाचल में कई जड़ी-बूटियां मिलती हैं, जिनका व्यापार भी होता है.
हिमाचल में कई जड़ी-बूटियां मिलती हैं, जिनका व्यापार भी होता है.

कुल्लू जिले की सोयल पंचायत में बायोडाइवर्सिटी हैरिटेज साइट (Biodiversity Heritage Site) चिन्हित की गई है. यहां पर करीब 800 पुराने देवदार के पेड़ हैं, इन पेड़ों के अलावा पूरे जंगल को संरक्षित किया जाएगा.

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शिमला. हिमाचल में लुप्त होती जड़ी-बूटियों, औषधीय पौधों से लेकर भोज पत्र और देवदार के सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ों को राज्य का बायोडाइवर्सिटी बोर्ड संरक्षित करेगा. शिमला प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यशाला के दौरान बोर्ड के अधिकारियों ने इसकी जानकारी दी. इनके संरक्षण के लिए प्रदेश में 5 स्थानों पर हैरीटेज साइट्स बनाई जाएंगी. इसके लिए बोर्ड ने विस्तृत खाका तैयार किया है. इतना ही नहीं जड़ी-बूटियों और अन्य प्राकृतिक उत्पादों का वैज्ञानिक तरीके से दोहन किया जाएगा ताकि इन्हें संरक्षित किया जा सके, साथ ही पंचायतों और स्थानीय लोगों से मिलकर उत्पादन को और बढ़ाया जाएगा, इससे पंचायतों को आर्थिक लाभ मिलेगा और उत्पादन करने वाले लोगों को अच्छी कीमत मिलेगी. बोर्ड की नीति के तहत विपणन किया जाएगा.

इन स्थानों पर बनेगी हैरीटेज साइट
जैव विविधता बोर्ड के संयुक्त सचिव निशांत ठाकुर और वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी शुभ्रा बैनर्जी ने बताया कि कुल्लू जिले की सोयल पंचायत में बायोडाइवर्सिटी हैरिटेज साइट चिन्हित की गई है. यहां पर करीब 800 पुराने देवदार के पेड़ हैं, इन पेड़ों के अलावा पूरे जंगल को संरक्षित किया जाएगा. इसके अलावा मंडी जिले के कमरूनाग, चंबा जिले के पांगी में सूराल भटोरी, हुडन भटोरी और लाहौल-स्पिती के नैन गाहर में हैरीटेज साइट बनाई जाएगी. शुभ्रा बनर्जी ने बताया कि पांगी में भोज पत्र के जंगल को संरक्षित किया जाएगा. इन साइट्स को इस तरीके से विकसित किया जाएगा, जिससे न केवल जागरूक हों, पर्यटन की संभावनाएं बढ़ें और साथ ही व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हों ताकि संबंधित पंचायतों और स्थानीय लोगों की आय हो.

इस तरह होगी आय
परियोजना समन्वयक डॉ.एमएल ठाकुर ने बताया कि बोर्ड में प्रदेश की पंचायतों में से लेकर जिला स्तर तक लोकल बॉडी और बीएमसी गठित की हैं. इनकी संख्या कुल 3371 है. इनके जरिए संबंधित क्षेत्र की जैव विविधता का डाटा तैयार किया गया है और साथ ही इन क्षेत्रों में जड़ी बूटियों के व्यापार का भी पता लगाया है. शोध में पता चला है कि प्रदेश में स्थानीय लोग करीब 500 औषधीय पौधों का इस्तेमाल करते हैं. बहुत से पौधे ऐसे हैं जिनमें कैंसर के इलाज से लेकर अन्य गंभीर तरह की बीमारियों के इलाज छुपे हुए हैं. दुनिया के कई देश भारत से इन पौधों को खरीदते हैं, इनसे दवाइयां तैयार की जा रही हैं और शोध भी चल रहा है. डॉ.एमएल ठाकुर ने बताया कि हिमाचल में अतीश, रत्नजोत, सालम पांजा, सोमलता, जंगली लहसुन, कुटकी, मनू, धूप, नागछत्री, गुच्छी, कड़ू, कक्कड़ सिंघी, गिलोए,रखाल जैसी कई जड़ी-बूटियां मिलती हैं, जिनका व्यापार भी होता है.



देश में होता है 8 हजार करोड़ रू. से ज्यादा की जड़ीबूटियों का व्यापार
इंडियन हर्बल मार्किट के अनुसार देश में 8 हजार करोड़ रू. से ज्यादा की जड़ीबूटियों का व्यापार होता है. हिमाचल में जो लोग जड़ी-बूटियां बेचते हैं, वो एक तरह से कच्चे माल की तरह की बेची जाती हैं,जिसके चलते इनकी कम कीमत मिलती है. अगर प्रोसेस्स करके या वैल्यू एडिश्न करके बेची जाएं तो 3 से 4 गुना कीमत मिल सकती है. बोर्ड की पॉलिसी के अनुसार अगर विपणन शुरू होगा तो न केवल संबंधित पंचायत बल्कि स्थानीय लोगों को मुनाफा होगा. जो कंपनियां जड़ी-बूटियों की खरीद करती हैं वो बायोडाइवर्सिटी अधिनियम के तहत बंधी हुई हैं,इनको लागू करने का जिम्मा बोर्ड पर है.

22 प्रजातियां खतरे में
सीनियर साइंटिफिक प्रोफेशनल डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि हिमाचल में पौधों की 22 प्रजातियां और जानवरों की 16 स्पीशिज खतरे में हैं. प्रदेश में जड़ी-बूटियों की बात करें तो ऊंचाई वाले इलाकों में मिलने वाली पतीश, मनू ,हाथ पांजा, निचले इलाकों में मिलने वाली सालाम मिश्री (च्वयन प्राश में इस्तेमाल होती है) खतरे में हैं.
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