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शिमला के धामी में खेला गया खूनी खेल, घायल युवकों का खून मां काली को चढ़ाया गया

Reshma Kashyap | News18 Himachal Pradesh
Updated: October 28, 2019, 6:36 PM IST
शिमला के धामी में खेला गया खूनी खेल, घायल युवकों का खून मां काली को चढ़ाया गया
शिमला में दिवाली के अगले दिन आज खूनी खेल धामी खेला गया. इस खेल में सोमवार को कुछ लोग घायल हो गए हैं.

हिमाचल प्रदेश के शिमला (Shimla) में दिवाली के अगले दिन धामी (Dhami) में खूनी खेल (Bloody Sports) खेला गया.

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शिमला. हिमाचल प्रदेश के शिमला (Shimla) में दिवाली के अगले दिन धामी (Dhami) में खूनी खेल (Bloody Sports) खेला गया. इस खेल में सोमवार को कुछ लोग घायल (Injured) हो गए हैं. दरअसल, हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में आस्था के नाम पर दिवाली के अगले दिन लोगों का खून बहता है. शिमला के धामी में एक ऐसा खेल खेला जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग तब तक एक दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं, जब तक किसी के सिर से खून न निकल जाए. इस खेल में घायल हुए लोगों का खून काली मां के मंदिर में चढ़ाया जाता है. यही वजह है कि आस्था के नाम चलने वाला यह खेल लोग बिना किसी डर के 10 मिनट तक खेलते रहते हैं.

सैंकड़ों साल से चल रही पंरपरा
यहां पत्थर बरसाने से लोगों के सिर से खून निकलता है और उसे काली मां के मंदिर में चढ़ाया जाता है. धामी के चौरा में सैंकड़ों वर्षों से एक खूनी खेल खेला जाता है. जिसमें चौरा के लोग दो गुटों में बंट कर एक दूसरे पर जम कर पत्थर बरसाते हैं. ये प्रथा यहां सैकड़ों सालों से चली आ रही है. इस प्रथा को आज भी स्थानीय लोग पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं.

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यहां पत्थर बरसाने से लोगों के सिर से खून निकलता है और उसे काली मां के मंदिर में चढ़ाया जाता है.


मेले के दौरान होता है यह सबकुछ
दीपावली के अगले दिन एक मेले का आयोजन होता है. इस मेले का सबसे प्रमुख आकर्षण पत्थरों का युद्ध होता है. स्थानीय बोली में इसे पत्थरों का बहेड़ भी कहते हैं. लोग एक-दूसरे को पूर्व निर्धारित स्थानों से पत्थर मारते हैं और जब किसी व्यक्ति को पत्थर लग जाता है तो उसका खून माता काली के मंदिर में चढ़ा कर मेले की परंपरा को सम्पन्न किया जाता है.

इसलिए बहाया जाता है खून
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यह मान्यता है कि सैंकड़ों साल पहले यहां मानव बलि की प्रथा थी. यहां का जो राजा था, उसकी जब मृत्यु हुई तो उनकी रानी ने सती होने का निर्णय लिया, लेकिन रानी मानव बलि पर रोक लगाना चाहती थी, इसलिए रानी ने सती होने के बाद माता काली से बात की और लोगों को बताया कि मानव बलि को बंद करके और कोई अन्य व्यवस्था करें. फिर थोड़ा समय तक पशु बलि का प्रावधान किया गया.

गांव में फैली महामारी
यह कहा जाता है कि माता काली ने इसे स्वीकार नहीं किया. उसके बाद गांव में महामारी शुरू हो गई. महामारी होने से कई लोगों की मौत हो रही थी. काली मां को इंसानी खून चढ़ाना परंपरा थी, लेकिन रानी की इच्छा मानव बलि बंद करना थी. ऐसे में बिना बलि के माता को मानव रक्त चढ़ाने के लिए पत्थर के युद्ध की शुरूआत की गई. इसके लिए दीपावली का अगला दिन निर्धारित किया गया और यही वजह है कि सैंकड़ों वर्षों से यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है.

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चोटिल हुए युवक का खून काली मां के मंदिर में इस जगह चढ़ाया गया.


करीब 10 मिनट तक खेला जाता है
इस खेल को करीब 10 मिनट तक खेला जाता है. जब किसी व्यक्ति के चोट लगने पर खून निकलता है तो खेल को तुरंत बंद कर दिया जाता है और उसका खून काली मां के मंदिर में चढ़ाया जाता है. इस खेल को खेलने वाले हर खिलाड़ी की यही इच्छा होती है कि इस बार मां के मंदिर में उसका खून चढ़े. मां के मंदिर में खून चढ़ाना शुभ माना जाता है. दरअसल, देव भूमि हिमाचल में कई ऐसी अजीबोगरीब परंपराएं हैं, जो आज भी जिंदा हैं.

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First published: October 28, 2019, 4:24 PM IST
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