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मिर्जा परिवार के मिंजर चढ़ाने से ही शुरू होता है चंबा का अंतर्राष्ट्रीय मिंजर मेला

चंबा का मिंजर मेला.

चंबा का मिंजर मेला.

मेलों और त्योहारों के लिए भी हिमाचल की अलग पहचान है. मंडी की शिवरात्रि हो या कुल्लू का दशहरा, या फिर चंबा का मिंजर मेला ...अधिक पढ़ें

    हिमाचल प्रदेश को देश-विदेश में प्राकृतिक सुंदरता के अलावा अपनी संस्कृति और देवी भूमि के रूप में भी जाना जाता है. यहां की संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता है.

    मेलों और त्योहारों के लिए भी हिमाचल की अलग पहचान है. मंडी की शिवरात्रि हो या कुल्लू का दशहरा, या फिर चंबा का मिंजर मेला. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाते हैं. लेकिन चंबा में 28 जुलाई से शुरू हुआ मिंजर मेला खास पहचान रखता है. यह मेला मुस्लिम-हिंदु एकता का प्रतीक है. मुस्लिम परिवार यहां मिंजर चढ़ाता है, तभी मेले की विधिवत शुरूआत होती है. इस मेले मेले से कई दंतकथाएं जुड़ी हैं.

    मेले की शुरुआत को लेकर कहानियां
    चंबा के मिंजर मेले को लेकर कई किवदंतियां हैं. मान्यता है कि 10वीं सदी में रावी चंबा से होकर बहती थी. यहां पर नदी के दाएं छोर पर चंपावती मंदिर और बाएं किनारे पर हरिराय मंदिर था.

    चंपावती मंदिर में एक साधू रहता था, जो रोजाना हरिराय मंदिर में पूजा के लिए नदी पार कर दूसरे किनारे जाते था. चंबा के राजा और लोगों ने उनके अनुरोध किया कि हरिराय मंदिर के दर्शन आसानी हो सकें, कुछ उपाय कीजिये. इसके बाद साघू ने राजा और लोगों को चंपावती मंदिर में बुलाया.

    फिर 7 दिन तक बनारस के ब्राह्मणों ने यहां यज्ञ किया. इसके बाद ब्राह्मणों ने सात रंगों की रस्सी बनाई, जिसे मिंजर नाम दिया गया. जब यज्ञ पूरा हुआ तो रावी में उफान उठा और उसने अपना रास्ता बदल लिया. इसके बाद हरिराय मंदिर जाना आसान हुआ.

    शाहजहां ने इनाम में दी थी भगवान रघुवीर की मुर्ति
    17वीं सदी में शाहजहां ने एक प्रतियोगिता करवाई तो इसमें चंबा के राजा पृथ्वी सिंह भी पहुंचे. वह विजयी रहने पर उन्हें भगवान रघुवीर की प्रतिमा दी गई. चंबा के राजा जब भगवान रघुवीर को यहां लेकर आए तो उनके साथ सफी बेग मिर्जा को भी भेजा गया.

    मिर्जा जरी-गोटे के काम में माहिर थे और उन्होंने जरी से मिंजर बनाकर रघुवीर जी, लक्ष्मी नारायण और राजा पृथ्वी सिंह को भेंट की. तब से लेकर आज तक 300 साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया है लेकिन इसी परिवार के वंशज (परिवार का मुखिया) सबसे पहले भगवान रघुवीर को जरी गोटे से बनी मिंजर अर्पित करते हैं और तभी मेले की शुरुआत होती है.

    क्या होता है मिंजर
    मक्की, गेहूं, धान और जौ की बालियों को मिंजर कहा जाता है. मिंजर मेले के दौरान जरी या गोटे से बनी मिंजर को कमीज के बटन पर लगाया जाता है और मेले के दौरान पहना जाता है. मेले के समापन पर इसे रावी में बहाया जाता है. मिंजर को शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है

    मिर्जा परिवार की पांचवीं पीढ़ी पंरम्परा संभाले हुए
    मिर्जा परिवार के सदस्य ही सर्वप्रथम भगवान लक्ष्मीनारायण तथा रघुबीर को मिंजर चढ़ाते हैं. राजा पृथ्वी सिंह के राजकाल में उनका परिवार दिल्ली से चंबा आया थ. आज भी परिवार की पांचवीं पीढ़ी परम्परा को संभाले हुए है. मिर्जा भी परिवार ही सर्वप्रथम भगवान को मिंजर अर्पित करता है. बता दें कि jरविवार को मिंजर मेले की शुरुआत हुई है, जो सात दिन तक चलेगा.

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