आपके लिए इसका मतलबः चमोली की तरह हिमाचल को भी ग्लेशियर से खतरा, भूकंप के हाई रिस्क जोन में हैं 5 जिले

हिमाचल प्रदेश में आपदा का खतरा लगातार बना रहता है.

हिमाचल प्रदेश में आपदा का खतरा लगातार बना रहता है.

उत्तराखंड के चमोली में आए जल प्रलय की तरह हिमाचल में ऐसे हादसे होने का खतरा है. यहां पर किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा और कुल्लू जिले हिमस्खलन की दृष्टि से संवदेनशील हैं.

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शिमला. कहते हैं खूबसूरती हमेशा खतरनाक होती है, कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है हिमाचल के बारे में. हिमाचल (Himachal Pradesh) जितना खुबसूरत है, उतनी ही मुश्किल यहां की जिंदगी है. काफी हद तक हम इंसानों ने खुद जिंदगी को खतरे की ओर धकेला है. हिमाचल का इतिहास इस बात की गवाही दे रहा है. हिमाचल पश्चिमी हिमालय की गोद में बसा है, जो 55,673 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ. नैसर्गिक सौंदर्य से भरपुर इस पहाड़ी प्रदेश में आकाश को छूती कई चोटियां हैं, जो ग्लेशियरों से भरी हैं. हिमालय से निकलने वाली नदियां पर अपने रौद्र रूप में आती हैं तो बड़ी तबाही मचाती हैं.

प्रदेश की प्रमुख नदियों में चंद्र भागा, रावी, ब्यास और सतलुज (Satluj) शामिल हैं. इनमें कई छोटे-बड़े नदी-नाले मिलते हैं. 67 फीसदी से ज्यादा वन क्षेत्र है. 2011 की जनगणना के अनुसार हिमाचल की जनसंख्या 68.65 लाख है, एक अनुमान के मुताबिक, अब प्रदेश की जनसंख्या लगभग 70 लाख पहुंच गई है. प्रदेश में विकासात्मक गतिविधियों और अवैज्ञानिक तरीकों से किए गए निर्माण से लेकर प्रकृति से छेड़छाड़ की वजह जलवायु परिवर्तन तक से खतरा पैदा रहा है.

हिमाचल में बड़े खतरे

प्रदेश में प्राकृतिक और मानव निर्मित खतरों की बात करें तो इनमें मुख्य रूप से भूकंप,बाढ़,बादल फटना, हिमस्खलन, भू-स्खलन, आंधी-तूफान, ओला-वृष्टि, सूखा,बांध का टूटना, घरों और जंगलों में लगने वाली आग, सड़क दुर्घटनाएं, रासायनिक और औद्यौगिक खतरों से लेकर संक्रमण और महामारी तक  कई खतरें शामिल हैं. राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश के इतिहास में रिक्टर स्केल पर 4 या उससे अधिक की तीव्रता के भूकंप 80 से ज्यादा बार अनुभव किए गए है. बीआईएस भूकंपीय जोनिंग मानचित्र के अनुसार हिमाचल के 5 जिलों में खतरा सबसे ज्यादा है. इनमें चंबा जिले का 53.2%, हमीरपुर का 90.9%, कंगड़ा का 98.6%, कुल्लू का 53.1% और जिले मंडी का 97.4 फीसदी क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से हाई रिस्क जोन में है.
शिमला जिला जोन 4 में है. प्रदेश में 4 अप्रैल 1905 में कांगड़ा में आए भूकंप से मची तबाही को कौन भूल सकता है. 7.8 तीव्रता के इस भूकंप में 20 हजार से ज्यादा लोगों की जान गई, 53 हजार से ज्यादा मवेशी मारे गए, एक लाख से ज्यादा घर नष्ट हो गए और अरबों की संपत्ति का नुकसान हो गया. 19 जनवरी 1975 किन्नौर में 6.8 की तीव्रता के भूकंप से 60 लोगों की मौत हो गई, 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए और 2 हजार घर तबाह हो गए. 26 अप्रैल 1986 को धर्मशाला में धरती कांपी थी, जिसमें 6 लोगों की मौत हुई थी, भवनों और करोड़ों की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था.

चंबा में 95 में तबाही

इसके बाद चंबा में 24 मार्च 1995 को 4.9 की तीव्रता के झटके से 70 फीसदी से ज्यादा घरों में दरारें पड़ गई थी. 1995 के बाद अब तक प्रदेश में कई बार धरती कांपी है. जरा सोचिए पहाड़ों की रानी शिमला, सोलन, कांगड़ा, कुल्लू, मनाली,धर्मशाला से लेकर कई शहरों में जिस तरह से भवनों का निर्माण हुआ है, इन स्थानों पर अगर ज्‍यादा तीव्रता का भूकंप 30 सेकेंड तक आएगा तो क्‍या मंजर होगा. शिमला शहर में तो कई स्थान ऐसे हैं जहां लोगों को घरों से बाहर निकलने के बाद खुली जगह तक नहीं है. सारे भवन अगर धराशाई हो गए तो रेस्‍क्‍यू ऑपरेशन तो दूर लाशें उठाने वाला भी नहीं मिलेगा. ऐसे में अभी वक्त है कि धीरे-धीरे में हमें आपदा के संबंध में सभी विषयों पर कार्य करना शुरू होगा.



लगातार आ रही बाढ़

प्रदेश में विनाशकारी बाढ़ का इतिहास काफी पुराना है. कुछ बड़ी घटनाओं की बात करें तो 4 और 5 सितंबर 1995 को कुल्लू में ब्यास नदी समेत प्रदेश के कई इलाकों में आई बाढ़ ने जबरदस्त नुकसान पहुंचाया था. कुल्लू घाटी में 65 लोग मारे गए थे, एनएच बह गया था, कई पुल, सरकारी और गैर सरकारी इमारतें बाढ़ की भेंट चढ़ गए थे, अनुमान के अनुसार 182 मिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ था. किन्नौर में 32 लोगों की मौत हुई थी, सैकड़ों मवेशी बह गए थे. अगस्त 1997 में शिमला के रोहड़ू क्षेत्र में पब्बर नदी में आई भयंकर बाढ़ और भू-स्खलन से 124 लोग मारे गए, सतलुज नदी में आई बाढ़ से किन्नौर से लेकर शिमला और कुल्लू जिले की सीमाओं पर भारी तबाही मचाई, इस आपदा में 19 लोगों की जान गई, 464 मवेशी मारे गए और 105 घर बह गए. सतलुज घाटी में 31 जुलाई और 1 अगस्त 200 की रात को आई बाढ़ से 135 लोगों और 1673 पशुओं की जान गई और करीब 1466.26 करोड़ का नुकसान हुआ. 16 जुलाई 2003 को कुल्लू जिले गड़सा घाटी में बादल फटने से 21 लोगों की जान गई, 7 अगस्त 2003 को कुल्लू के ही सोलंग में भयानक बाढ़ में 30 लोगों की मौत हो गई, 26 जून 2005 में पारछू झील टूटने से हुई त्रासदी को कौन भूला सकता है.

इस आपदा से 610 करोड़ रू. की संपत्ति को नुकसान हुआ था. 15 अगस्त 2007 में शिमला के घानवी में बादल फटने से 58 लोग मारे गए थे. यहां बाढ़ का ही जिक्र किया गया है, जिनमें भारी नुकसान हुआ था. लेकिन हर साल आने वाली बाढ़ हिमाचल का इम्तिहान लेती हैं. जाने कितनी जिंदगियां ऐसी हैं जो दफन हो चुकी हैं, हजारों लोग ऐसे हैं जिनकी लाशें तक नहीं मिल पाई हैं.

हिमस्खलन का खतरा

किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा और कुल्लू जिले हिमस्खलन की दृष्टि से संवदेनशील हैं. लाहौल-स्पीति में मार्च 1978 में हुए हिस्खलन से 30 लोग मारे गए और 1979 में हिस्खलन की घटना में 237 लोगों की जान चली गई थी. इसके अलावा 1991, 1995 में बड़ी घटनाएं हुई हैं, इसके अलावा हर साल इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं. तमाम खतरों को दरकिनार करते हुए विकास की अंधी दौड़ में हम उस मुकाम तक पहुंच गए हैं जहां आगे कुआं और पीछे खाई नजर आ रही है. हिमाचल में सैकड़ों पावर प्रोजेक्ट हैं, कुछ स्थानों पर वो बड़ा खतरा बने हुए हैं. किन्नौर की बात करें तो ऐसा कहा जाता है कि पूरा किन्नौर अब एक बारूद के ढेर पर है. चमौली की घटना को लेकर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी कह रहे हैं कि हमें अलर्ट रहना होगा. अवैज्ञानिक तरीकों और बिना प्लानिंग के किए गए कार्यों ने भयावह स्थिती पैदा कर दी है. अभी वक्त है कि हमें संभलना होगा और प्रकृति को संरक्षित करना होगा, असंतुलन की खाई को पाटना होगा.
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