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2040 करोड़ रुपये के घाटे में चल रहे हिमाचल बिजली बोर्ड पर 5200 करोड़ कर्ज

Ranbir Singh | News18 Himachal Pradesh
Updated: October 4, 2019, 10:36 AM IST
2040 करोड़ रुपये के घाटे में चल रहे हिमाचल बिजली बोर्ड पर 5200 करोड़ कर्ज
हिमाचल में बिजली बोर्ड घाटे में चल रहा है. (सांकेतिक तस्वीर)

Electricity board of himachal Pradesh: बोर्ड के एमडी जेपी काल्टा का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि बीते साल की बैलेंस शीट में 5 करोड़ रुपये का लाभ (Gain) दर्ज किया गया है. यह लाभ इस साल बढ़कर 50 से 55 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है.

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शिमला. हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर (CM Jairam Thakur) निवेश लाने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं. दूसरी तरफ, जहां से प्रदेश को आय की उम्मीद होती है, वह संस्थान घाटे से उबर नहीं पा रहे हैं. राज्य सरकार (Himachal Government) के लगभग सभी उपक्रम, निगम-बोर्ड घाटे में हैं. अब ऊर्जा क्षेत्र से भी बुरी खबर है. कभी हिमाचल के इकलौते कमाऊ पुत कहे जाने वाले राज्य बिजली बोर्ड (Himachal Electricity Board) की हालत अब ऐसी है, वह करीब 5200 करोड़ रुपये के बोझ तले दबा हुआ है.

राज्य बिजली बोर्ड का सालाना घाटा लगभग 2040 करोड़ रुपये से ज्यादा है.. 2010 में बिजली बोर्ड को कंपनी में तब्दील कर दिया गया था. उस वक्त 520 करोड़ रुपये का घाटा था, जो अब 9 साल में बढ़कर 2040 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है.

हिमाचल के इकलौते कमाऊ पुत कहे जाने वाले राज्य बिजली बोर्ड की हालत पतली है.
हिमाचल के इकलौते कमाऊ पुत कहे जाने वाले राज्य बिजली बोर्ड की हालत पतली है.


बीते साल हुआ लाभ-एमडी

बोर्ड के एमडी जेपी काल्टा का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि बीते साल की बैलेंस शीट में 5 करोड़ रुपये का लाभ दर्ज किया गया है. यह लाभ इस साल बढ़कर 50 से 55 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है. उन्होंने कहा कि हालांकि यह मामूली लाभ है, लेकिन इससे सकारात्मक वातावरण बनने की उम्मीद है.यहां यह बताना भी जरूरी है कि जितना भी फायदा बोर्ड को होता है, उसका एक बड़ा हिस्सा ऋण का ब्याज चुकाने में चला जाता है.

इसलिए फायदे में नहीं बोर्ड
बोर्ड को होने वाले नुकसान के लिए सबसे बड़ा कारण बिजली दरों में बढ़ौतरी न होना है. बोर्ड की ओर से हर साल बिजली दरों में 10 फीसदी की बढ़ौतरी की मांग की जाती है, लेकिन राजनीतिक कारणों से कड़े फैसले नहीं लिए जाते हैं. कमर्शियल यूज के लिए करीब 5 रुपये 60 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली बेची जा रही है, जबकि घरेलू उपभोक्ताओं को करीब 3 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली दी जा रही है. घरेलू उपभोक्ताओं के लिए सरकार सब्सिडी भी देती है, जिससे आम जनता पर कम बोझ पड़ता है. ऐसे में दरें बढ़ जाएं तो राजनीतिक तौर पर नुकसान झेलना पड़ता है.
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बोर्ड में खाली हैं पद
बोर्ड में कर्मचारियों के हजारों पद खाली पड़े हैं, जिसकी वजह से राजस्व इक्ठ्ठा नहीं हो पाता है. कई सरकारी विभाग ऐसे हैं, जिन पर हजारों करोड़ रुपये के बिजली के बिल बकाया है. ट्रांसमिशन एंड डिस्ट्रिब्यूशन लॉसिज़ की बात करें तो यह 11 फीसदी के करीब है.

केंद्र की योजना का लाभ नहीं
केंद्र की उदय योजना से भी बोर्ड को लाभ नहीं मिल पाया है. उदय योजना के लागू होने के बाद बोर्ड के ऋण को राज्य सरकार को सस्ती दरों पर वहन करना था. इसको लेकर कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है. केंद्र की बिजली को लेकर सभी योजना का लाभ बोर्ड को मिलना था, जो कि नहीं मिल पाया है. इसके तहत ट्रांसमिशन नुकसान को 3 फीसदी तक लाने का बात कही गई थी, जोकि नहीं हो पाया है. मंदी के दौर में उद्योगों से मांग कम होने से बोर्ड की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. बोर्ड की 60 फीसदी आय कमर्शियल यूज से आती है. इसके तहत 6 से 4 हजार करोड़ रुपये की आय बोर्ड को होती है. 2013 में कमर्शियल यूज में 17 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, जोकि अब घटकर 2 से 3 फीसदी तक पहुंच गई है.

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First published: October 4, 2019, 10:29 AM IST
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