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Exclusive: योगी सरकार की राह पर प्रशासन, एडवांस स्टडीज का नाम बदलने की तैयारी!

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज शिमला. (FILE PHOTO)

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज शिमला. (FILE PHOTO)

Indian Institute of Advance Studies Shimla: एडवांस स्टडीज संस्थान को आजादी से पहले वॉयसराय लॉज (Viceroy Lodge) के रूप में जाना जाता था. गर्मियों में यहीं से अंग्रेज शासन चलाते थे. आजादी के बाद इसे राष्ट्रपति निवास (President House) में तब्दील कर दिया गया. 1964 में इसे रिसर्च संस्थान में बदल दिया गया.

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शिमला. अंग्रेजी शासन (‌British Rule) से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन और भारत-विभाजन (Indo-Pakistan Partition) तक की कई घटनाओं के इतिहास को समेटे हिमाचल के शिमला के एडवांस स्टडीज संस्थान (Indian Institute of Advance Study Shimla) का नाम बदलने वाला है. पुख्ता सूत्रों के अनुसार, एडवांस स्टडीज प्रशासन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार (Yogi Government) की राह पर है.

संस्थान प्रशासन से ऐतिहासिक धरोहर संभल नहीं रही और नाम बदलने की कवायद शुरू कर दी गई है. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि पूरी बिल्डिंग के किस-किस कक्ष का नाम बदला जाना है. भवनों के नाम स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े राष्ट्रीय नेताओं, शिक्षा विदों और ऋषि मुनियों के नाम पर रखने पर भी बहस चल रही है.

प्रस्ताव तैयार कर लिया
संस्थान के कर्ता-धर्ताओं ने प्रस्ताव तैयार कर लिया है और गवर्निंग बॉडी में चर्चा चल रही है. गवर्निंग बॉडी से जुड़े एक सदस्य ने इसकी पुष्टि की है. संस्थान के निदेशक इसे लेकर काफी उत्साहित हैं और अगर गवर्निंग बॉडी से पास हो जाता है तो केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय इस पर मुहर लगाएगा. मंत्रालय की मंजूरी के बाद ही नाम बदले जा सकेंगे.

1884 से लेकर 1888 के बीच इस भवन का निर्माण किया गया. यह बिल्डिंग शिमला समझौते से लेकर कई ऐतिहासिक बातों की गवाह है.
1884 से लेकर 1888 के बीच इस भवन का निर्माण किया गया. यह बिल्डिंग शिमला समझौते से लेकर कई ऐतिहासिक बातों की गवाह है.


इस तरह से बदलाव की तैयारी
जिन भवनों के नाम बदले जाने की जानकारी मिली है, उसमें मुख्य भवन से लेकर ऑवजरवेटरी हॉउस, स्केवयर हॉल, कर्जन हॉउस, कॉर्टिन हॉउस और सिद्धार्थ विहार प्रुमख हैं. 100 एकड़ भूमि में फैले इस संस्थान में ब्रिटिशकाल की कॉटेज भी हैं. मुख्य भवन में 120 कमरे हैं, जिसमें 3 फोटो गैलरी हैं. 1 लाख 80 हजार से ज्यादा किताबों वाली लाइब्रेरी, दरबार हॉल और इंडोर स्वीमिंग पूल भी है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीड (IIAS) को साल 1965 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने रिसर्च के लिए समर्पित किया था. तब से यहां उच्चतर अध्ययन संस्थान चल रहा है.

भारत पाकिस्तान विभाजन की पटकथा भी इसी बिल्डिंग में लिखी गई थी.
भारत पाकिस्तान विभाजन की पटकथा भी इसी बिल्डिंग में लिखी गई थी.


इमारत की हालत खस्ता
अहम बात यह है कि इमारत के हालत खराब है. साल 1888 में निर्मित इस ऐतिहासिक धरोहर के भवन की हालत बेहद खस्ता है. इमारत में कई कमरों में पानी टपकता है, छत्त की हालत खराब है. बेसमेंट में लॉन्ड्री, किचन विंग और स्टोर खस्ताहाल है. इसकी मरम्मत के लिए केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने 4 साल पहले 66.38 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की थी, लेकिन यह राशि सैद्धांतिक मंजूरी तक ही सीमित रही. अब तक मरम्मत कार्य शुरू नहीं हो पाया है. इस ओर प्रशासन का ज्यादा ध्यान नहीं है. इतिहास को बचाने की योजना फिलहाल कामयाब होती नजर नहीं आ रही.

स्वायत्त संस्थान के नाम पर मनमानी
बड़ा सवाल संस्थान की कार्यप्रणाली पर है. कई शिक्षाविदों का कहना है कि संस्थान की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है. स्वायत संस्थान होने के नाम पर  मनमाने तरीके से फैसले लिए जाते हैं, जिसके बारे में ज्यादा लोगों को पता ही नहीं होता. रिसर्च फैलो के चयन पर भी कई बार उंगलियां उठती हैं. जो फैलो यहां पर आते हैं, उनमें कई फैलो अलग-अलग तरह के सवाल उठाते रहते हैं. बड़ी बात यह भी है कि इस संस्थान में जनहित के लिए किसी तरह की कोई रिसर्च नहीं होती. जनता के पैसे से चलने वाले इतने बड़े संस्थान में जनता के लिए कुछ नहीं होता. जो शोध होता है उसका दायरा सीमित है. संस्थान ने यह कभी नहीं बताया कि आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा को लेकर किस तरह का शोध हुआ है.

कहां खर्च होती है आय
जो बजट मिलता है, वह कहां खर्च होता है. साथ ही यहां घुमने के लिए आने वालों को टिकट लेना पड़ता है, वो पैसा कहां जाता है. इसके बारे में कोई जानकारी सावर्जनिक नहीं की जाती है. कई फैसले सवालों के घेरे में है. यहां काम करने वाले कॉन्ट्रेक्ट और ऑउटसोर्स कर्मचारियों के भी कई मुद्दे हैं.

बिल्डिंग का ऐतिहासिक महत्व
एडवांस स्टडीज संस्थान को आजादी से पहले वॉयसराय लॉज के रूप में जाना जाता था. गर्मियों में यहीं से अंग्रेज शासन चलाते थे. आजादी के बाद इसे राष्ट्रपति निवास में तब्दील कर दिया गया. 1964 में इसे रिसर्च संस्थान में बदल दिया गया. बता दें कि हैनरी इर्विन ने इस बिल्डिंग का आर्किटेक्चर तैयार किया था. 1884 से लेकर 1888 के बीच इस भवन का निर्माण किया गया. यह बिल्डिंग शिमला समझौते से लेकर कई ऐतिहासिक बातों की गवाह है. इसके अलावा, भारत-पाकिस्तान विभाजन की पटकथा भी इसी बिल्डिंग में लिखी गई थी.

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