हिमाचल की आर्थिकी पर असर: ‘चोर दरवाजे’ से भारत पहुंच रहा ईरानी सेब, चीन भी करेगा घुसपैठ

ईरान की नजर न केवल हिमाचल बल्कि हमारे पड़ोसी जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के सेब पर भी है.

ईरान की नजर न केवल हिमाचल बल्कि हमारे पड़ोसी जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के सेब पर भी है.

Apple in Himachal: हिमाचल में सालाना करीब 10 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है. हिमाचल की जीडीपी में सेब की हिस्सेदारी 7 फीसदी से ज्यादा है. जम्मू-कश्मीर में हर साल लगभग 22 लाख मीट्रिक टन और उत्तराखंड में करीब 1 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है.

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शिमला. हिमाचल प्रदेश (Apple) की करीब 5 हजार करोड़ रुपये की सेब (Apple) की आर्थिकी पर ईरान की बुरी नजर है. ईरान की नजर न केवल हिमाचल बल्कि हमारे पड़ोसी जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के सेब पर भी है. हिल स्टेट हॉर्टीकल्चर फोरम का यह मानना है. हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के सेब बागवानों ने ये फोरम बनाया है.

हिमाचल के शिमला (Shimla) जिले के रोहड़ू क्षेत्र के रहने वाले सेब बागवान हरीश चौहान इस फोरम के समन्वयक हैं. हरीश चौहान फल-फूल सब्जी उत्पादक संघ के प्रदेशाध्यक्ष भी हैं. इनका कहना है कि चोर रास्ते से अवैध तरीके से ईरान का सेब भारत पहुंच रहा है, जिससे खासा नुकसान हो रहा है और आने वाले समय में ये बड़ी चुनौती का रूप धारण कर लेगा.

एग्रीमेंट के तहत होता है व्यापार

हरीश चौहान ने बताया कि सॉउथ एशियन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट(SAFTA) जो भारत, नेपाल, श्रीलंका, बांगलादेश, पाकिस्तान और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के बीच हुआ है. इस एग्रीमेंट के तहत इन देशों के बीच जो व्यापार होता है, वो ड्यूटी फ्री होता है यानि इंपार्ट ड्यूटी(आयात शुल्क) नहीं लगती है. ईरान भले ही भारत का मित्र देश है, लेकिन इस संधि का हिस्सा नहीं है. अफगानिस्तान में करीब एक लाख मीट्रिक टन सेब होता है, जिसमें से करीब 20 हजार मीट्रिक टन सेब भारत पहुंचता है. हरीश चौहान का कहना है कि ईरान अफगानिस्तान के रास्ते भारत में अवैध तरीके से अपना सेब भेज रहा है. ईरान अपना सेब बंदरगाहों पर नहीं उतारता, उसे बाघा बॉर्डर के जरिए भारत पहुंचाया जा रहा है, ताकि ऐसा लगे कि सेब अफगानिस्तान से आ रहा है. इस तरह से आयात शुल्क भी नहीं लगता.  ईरान की माली हालत खराब है, उस पर यूएनओ के कुछ प्रतिबंध भी लगे हैं. ईरान से जो सेब भारत आता है वो प्रति क्रेट 400-500 रू. किलो बिक रहा है, एक क्रेट में 9 किलोग्राम सेब होता है. ईरान के लिए ये फायदे का सौदा है. ईरान का सेब सस्ता होने से हिमाचल,उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के सेब की पूछ कम होने लगी है. खासकर, उस सेब को नुकसान सबसे ज्यादा है जो स्टोर में रखा हुआ है. जानकारी के मुताबिक, साल 2017-18 में ईरान से 42 हजार मीट्रिक टन, 2019-20 में 18 हजार मीट्रिक टन और 2020-21 में अब तक 20 हजार मीट्रिक टन सेब भारत पहुंचा है. इससे भारत सरकार को भी खासा नुकसान हो रहा है.
चीन कर सकता है घुसपैठ

फोरम का मानना है कि चीन भी अपने सेब की घुसपैठ कर सकता है. भारत में चीन के सेब के आयात पर जून 2016 से रोक लगी हुई है. चीन नेपाल या श्रीलंका के रास्ते अपने सेब की घुसपैठ भारत में कर सकता है. हरीश चौहान का कहना है कि अगर पीक सीजन के दौरान ईरान और चीन का ये सेब भारत आना शुरू हुआ तो सेब की आर्थिकी को बड़ा झटका लगेगा. हिमाचल के 1 लाख से ज्यादा सेब बागवान तबाह भी हो सकते हैं.

संजीव चौहान ने कहा कि 5 साल बाद इसका पौधा फल देने लगता है.



सेब पर आयात शुल्क बढ़ाए जाए

हरीश चौहान का कहना है कि इस खतरे को देखते हुए तीनों प्रांतों के बागवानों ने मिलकर ये फोरम बनाया है. हाल ही में जम्मू-कश्मीर में फोरम के सदस्यों की बैठक भी हुई है. ये फोरम केंद्र और अपनी-अपनी राज्यों सरकारों के समक्ष इस मुद्दे को उठाएंगे. फोरम की मुख्य मांग है कि सेब को स्पेशल कैटिगरी में रखा जाए और आयात शुल्क 100 फीसदी किया जाए. साथ ही सेब पर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू किया जाए.

इतना होता है सेब

हिमाचल में सालाना करीब 10 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है. हिमाचल की जीडीपी में सेब की हिस्सेदारी 7 फीसदी से ज्यादा है. जम्मू-कश्मीर में हर साल लगभग 22 लाख मीट्रिक टन और उत्तराखंड में करीब 1 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है.

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