हिमाचल में कृषि सुधार कानूनों के बीच मक्‍के की कीमत हुई आधी, 24 के बजाय 10 रुपये किलो बिका

हिमाचल में मक्की के दाम गिरे.
हिमाचल में मक्की के दाम गिरे.

मक्‍के की कीमतों में गिरावट से किसानों को उचित मूल्‍य नहीं मिल पा रहा है. इसकी वजह कोरोना संकट को बताया जा रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 22, 2020, 7:00 AM IST
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शिमला. कृषि सुधार कानूनों (Agro Laws) को लेकर छिड़ी सियासी लड़ाई के बीच हिमाचल में मक्‍के (Maize) के दाम में आधे से ज्‍यादा की गिरावट दर्ज की गई है. प्रदेश के मैदानी भागों में मक्‍के और गेहूं भी नकदी फसल में शुमार हैं, लेकिन इस बार किसानों को मक्‍के के उचित दाम नहीं मिल पाए हैं. कोरोना (Coronavirus) संकट के चलते दामों में भारी कमी दर्ज की गई है. कांगड़ा, ऊना, पांवटा साहिब सहित कई मैदानी क्षेत्रों में मक्‍के के दाम 24 रुपये प्रति किलो से गिरकर 10 रुपये तक पहुंच गए हैं.

मक्की के दाम गिरने पर राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष रमेश धवाला ने भी चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि प्रदेश के ऊपरी क्षेत्रों में जहां सब्जी और फल प्रति व्यक्ति आय बढ़ाती है तो वहीं निचले क्षेत्रों में मक्‍के और गेहूं का योगदान है. फिर भी यहां पर इस बार अच्छे दाम नहीं मिल पाए हैं. हालांकि, उन्होंने इसे कृषि सुधार कानूनों का असर न बताते हुए कहा कि नए कानूनों के तहत किसान-बागवान कहीं पर भी अपना उत्पाद बेच सकता है. विपक्ष इन कानूनों को लेकर बेवजह हो हल्ला मचा रहा है.

धवाला ने की बीयर फैक्टरी की पैरवी
राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष एवं ज्वालामुखी से विधायक रमेश धवाला ने मक्‍के के गिरते दामों के बीच हिमाचल में बीयर फैक्टरी खोलने की सरकार को सलाह दी है. धवाला ने कहा कि इस बारे में वे सीएम जयराम ठाकुर से भी बात करेंगे और इंडस्ट्री मिनिस्टर को भी इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए. जहां पर मक्‍के-गेहूं की अच्छी फसल होती है, वहां पर बीयर फैक्टरी के लिए जगह ढूंढनी चाहिए. इससे किसानों को मक्‍के और गेहूं के अच्छे दाम मिल सकेंगे. उनकी आय में भी बढ़ोतरी होगी. किसान अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भी गेहूं बेचना चाहेगा तो उससे उसे फायदा नहीं होगा, क्योंकि हिमाचल में चुनिंदा जगह पर ही कनेक्शन सेंटर हैं. किसान की पूरी रकम किराये में ही चली जाएगी.
खैर कटान को कानूनी मान्यता देने का सुझाव


रमेश धवाला अक्सर चर्चाओं में रहने वाले नेता हैं. धवाला ने कभी संगठन के एक नेता के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया था. फिलहाल वे शांत हैं. रमेश धवाला ने इससे पहले भी सरकार को खैर कटान की अनुमति देने का सुझाव दिया था. कांगड़ा जिला सहित प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में पुराने खैर के पेड़ हैं. विधानसभा में भी इस मामले को उठा चुके हैं. धवाला का मानना है कि अगर खैर कटान के लिए कानूनी अनुमति दी जाती है तो हिमाचल का पूरा कर्ज अकेला खैर ही निपटा सकता है. वैसे भी खैर की तस्करी हो रही है, जिससे प्रदेश के राजस्व को ही नुकसान हो रहा है. हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इस मामले में कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई है.
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