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शहीद के गांव में पालकी है मरीजों का ‘सहारा’, पत्नी बोलीं-4 दिन सम्मान, पूरा जीवन अपमान

चंबा के शहीद जगदीश चंद की फाइल फोटो और शहीद के भाई से मिलते संजय शर्मा.

चंबा के शहीद जगदीश चंद की फाइल फोटो और शहीद के भाई से मिलते संजय शर्मा.

चंबा के भटियात की बलयाणा पंचायत के बासा गांव के शहीद जगदीश चंद 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस में हुए आतंकवादी हमले में शहीद हुए थे.

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हिमाचल प्रदेश की धरती को वीरों की धरती कहा जाता है. करीबन हर घर से फौजी मिल ही जाता है. जब भी देश पर सकंट होता है तो हिमाचल के जवानों ने बढ़-चढ़कर  शहादत दी है. लेकिन उनकी शहादत के बाद परिजनों को बेरुखी का सामना करना पड़ता है.

कुछ ऐसी ही बेरुखी का सामना आज चंबा जिले के शहीद परिवार को करना पड़ रहा है. चंबा के भटियात की बलयाणा पंचायत के बासा गांव के शहीद जगदीश चंद 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस में हुए आतंकवादी हमले में शहीद हुए थे. इनके गांव तक आज भी सुविधा नहीं मिल पाई है.
जगदीश चंद का पार्थिव शरीर जब उनके गांव बलाणा लाया गया था तो सड़क सुविधा न होने के चलते सेना की गाड़ियां घर तक नहीं पहुंच पाई थी.

ये घोषणाएं हुई
शहीद के परिवार के लिए आवाज उठाने समाजसेवी संजय शर्मा बताते है कि अंतिम संस्कार के दौरान तत्कालीन वन मंत्री ने घोषणाओं की झड़ी लगाई. कहा-गांव को एक माह तक पक्की सड़क से जोड़ा जाएगा. जगदीश चंद के नाम का एक गेट बनाया जाएगा. सिहुंता कॉलेज का नाम उनके नाम पर रखा जाएगा और उनके नाम पर डिस्पेंसरी होगी, लेकिन ये बातें महज घोषणाओं तक ही सिमट कर रह गई.

आज भी सड़क न होने पर सामान और मरीजों को कंधों पर लेकर जाना पड़ता है. घर कंधे पर सिलेंडर लेकर जाते हुए जगदीश के छोटे भाई 2 किलोमीटर चलने के बाद घर पहुंचे. बताते हैं कि गांव में कोई बीमार हो जाता है तो पालकी ही एक मात्र सहारा है.

ये बोले स्थानीय विधायक
खुद फौज से रिटायर हुए चंबा के भटियात विधानसभा क्षेत्र के विधायक विक्रम जरयाल का कहना है कि तकनीकी कारणों से भी सड़क निर्माण नहीं हो पाया है. साथ है लोग भी जमीन देने में आनाकानी कर रहे हैं. इसके अलावा, तकनीकी वजहें हैं. खड़ी चढ़ाई होने की वजह से सड़क का ग्रेड सही नहीं है. हालांकि, उन्होंने कहा कि घोषणा की गई है तो सड़क जरूर बनेगी. साल के अंत तक गांव तक सड़क पहुंचाने के लिए कोई ना कोई तरीका निकाला जाएगा.

बातचीत के दौरान रो पड़ीं पत्नी

संजय शर्मा के अनुसार, शहीद जगदीश की पत्नी से इस बारे में बात करने पर रोते हुए कहती हैं कि अब मैं क्या बोल सकती हूं. सरकार सिर्फ बातें करती हैं, करती कुछ नहीं. कहती हैं कि चार दिन का सम्मान मिलता है और फिर पूरा जीवन अपमान सहना पड़ता है.

शहीद की पत्नी के साथ संजय शर्मा.


जगदीश चंद की शहादत
पठानकोट एयरबेस पर हमले के दिन सुबह 6 बजे जगदीश चंद अपने कमरे से चाय पीने के लिये निकले. इस दौरान उन्होंने 3 आंतकवादियों को हथियारों सहित कैंप की तरफ जाते देखा.

उस समय वह निहत्थे थे, लेकिन उन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर एक आतंकवादी से बन्दूक छीन ली और उसे मार गिराया, लेकिन इस दौरान बाकी 2 बचे आंतकवादी ने उन्हें गोलियों से भून दिया था. इसके बाद वह शहीद हो गए थे.

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