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Kisan Andolan: बागवान हरीश चौहान बोले-कंपनियों को फसल बेचने से सेब बागवानों को फायदा

हिमाचल में सेब का उत्पादन.
हिमाचल में सेब का उत्पादन.

केंद्र ने 70 साल बाद कृषि में सुधार लाया है, लेकिन किसानों की बहुत सी मांगे जायज हैं, उनकी मांगे पूरी नहीं होती तो जल्द ही वो भी किसान आंदोलन में शामिल होंगे.

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शिमला. नए कृषि कानूनों (Agriculture) के खिलाफ अन्नदाता आंदोलन पर हैं. पुरानी मंडी (Old Mandi System) व्यवस्था जारी रखी और कॉरपोरेट की एंट्री का विरोध किया जा रहा है. किसानों की लूट की बात कही जा रही है, लेकिन हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में तस्वीर थोड़ी अलग है. शिमला जिले के जिन सेब बागवानों (Apple Grower) ने अपनी फसल कंपनियों और बाहर से आने वाले व्यापारियों को सीधे बेची है, उनको फायदा हुआ है.

रोहड़ू क्षेत्र के उत्कृष्ट बागवान हरीश चौहान का कहना है कि उन्होंने इस साल अपनी फसल का 20 प्रतिशत हिस्सा कंपनियों को और 20 फीसदी हिस्सा व्यापारियों को सीधे बेचा, जिससे उनको 4 से 5 लाख रुपये का मुनाफा हुआ, लेकिन वो ये चाहते हैं कि सेब समेत अन्य फलों और सब्जियों पर एमएसपी निर्धारित किया जाए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो छोटे और मझौले किसान-बागवानों को नुकसान होगा. हरीश चौहान फल, सब्जी और फूल उत्पादक संघ के प्रदेशाध्यक्ष भी हैं और किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं.

रोहड़ू के बागवान और हरीश चौहान फल, सब्जी और फूल उत्पादक संघ के प्रदेशाध्यक्ष भी हैं.




ऐसे हो रहा फायदा
हरीश चौहान का कहना है कि बाहरी राज्यों से जो व्यापारी सीधे उनके बागीचे में आते हैं और जो कंपनिया सेब खरीद रही हैं उससे पैकिंग,बॉक्स से लेकर ट्रांसपोर्ट का खर्चा बच रहा है और साथ ही कमीशन भी नहीं देनी पड़ती. कंपनियों सेब को क्रेट्स में लेकर जाती हैं. व्यापारी सीधे बागीचे में आते हैं और कंपनियों के खरीद केंद्र ज्यादा दूर नहीं हैं. हरीश चौहान का कहना है इस साल उनके करीब 100 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हुआ. यानी लगभग 4 हजार बॉक्स उत्पादित किए गए हैं. उन्होंने 20 फीसदी सेब एपीएमसी की मंडियों में बेचा, 20 प्रतिशत सीधे व्यापारियों, 20 फीसदी सेब कंपनियों और 20 प्रतिशत सेब अभी कोल्ड स्टोर में रखा हुआ है, मार्किट अच्छी होने पर बेच देंगे.



एपीएमसी में सुधार जरूरी

हरीश चौहान का कहना है कि एपीएमसी बंद नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें बड़े पैमाने पर सुधार होना चाहिए. कंपनियों के संबंध में नुकसान ये है कि उनकी ग्रेडिंग हाई होती है और केवल अच्छी गुणवत्ता वाला सेब की ही खरीद की जाती है. ऐसे में छोटे बागवानो नुकसान होता है. बड़ा बागवान तो अच्छा पैसा खर्च कर गुणवत्ता वाला सेब तैयार कर लेता है, लेकिन छोटे बागवान के लिए ये संभव नहीं है.

किसान आंदोलन में शामिल होंगे बागवान

उनका कहना है कि केंद्र ने 70 साल बाद कृषि में सुधार लाया है, लेकिन किसानों की बहुत सी मांगे जायज हैं, उनकी मांगे पूरी नहीं होती तो जल्द ही वो भी किसान आंदोलन में शामिल होंगे.
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