हिमाचल के CM के करीबी अफसर को करोड़ों के घोटाले में बिना जांच के क्लीन चिट!

आरटीआई के जरिए जो खुलासे हुए हैं, उसके मुताबिक सुनियोजित तरीके से आरोपी अधिकारी के खिलाफ बिना जांच किए ही मामले को रफा-दफा कर दिया गया.
आरटीआई के जरिए जो खुलासे हुए हैं, उसके मुताबिक सुनियोजित तरीके से आरोपी अधिकारी के खिलाफ बिना जांच किए ही मामले को रफा-दफा कर दिया गया.

हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में आबकारी एवं कराधान विभाग में करोड़ों रुपये के घोटाले (Scam) में एक अफसर को बिना जांच के ही क्लीनचिट दिए जाने को लेकर उठ रहे सवाल.

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शिमला. हिमाचल में आबकारी एवं कराधान विभाग में 12 करोड़ 62 लाख 54 हजार 486 रुपये के घोटाले (Scam) के मामले में बड़े अफसरों पर शक की सूई घूम रही है. सूचना के अधिकार यानी आरटीआई (RTI) के जरिए जो खुलासे हुए हैं, उसके मुताबिक सुनियोजित तरीके से आरोपी अधिकारी के खिलाफ बिना जांच किए ही मामले को रफा-दफा कर दिया गया. मामले को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर पैसे के खेल की भी आशंका है. साथ ही नजर आ रहा है कि मुख्यमंत्री को गुमराह कर अधिकारी पर लगे सभी आरोपों को खारिज किया गया और क्लीन चिट दे दी गई. जिस विभाग से प्रदेश को 70 फीसदी आय होती है, उस विभाग में इस तरह के घोटाले पर अब सवाल उठ रहे हैं.

बिना जांच के क्लीनचिट
आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक सरकार को करोड़ों को चूना लगाने के आरोपी, आबकारी एवं कराधान विभाग के अधिकारी सोमदत्त शर्मा को क्लीन चिट दे दी गई है. सोमदत्त शर्मा साल 2005 से 2010 तक सोलन जिले के बद्दी में ईटीओ और आंकलन अधिकारी रहे. उन पर आरोप है कि पद का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने 15 कंपनियों को लाभ पहुंचाया. नियमों के तहत कंपनियों से 12.50 फीसदी के हिसाब से कर लिया जाना चाहिए था. लेकिन आरोपी अधिकारी ने केवल 4 प्रतिशत के हिसाब से टैक्स लिया. इसके लिए जाली मुहर का इस्तेमाल किया, जिससे सरकार को करोड़ों का चूना लगा.

साल 2012 में ये मामला सामने आया था. उस वक्त विभाग के प्रधान सचिव ने चार्जशीट की. उसके बाद तीन आरोप पत्र तैयार किए गए. सूत्र बता रहे हैं कि इस मामले को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर अधिकारियों और कर्मचारियों को रिश्वत दी गई, ताकि सीएम को गुमराह किया जा सके.
आरटीआई में हुआ ये खुलासा


सोमदत शर्मा पर आरोप है कि उसने सोलन जिले के बद्दी स्थित मेसर्स बजट साइन कंपनी के साथ मिलीभगत की. उच्च अधिकारियों के द्वारा पेश की गई गलत रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने आरोप खारिज कर दिए. साल 2012 में तत्तकालीन प्रधान सचिव, आबकारी एवं कराधान ने इस पूरे मामले का अवलोकन किया तो यह घोटाला सामने आया. उसके बाद सोमदत्त शर्मा पर चार्जशीट की गयी और प्रधान सचिव आबकारी एवं कराधान ने नियमों के अनुसार ज्ञापन जारी किया.

आरोप है कि आरोपी अधिकारी काफी प्रभावशाली है और उच्चाधिकारियों के साथ मिलीभगत होने के कारण 7 वर्ष यानि 2019 तक जांच नहीं होने दी. इस मामले में ये भी बात सामने आयी है कि आरोपी अधिकारी रसूख रखता है, नीचे लेकर ऊपर तक बड़ी पहुंच है और बड़े कनेक्शन हैं. जिसके चलते सालों तक आरोपों के मामले में कुछ नहीं हुआ और 8 साल बाद मामला रफा-दफा हो गया.

आरोपी अधिकारी ने अपनी नौकरी के 21 साल बद्दी में ही बिताए हैं, जो अपने आप में बड़े सवाल खड़ा कर रहा है. जब अधिकारी का तबादला बद्दी से स्वारघाट हुआ, उसके बाद भी एक जाली स्टाम्प बनवा कर 15 कम्पनियों को लाभ पहुंचाया. जहां पर यह स्टाम्प प्रयोग में लाया गया, उन कागजों का रजिस्टर में कहीं भी लेखा-जोखा नहीं पाया गया. असली स्टाम्प सर्कल क्लर्क के पास होता है. जांच में यह पाया गया कि उस स्टाम्प के साथ कोई मेल नहीं खाता था. आरोप पत्र जारी होने के बाद इस अधिकारी ने संबंधित कम्पनी से इसको लेकर आबकारी विभाग के दक्षिणी क्षेत्र के आयुक्त के पास अपील की लेकिन वो खारिज हो गई.



टैक्स ट्रिब्यूनल ने बिठाई जांच
उसके बाद कम्पनी ने हिमाचल प्रदेश टैक्स ट्रिब्यूनल के पास अपील की. 29 अगस्त को 2013 को ट्रिब्यूनल ने जांच के लिए एक कमेटी के गठन के आदेश जारी किए. आदेशों पर आबकारी विभाग के आयुक्त ने 05 सितंबर 2013 को एक कमेटी का गठन किया. एडिशनल ईटीसी संजय भारद्वाज, एईटीसी सोलन एसके पुंडीर और ईटीओ कालाअंब प्रेम कायथ को सदस्य नियुक्त किए गए. आदेश के अनुसार कमेटी को 2 महीने में अपनी रिपोर्ट पेश करनी थी.

2 साल बाद आई जांच रिपोर्ट
जानकारी के मुताबिक कमेटी ने दो महीने के बजाए 2 साल बाद रिपोर्ट पेश की. 4 सितंबर 2015 को जो रिपोर्ट दी गई वो पूरी तरह से गलत थी. इस रिपोर्ट को आबकारी विभाग के स्पेशल सेक्रेटरी ने हिमाचल प्रदेश टैक्स ट्रिब्यूनल के पास अपील के लिये भेजने के आदेश दिए लेकिन रिपोर्ट के भेजा ही नहीं गया.

एक और आरोप पत्र

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार 30 मार्च 2019 को आबकारी विभाग के सचिव ने  पत्र संख्या EXN-B(14)-1/(2018)-Loose Shimla के तहत एक आरोप पत्र सम्बंधित अधिकारी को जारी किया. 1 जुलाई 2019 को विभाग के तत्कालीन प्रधान सचिव ने मुख्य सचिव को जांच रिपोर्ट भेजी थी. 1 अगस्त 2019 को तत्कालीन मुख्य सचिव ने लिखा था कि इस समय जांच को बन्द करने का कोई औचित्य नहीं है, जिस पर सरकार ने 17 अगस्त 2019 को अपनी जांच की स्वीकृत दी थी. जिस पर अक्तूबर महीने में एक जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था. आरटीआई से मिली जानकारी में पता चला कि नोटिंग शीट के पृष्ठ संख्या 47 में विशेष सचिव ने 3 फरवरी 2020 को लिखा है कि 22 जनवरी 2020 को आरोपी अधिकारी सोमदत्त शर्मा की ओर से दिया गया जवाब नहीं लिया जा सकता, क्योंकि यह अधिकारी 30 अक्तूबर 2019 को गठित कमेटी के सामने पेश ही नहीं हुआ था.

सीएम को गुमराह कर बंद करवाई गई जांच
इस सबके बावजूद 11 मई 2020 को आरोपी अधिकारी के खिलाफ चल रही जांच को बंद करने के लिए सरकार के साथ पत्राचार किया गया. आला अधिकारियों की मिलीभगत के चलते जांच कमेटी की रिपोर्ट के बिना ही तत्कालीन आबकारी एवं कराधान विभाग के प्रधान सचिव ने सरकार से सिफारिश की कि जांच बंद कर दी जाए, जिस पर सरकार ने 22 मई 2020 को अपनी स्वीकृति दे दी और विभाग ने 27 मई 2020 को जांच बन्द करने के आदेश पारित कर दिए. अब आशंका है कि इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री को अंधेरे में रखा गया.

आरटीआई के दस्तावेज बताते हैं कि आरोपी कभी भी जांच अधिकारी के समक्ष पेश नहीं हुआ. आरोप पत्र की जांच नहीं हुई और विभाग की रिपोर्ट के अनुसार जाली स्टाम्प को लेकर जांच को बन्द करने के सन्दर्भ में किए गए पत्राचार में कोई जिक्र नहीं किया गया है. सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग के तत्तकालीन सचिव और कमीशनर ने सरकार को गुमराह किया. मुख्य सचिव के आदेशों को भी विभाग के प्रधान सचिव ने खारिज किया.

वर्तमान आयुक्त ने ये कहा 
अब इस मामले पर आबकारी एवं कराधान विभाग के वर्तमान आयुक्त रोहन ठाकुर का कहना है कि सरकार ने चार्जशीट को ड्रॉप करने के बाद कमेंट्स मांगे थे. इस पर विभाग ने दो दिन पहले अपने कमेंट्स में लिखा है कि कुछ आरोपों की जांच नहीं हुई है. ये वो आरोप हैं जो पहले आरोप पत्र का हिस्सा नहीं हैं. अब देखना होगा कि सरकार इस मामले पर आगे क्या कार्रवाई करती है.
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