होम /न्यूज /हिमाचल प्रदेश /हिमाचल की 4 हजार करोड़ की सेब आर्थिकी पर संकट, स्कैब रोग की जद में आए बगीचे

हिमाचल की 4 हजार करोड़ की सेब आर्थिकी पर संकट, स्कैब रोग की जद में आए बगीचे

हिमाचली सेब पर स्कैब बीमारी का हमला.

हिमाचली सेब पर स्कैब बीमारी का हमला.

विभाग के निदेशक डॉ. मनोहर लाल धीमान ने कहा कि अखरोट के आकार के सेब पर मैनकोजेब या प्रोपिनेब या डोडिन अथवा माईक्लोबुटानि ...अधिक पढ़ें

    हिमाचल की 4 हजार करोड़ रुपये की सेब आर्थिकी पर संकट छा गया है. कई क्षेत्रों में सेब पर स्कैब रोग की मार पड़ गई है. सेब के बाग स्कैब की चपेट में आ गए हैं. बागवान इससे सकते हैं आए गए हैं. हालांकि बागवानी विभाग भी अलर्ट हो गया है और निदेशालय स्तर पर मॉनिटरिंग कमेटी भी गठित कर दी है.

    यहां-यहां बीमारी का हमला
    जानकारी के मुताबिक शिमला के खड़ापत्थर सहित कुल्लू जिले की बंजार और मंडी की जंजैहली, गाड़ागुशैणी और थुनाग क्षेत्र में सेब के फल और पत्तों पर स्कैब नाम का फंगस पनप गया है, जिससे सेब पूरी तरह तबाह होने लगा है. हालांकि, स्कैब के लक्षण मिलने के बाद बागवानी विभाग अलर्ट पर आ गया है. कृषि विज्ञान केंद्रों और नौणी बागवानी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को भी स्कैब रोग की रोकथाम और लोगों को जागरूक करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

    सब्जी उत्पादक संघ ने की ये मांग
    फल, फूल एवं सब्जी उत्पादक संघ के प्रदेशाध्यक्ष हरीश चौहान ने कहा कि बागवान चिंतित हो उठा है, जिन क्षेत्रों में फंगस आया है उस क्षेत्र में बागवानी विभाग निशुल्क दवाइयां वितरित करें. क्योंकि कई बागवान दवाइयां नहीं खरीद सकते हैं. वहीं दूसरी ओर बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. मनोहर लाल धीमान ने कहा कि विभाग पूरी तरह सचेत है. लोगों को जागरूक किया जा रहा है. दवाइयों के छिड़काव के लिए बागवानों को जागरूक किया जा रहा है, लेकिन मौसम बाधक बना हुआ है. क्योंकि बारिश होने के कारण दवाई असर नहीं कर सकेगी.

    इस वजह से फैली बीमारी
    दरअसल, इस बार वातावरण में ज्यादा नमी के चलते यह फंगस पैदा हुआ है. अभी भी शिमला के कई क्षेत्रों में धुंध रहती है, जिससे फंगस का धुंध के साथ दूसरे क्षेत्रों में फैलने का खतरा बना हुआ है. हिमाचल में 1982 में भी स्कैब रोग आया था, जिसने प्रदेश की बागवानी पर खासा असर हुआ था. लेकिन उस वक्त वैज्ञानिकों के प्रयासों से इसे रोक लिया गया था. वैज्ञानिकों ने स्कैब रोग से निपटने के लिए छिड़काव सारिणी के तहत दवाई छिड़काव की एडवायजरी जारी की है.

    इन दवाओं का करें छिड़काव
    विभाग के निदेशक डॉ. मनोहर लाल धीमान ने कहा कि अखरोट के आकार के सेब पर मैनकोजेब या प्रोपिनेब या डोडिन अथवा माईक्लोबुटानिल का छिड़काव करें. इसके अलावा, टेबुकोनाजोल आठ प्रतिशत व कैप्टान 32 प्रतिशत एससी अथवा मेटीराम 55 प्रतिशत व पायराक्लोस्ट्रोबिन पांच प्रतिशत का छिड़काव भी किया जा सकता है. इसके बीस दिन के बाद टेबुकोनाजोल 50 प्रतिशत और ट्राईफ्लोक्सीस्ट्रोबिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी, प्रोपिनेब या जीनेब का छिड़काव करें.

    लगातार करें छिड़काव
    फल तोड़ने से 20-25 दिन पूर्व कैप्टान या जिरम अथवा मैटीराम 55 प्रतिशत व पायराक्लोस्ट्राबिन पांच प्रतिशत का छिड़काव करने की सलाह दी गई है. अधिक वर्षा के कारण फफूंदीनाशक दवाइयां जल्दी घुल सकती हैं और उनका असर भी कम हो जाता है, इसलिए छिड़काव घोल तैयार करते समय उसमें स्टीकर का प्रयोग आवश्यक है. इसके अतिरिक्त यह भी सलाह दी गई है कि अगर छिड़काव के एक-दो घंटे बाद बारिश हो जाती है तो दूसरे दिन फिर छिड़काव करें.

    ये भी पढ़ें: हिमाचल में भी चमकी बुखार ने लीची की मिठास की फीकी, दाम गिरे

    सैंकड़ों हरे पेड़ों पर देहरा नगर परिषद की मिलीभगत से चली आरी

     

    Tags: Apple

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें