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VIDEO: जानें क्यों, शिमला के धामी मेले में 10 मिनट तक एक-दूसरे पर बरसाए पत्थर

News18 Himachal Pradesh
Updated: October 29, 2019, 11:56 AM IST
VIDEO: जानें क्यों, शिमला के धामी मेले में 10 मिनट तक एक-दूसरे पर बरसाए पत्थर
शिमला के धामी में पत्थर बरसाते युवक.

Shimla Stone pelting Fair: इस बार दिपांशु को शगुन का पत्थर लगा और खेल को वहीं रोक दिया गया. दिपांशु का खून पहले चोराहे पर बने सत्ती के स्मारक पर, फिर मां काली को चढ़ाया गया

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शिमला. हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला (Shimla) में दिवाली के अगले दिन ‘पत्थरों की बारिश’ हुई. शिमला से सटे धामी में पौराणिक मान्यता के अनुसार, मेले में युवाओं ने एक दूसरे पर पत्थर बरसाए. शिमला के धामी के चौरा में सैंकड़ों वर्षों से यह खूनी खेल खेला जाता है. चौरा के लोग दो गुटों में बंटकर एक दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाते (Stone Pelting) हैं. ये प्रथा यहां सैकड़ों साल से चली आ रही है और इस प्रथा को आज भी स्थानीय लोग पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं.

काली मां को चढ़ाया खून
धामी की स्थानीय बोली में इसे ‘पत्थरों का बहेड’ भी कहते हैं. लोग एक-दूसरे को पूर्वनिर्धारित स्थानों से पत्थर मारते हैं. जब किसी व्यक्ति को पत्थर लग जाता है तो उसका खून माता काली के मंदिर में चढ़ा कर मेले की परंपरा को सम्पन्न किया जाता है. पुराने समय में इस इलाके में नरबलि की प्रथा थी, लेकिन बदलते दौर के साथ इस प्रथा में भी बदलाव किया गया और नरबली को खत्म कर पत्थरबाज़ी के घायल के रक्त को काली माता के समक्ष भेंट किया जाता है. इलाके के राजघराने से ताल्लुक रखने वाले राजा जगदीप सिंह का कहना है कि परम्परा अजीब है, लेकिन लोगों की आस्था इससे भी बड़ी है.

यह है मान्यता

सैंकड़ो साल पहले यहां मानव बलि की प्रथा थी. यहां के राजा की मौत के बाद उनकी रानी ने सती होने का निर्णय लिया. लेकिन रानी मानव बलि पर रोक लगाना चाहती थी, इसलिए रानी ने सती होने के बाद माता काली से बात की और गुर के माध्यम से लोगों को बताया कि मानव बलि को बंद करके अन्य व्यवस्था करे. फिर थोड़े समय तक पशु बलि का प्रावधान किया गया, लेकिन कहा जाता है की माता काली ने इसे स्वीकार नहीं किया. उसके बाद गांव में महामारी शुरू हो गई. महामारी होने से कई लोगों की मौत हो रही थी.

दिवाली का अगला दिन चुना
काली मां को इन्सानी खून चढ़ाना परंपरा थी, लेकिन रानी की इच्छा मानव बलि बंद करना थी. ऐसे में बिना बलि के माता को मानव रक्त चढ़ाने के लिए पत्थर के युद्ध की शुरूआत की गई. इसके लिए दीपावली का अगला दिन निर्धारित किया गया और आज सैंकड़ों वर्षों से यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है.
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घायल का खून देवी मां को चढ़ाया.
घायल का खून देवी मां को चढ़ाया.


युवाओं में क्रेज ज्यादा
खूनी खेल को लेकर युवाओं में सबसे ज्यादा क्रेज रहता है. काफी संख्या में युवा इस ‘पत्थर के बहेड’ में भाग लेने के लिए आते हैं और हर किसी का यही सपना होता है कि पत्थर उसे लगे और उसका खून मां भद्र काली को चढ़े. सोमवार को करीब 10 मिनट तक कटेडू और जमोगी राजवंश के लोग एक-दूसरे पर पत्थर मारते रहे. एक व्यक्ति के पत्थर से खून निकलने के बाद ही पत्थरों की बरसात बंद की गई. इस दौरान राजिन्द्र और प्रकाश को पत्थर लगने से चोटें आईं.

दिपांशु का खून देवी मां को चढ़ाया गया.
दिपांशु का खून देवी मां को चढ़ाया गया.


दिपांशु को लगा पत्थर
इस बार दिपांशु को शगुन का पत्थर लगा और खेल को वहीं रोक दिया गया. दिपांशु का खून पहले चोराहे पर बने सत्ती के स्मारक पर, फिर मां काली को चढ़ाया गया और प्राथमिक उपचार के लिए उसे अस्पताल में भर्ती किया गया. दिपांशु का कहना है कि उसे जब पत्थर लगा तो उसे बिल्कुल भी दर्द महसूस नहीं हुआ.

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First published: October 29, 2019, 11:41 AM IST
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