धामी दिवाली मेला: आस्था के नाम पर फोड़ डाले सिर, एक दूसरे पर खूब बरसाए पत्थर

दरअसल, देव भूमि हिमाचल में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो आज भी जिंदा हैं.

Reshma Kashyap | News18 Himachal Pradesh
Updated: November 9, 2018, 11:51 AM IST
Reshma Kashyap | News18 Himachal Pradesh
Updated: November 9, 2018, 11:51 AM IST
हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में आस्था के नाम पर दिवाली के अगले दिन खून लोगों का खून बहता है. शिमला के धामी में एक ऐसा खेल खेला जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग तब तक एक दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं, जब तक किसी के सिर से खून न निकल जाए. बिना किसी डर के लोग ये खूनी खेल चलता है.

कई साल से चल रही पंरपरा
पत्थर बरसाने से लोगों के सिर से खून निकलता है, काली मां के मंदिर में चढ़ाया जाता है. धामी के चौरा में सैंकड़ों वर्षों से एक खूनी खेल खेला जाता है. जिसमें चौरा के लोग दो गुटों में बंट कर एक दूसरे पर जम कर पत्थर बरसाते हैं. ये प्रथा यहां सैकड़ों सालों से चली आ रही है. इस प्रथा को आज भी स्थानीय लोग पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं.

दीपावली के अगले दिन एक मेले का आयोजन होता है, इसमें सबसे प्रमुख आकर्षण पत्थरों का युद्ध होता है. स्थानीय बोली में इसे पत्थरों का बहेड़ भी कहते हैं. लोग एक-दूसरे को पूर्वनिर्धारित स्थानों से पत्थर मारते हैं. जब किसी व्यक्ति को पत्थर लग जाता है तो उसका खून माता काली के मंदिर में चढ़ा कर मेले की परंपरा को सम्पन्न किया जाता है.

इसलिए बहाया जाता है खून
कहा जाता है कि सैंकड़ों साल पहले यहां मानव बलि की प्रथा थी. यहां का जो राजा था, उसकी जब मृत्यु हुई तो उनकी रानी ने सत्ती होने का निर्णय लिया. लेकिन रानी मानव बलि पर रोक लगाना चाहती थी, इसलिए रानी ने सत्ती होने के बाद माता काली से बात की और गुर के माध्यम से लोगों को बताया कि मानव बलि को बंद करके अन्य व्यवस्था करें. फिर थोड़ा समय तक पशु बलि का प्रावधान किया गया.

गांव में फैली महामारी
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कहा जाता है कि माता काली ने इसे स्वीकार नहीं किया. उसके बाद गांव में महामारी शुरू हो गई. महामारी होने से कई लोगों की मौत हो रही थी. काली मां को इन्सानी खून चढ़ाना परंपरा थी, लेकिन रानी की इच्छा मानव बलि बंद करना थी. ऐसे में बिना बलि के माता को मानव रक्त चढ़ाने के लिए पत्थर के युद्ध की शुरूआत की गई. इसके लिए दीपावली का अगला दिन निर्धारित किया गया और आज सैंकड़ों वर्षों से यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है.

दस मिनट तक चलता है खेल
इस खेल को करीब 10 मिनट तक खेला जाता है. जब किसी व्यक्ति के चोट लगने पर खून निकलता है तो खेल को तुरंत बंद कर दिया जाता है और उसका खून काली मां के मंदिर में चढ़ाया जाता है. जो भी इस खेल का बनता है, उसकी यही इच्छा होती है कि इस बार मां के मंदिर में खून चढ़े. मां के मंदिर में खून चढ़ना शुभ माना जाता है. दरअसल, देव भूमि हिमाचल में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो आज भी जिंदा हैं.
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