Shimla Positive Story: जब दो पत्‍न‍ियां कोरोना के मुंह से निकाल लाई अपने-अपने पति की जान

शिमला: एक-दूसरे से मोहब्बत करने वाले दंपत्ति दो दपंति की कहानी. जिसमें पत्नी की हिम्मत अपने पति मौत के मुंह से छीन कर लाई है.

शिमला: एक-दूसरे से मोहब्बत करने वाले दंपत्ति दो दपंति की कहानी. जिसमें पत्नी की हिम्मत अपने पति मौत के मुंह से छीन कर लाई है.

Corona Patients Positive Story: हिमाचल में कोरोना संक्रमण की खबरों के बीच शिमला शहर में एक-दूसरे से मोहब्बत करने वाले दंपति की कहानी है, जिसमें पत्नी की हिम्मत की दास्तान है, जो अपने पति को मौत के मुंह से छीन कर लाई है.

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शिमला. कोरोना के इस दौर में हर रोज लाखों कहानियां बन रहीं हैं और कुछ कहानियों का अंत हो रहा है. बहुत से लोग अब भी ऐसे हैं जो कोरोना को बेहद हल्के में ले रहे हैं, लेकिन जो इससे जूझ रहे हैं और जिन्होंने कोरोना को हराया है, उनकी कहानी कुछ और ही है. हिमाचल की राजधानी शिमला में तीन मरीजों की कहानी सबको हौंसला देती है. जिन्होंने अपने परिवार के सहारे कोरोना को मात दी और ये बताया कि परिवार की ताकत कितनी बड़ी होती है. एक-दूसरे से मोहब्बत करने वाले दंपति की कहानी है, जिसमें पत्नी की हिम्मत अपने पति को मौत के मुंह से छीन कर लाई है.

टुटू क्षेत्र के शिवनगर में रहने वाले 75 वर्षीय शिव राम भारद्वाज बिजली बोर्ड से रिटायर्ड हैं. कुछ समय पहले शिव राम को जुकाम हुआ, फिर सीने दर्द शुरू हुआ. अस्पताल में 2 बार कोरोना का टेस्ट करवाया, रिपोर्ट नेगेटिव आई. उसके बाद सीने में दर्द के साथ सांस लेने में तकलीफ शुरू हुई, तीसरी बार टेस्ट करवाया तो रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई. इतना पता चलते ही पूरे परिवार में मानों मातम सा छा गया, लेकिन सभी सदस्य एक दूसरे को सहारा देते रहे. शिव राम ने बताया कि एक मिनट के लिए भी अगर ऑक्सीजन की पाइप हट जाती तो सांस हलक में अटक जाती थी.

बिना पानी के जिस तरह से मछली तड़पती है. उस तरह की हालत हो जाती थी. उन्होंने बताया कि पहले वे शिमला के रिपन अस्पताल में भर्ती थे. हालत खराब होने पर उन्हें आईजीएमसी में शिफ्ट किया गया. कोरोना वॉर्ड में आसपास खांसते, दर्द से कहराते, दम तोड़ने मरीजों को देखकर हिम्मत टूटने लगी. परिवार के सदस्य फोन करके और वीडियो कॉल करके हौसला देते रहे. परिवार वालों से लगातार बात होने से कारण हिम्मत बढ़ गई और निश्चय किया कि मुझे और जीना है, मुझे लड़ना है.

कोरोना वॉर्ड में आसपास खांसते, दर्द से कहराते, दम तोड़ने मरीजों को देखकर हिम्मत टूटने लगी थी.

रोजाना दो-तीन मरीजों की मौत



शिव राम कहना है कि उनके सामने हर रोज 2-3 दिन लोग दम तोड़ते थे. उनकी लाशों को बैग में पैक होता देख कई बार खुद की हिम्मत जबाव दे जाती थी, लेकिन डॉक्टरों की मदद और परिवार की दुआओं से थोड़ा ठीक हुआ. अस्पताल के बाद घर लौटे तो उनके पास इतनी भी ताकत नहीं बची थी कि बिस्तर से उठकर सड़क तक जा सके. उनका बेटा कंधे पर ऑक्सीजन का सिलेंडर उठाता और चार आदमी उन्हें उठाते. इसी तरह घर से अस्पताल और अस्पताल से घर का सफर कटा.

सिलेंडर लेकर टॉयलेट जाते थे





घर में एक समय हालत इतनी खराब हो गई कि टॉयलेट जाने के लिए भी परिवार वालों का सहारा लेना पड़ा. सिलेंडर लेकर ही टॉयलेट में जाते थे. शिव राम की पत्नी, बेटा और बहू दिन रात उनकी सेवा में लगे रहे. कई रातें जागकर बिताईं लेकिन किसी ने उफ तक नहीं किया. उनकी बेटी और दामाद सहित करीबी रिश्तेदारों ने भी उनका हौंसला बनाए रखा. इस खतरनाक वायरस का असर इतना भयानक था कि कई बार घर पर बेहोश हो जाते और एक बार कोमा में भी चले गए. उसके बाद एक बार फिर से अस्पताल में भर्ती हुए. 4 महीनों से ज्यादा के लंबे संघर्ष के बाद आज शिव राम अपने पैरों पर खड़े होकर चलते हैं. उनकी पत्नी बिमला और बहूँ नीना ज्यादा कुछ नहीं बोल पाई, लेकिन इतना जरूर कहा कि उस घड़ी को दोबारा याद नहीं करना चाहते हैं, लेकिन एक दूसरे को संभालते हुए कोरोना को हराया है. ये पूरा परिवार सबसे अपील कर रहा है कि कोरोना के नियमों की पालना करें, एहतियात से बड़ी फिलहाल कोई दवाई नहीं है.

ये है दूसरी कहानी



51 वर्षीय राजेंद्र और उनकी 46 वर्षीय पत्नी रीता एक दूसरे से बेइंतहां प्यार करते हैं. शादी के 28 साल बीत गए, लेकिन रीता अपने पति के बिना कभी बाजार भी नहीं गई. राजेंद्र के दफ्तर के अलावा इन्होंने एक दूसरे के बगैर कभी कोई सफर नहीं किया. और जब कोरोना पॉजिटिव हुए तो वो भी एक साथ और भर्ती भी एक साथ ही हुए. इनके दो बेटे हैं. राजेंद्र ने बताया कि उन्हें भी शुरुआत में रिपन अस्पताल में भर्ती किया गया था, वो खुद को खुशकिस्मत समझते हैं कि उस दौरान उनकी पत्नी साथ थी. दोनों एक ही वॉर्ड में भर्ती हुए थे. राजेंद्र ने बताया कि शुरू के तीन दिन उन्हें कुछ भी पता नहीं था कि वो कहां हैं. कोई होश नहीं था. उनका कहना है कि हालत ये थी कि वो पानी गिलास तक नहीं उठा पाते थे. राजेन्द्र की पत्नी रीता ने बताया कि शुरू में बुखार हुआ. हम इस बीमारी को हल्के में ले रहे थे, लेकिन जैसे ही अस्पताल में भर्ती होने के बाद हालत खराब हुई तो रोंगटे खड़े हो गए.

कि रीता की तबीयत ज्यादा खराब नहीं हुई, अपने पति को संभालने लायक हालत उनकी थी.


अस्पताल में खुद ही किए कई काम



एक अच्छी बात ये रही कि रीता की तबीयत ज्यादा खराब नहीं हुई, अपने पति को संभालने लायक हालत उनकी थी. रिपन अस्पताल को शुरू में जब कोविड डेडिकेटिड अस्पताल बनाया गया, उस वक्त वहां पर ज्यादा सुविधाएं नहीं थी. स्टाफ में से किसी ने ऑक्सीजन लगाने का तरीका सिखा दिया, क्योंकि मरीज ज्यादा थे, स्टाफ कम था तो हर वक्त उनके पास कोई डॉक्टर मौजूद नहीं रह सकता था. रीता ने खुद ये सब सीखा और दिन-रात सेवा में जुटी रही. राजेंद्र को सांस लेने तकलीफ थी, तकलीफ बढ़ने के बाद रिपन से जब आईजीएमसी शिफ्ट किया गया को राजेंद्र की जुबान तोतली हो गई थी. बुखार चढ़ जाता था. ठंड लगती थी, कंपन होती थी कई बार पसीना इतना आता था कि बिस्तर गीला हो जाता था. कोरोना से बुखार ऐसा आता है कि शरीर का एक-एक अंग टूट जाता है. मरीज बेहाल हो जाता है. राजेंद्र का ऑक्सीजन लेवल भी 70 से नीचे चला गया. डॉक्टरों के भरोसे और पत्नी के सहारे राजेंद्र कुछ ठीक हुए. अस्पताल से छुट्टी मिली तो घर पर भी ऑक्सीजन सिलेंडर लगा रहा. करीब 2 महीने तक लगातार सिलेंडर के सहारे सांसे चलती रही. केवल खाना खाने के समय ही पाइप खोली जाती थी. टॉयलेट जाना हो या नहाना हो, ऑक्सीजन सिलेंडर हमेशा लगा रहा. इसके लिए राजेंद्र ने 34 हजार रुपए की ऑक्सीजन मशीन खरीदी और 7 हजार रूपए का ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदा. कभी बिजली चली जाती तो कभी वोल्टेज कम हो जाता तो रीता की खुद की सांस थम जाती थी.

कई रातें जागकर काटीं



कई रातें रीता ने जाग कर और रो-रो कर काटी. घर तक गाड़ी आती नहीं है, ऐसे में बेटे को अपने पीठ पर सिलेंडर सड़क तक ढोना पड़ता था और सड़क से गाड़ी करने के बाद उसे भरकर साथ लाना पड़ता था. बेटा जब घर पर नहीं होता था तो खुद सिलेंडर उठाकर उसे भरकर लाई हैं. 3 महीने तक ये परिवार तकलीफ में रहा और कोरोना से लड़ता रहा. 24 घंटे ये डर रहता था कि कोई अनहोनी न हो जाए, . राजेंद्र का कहना है कि इस दौरान उन्होंने मौत को साक्षात अपने सामने देखा है. अगर रीता नहीं होती तो शायद वो इस दुनिया में नहीं होते. रीता को देखकर हिम्मत आती रही और कोरोना से लड़ने का जज्बा मजबूत होता गया. इस दंपति का कहना है कि हमने इस बीमारी को शुरु में हल्के में लेकर बड़ी भूल की है, अब वे अपील कर रहे हैं कि इसे हल्के में न लें, एतियात बरतें.
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