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हिमाचल चुनाव : इन वजहों से सीएम बनने की दौड़ से बाहर हुए जेपी नड्डा
Shimla News in Hindi

VINOD KUMAR | News18Hindi
Updated: December 24, 2017, 2:53 PM IST
हिमाचल चुनाव : इन वजहों से सीएम बनने की दौड़ से बाहर हुए जेपी नड्डा
जेपी नड्डा, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री.

हिमाचल प्रदेश में भाजपा को विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद सीएम पद के लिए दिल्ली से लेकर शिमला तक मंथन हुआ. आखिरकार मंडी के सराज से जीते भाजपा विधायक जय राम ठाकुर को हिमाचल का नया सीएम चुनाव गया.

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  • Last Updated: December 24, 2017, 2:53 PM IST
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हिमाचल प्रदेश में भाजपा को विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद सीएम पद के लिए दिल्ली से लेकर शिमला तक मंथन हुआ. आखिरकार मंडी के सराज से जीते भाजपा विधायक जय राम ठाकुर को हिमाचल का नया सीएम चुनाव गया.

दिल्ली से लेकर शिमला तक इस बात पर माथापच्ची होती रही कि किसे सूबे की कमान सौंपी जाए. कभी सीएम रेस में नड्डा आगे बताए गए, कभी जय राम ठाकुर. मंडी के अजय जम्वाल का नाम भी इस दौड़ में शामिल रहा लेकिन जय राम ठाकुर बाजी मार गए. नड्डा के इस रेस से बाहर होने के पीछे कई वजह रहीं.

सीएम निर्धारण में धूमल खेमे की भूमिका रही अहम
नड्डा के सीएम रेस से बाहर होने की बड़ी वजह यह भी रही कि धूमल खेमा उनके विरोध में था.



बेशक, पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार गए. लेकिन सीएम बनाने में उनकी भूमिका को नकारा नहीं गया, 44 विधायकों में आधे से ज्यादा विधायक उन्हीं के खेमे से विधानसभा पहुंचे हैं. परिणाम के ठीक बाद जय राम ठाकुर ने उनसे मुलाकात की और आशीर्वाद लिया. चुनाव से पहले इसी वजह से जेपी नड्डा को भाजपा सीएम प्रत्याशी बनाने से गुरेज कर रही थी और बाद में धूमल को ही सीएम उम्मीदवार घोषित करना पड़ा था.



हिमाचल में बीते पांच साल में कम सक्रिय
जेपी नड्डा क्योंकि बीते पांच साल से हिमाचल में ज्यादा सक्रिय नहीं रहे. इसलिए भी वह सीएम की दौड़ से बाहर हो गए. 2012 के बाद वे केंद्र में सक्रिय हैं और विधानसभा चुनाव से कुछ माह पहले ही हिमाचल में ज्यादा सक्रिय हुए थे.

जातीय समीकरण पक्ष में नहीं
नड्डा के सीएम बनने की राह में जातीय समीकरण भी बड़ा रोड़ा बने. वह ब्राह्मण हैं. जबकि उनके मुकाबले जयराम ठाकुर राजपूत समाज से आते हैं. हिमाचल में सबसे बड़ा वोट बैंक राजपूतों का ही है. प्रदेश में 37 फीसदी जनसंख्या राजपूतों की ही है. सबसे बड़ी बात आज तक जीतने भी मुख्यमंत्री बने हैं, वह राजपूत समाज से ताल्लुक रखते हैं. वहीं हिमाचल में ब्राह्मणों की संख्या 18 फीसदी है.

2019 लोकसभा चुनाव में नड्डा की भूमिका
2019 को लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा हाईकमान ने नड्डा को केंद्र में बनाए रखना उचित समझा. क्योंकि कहीं ना कहीं मोदी को यह लगता है कि नड्डा की केंद्र और इन चुनावों में उन्हें ज्यादा जरूरत रहेगी. भाजपा की नजरें 2019 लोकसभा चुनाव पर टिकी हैं. नड्डा क्योंकि बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल रहे हैं. केंद्र में उनकी जरूरत को देखते हुए हाईकमान को उन्हें हिमाचल भेजने से रोक दिया. वैसे भी हिमाचल में लोकसभा की महज चार ही सीटें हैं. बड़े प्रदेशों भाजपा को उनकी ज्यादा जरूरत रहेगी.

मंडी और कांगड़ा की भूमिका अहम
मंडी में 10 सीटों में 9 भाजपा के खाते में गिरी हैं. कांगड़ा में भी 15 सीटों में 11 भाजपा के खाते में गिरी हैं. ये दोनों जिले के नेता भी एकजुट होकर नड्डा की खिलाफत कर सकते हैं. इन दोनों क्षेत्रों में शांता कुमार, धूमल और सुखराम की भूमिका रहती है. मध्य हिमाचल में आने वाले ये जिले उनके खिलाफ एकजुट हो सकते हैं.

नड्डा खेमा कमजोर
हिमाचल विधानसभा चुनाव में जीते बिधायकों में नड्डा खेमा कमजोर रहा है. उनके खेमे के विधायक नाममात्र हैं. बिलासपुर को छोड़ दें तो चुनिंदा विधायक हैं जो उनके समर्थन में आए. बिलासपुर से सुभाष ठाकुर को छोड़ दें तो किसी भी विधायक ने उनके समर्थन में कोई बयान नहीं दिया.

मंडी और दूसरे जिलों में नड्डा के नाम पर एकमत नहीं थे लोग
बता दें कि मंडी समेत कई जिलों में जनता नड्डा के नाम पर एकमत नहीं थी. सोशल मीडिया पर लगातार प्रतिक्रिया आ रही थी. जनता उनके नाम का विरोध कर रही. कहा जाता रहा कि नड्डा एक तरह से पेराशूट प्रत्याशी हैं. उनके नाम पर भाजपा ने चुनाव नहीं लड़ा था, इसलिए उन्हें सीएम न बनाया जाए.

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First published: December 20, 2017, 2:24 PM IST
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