विश्व पर्यावरण दिवस: भूकंप से पैदा हो रही है पहाड़ों में पानी की समस्या

वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमाचल और उत्तराखण्ड में पानी की कमी का एक कारण भूकंप हो सकता है.

स्‍वतंत्र मिश्र | News18 Himachal Pradesh
Updated: June 5, 2019, 2:34 PM IST
विश्व पर्यावरण दिवस: भूकंप से पैदा हो रही है पहाड़ों में पानी की समस्या
Shimla: People stand in a queue to collect water from a tanker, as the city faces acute shortage of drinking water, in Shimla on Tuesday, May 29, 2018. (PTI Photo) (PTI5_29_2018_000133B)
स्‍वतंत्र मिश्र | News18 Himachal Pradesh
Updated: June 5, 2019, 2:34 PM IST
देश में पानी की समस्या दिन-ब-दिन विकराल होती जा रही है. मैदानी इलाकों को पानी देने वाले पहाड़ी राज्यों में भी पानी का संकट गहराता जा रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमाचल और उत्तराखण्ड में पानी की कमी का एक कारण भूकंप हो सकता है. भूकंप के चलते पहाड़ी इलाकों में जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं. एक एजेंसी के सर्वे के अनुसार उत्तराखंड के 17 हजार से ज्यादा गांवों के प्राकृतिक जलस्रोत सूख चुके हैं. ऐसा ही हाल हिमाचल प्रदेश का है. बीते वर्ष प्रदेश में सूखे जैसे हालात बन गए थे. गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश के आइपीएच विभाग की 1350 पेयजल योजनाएं प्रभावित हुई और पानी को लेकर हाहाकार की स्थिति पैदा हो गई थी.

भूकंप के झटकों के चलते जलस्रोत बंद हो जाते हैं

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में छोट-मोटे भूकंप के झटके अक्सर आते रहते हैं. यहां भूकंप के लग रहे झटकों के चलते जलस्रोत बंद हो जाते हैं. मैदानी इलाकों में इससे उलट स्थिति है. वहां ग्राउंड वॉटर तेजी से खत्म हो रहे हैं और वैज्ञानिकों की मानें तो मैदानी इलाकों में ग्राउंड वॉटर के खत्म होने के चलते भूकंप के झटके लगने की संभावनाएं बढ़ रही हैं.

पहाड़ों में कई बार भूकंप के चलते पानी के कई स्रोत आपस में जुड़ जाता है और इसके चलते बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं.

वर्ष 2018 में हिमाचल की यह हो गई थी हालत

प्रदेश में सूखे जैसे हालात से आइपीएच विभाग की 1350 पेयजल योजनाएं प्रभावित हो गई थी. एक ही दिन में 325 नई पेयजल योजनाएं हांफने लग गई थीं. प्रदेश में 209 योजनाओं में 20 फीसद से कम पानी की सप्लाई होने लगी थी. वहीं, 141 योजनाओं में मुश्किल से 25 फीसद तक पानी की सप्लाई हो पा रही थी. आंशिक तौर पर हजारों पेयजल योजनाएं प्रभावित हुई हैं.

हिमाचल में पानी की जरूरत के आईपीएच विभाग का जोर हैंडपंप लगाने पर है. आइपीएच विभाग का उठाऊ पेयजल योजनाओं पर ही पूरा दारोमदार है, जिनके स्रोत नदी-नालों में हैं. इनमें भी पानी की 30 फीसद से अधिक की गिरावट आ गई थी.
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उत्तराखंड में प्यास बुझाने के लिए काम कर रही हैं चार एजेंसियां

राज्य के लोगों की प्यास बुझाने को लेकर पेयजल निगम, जल संस्थान, स्वजल व एडीबी जैसी चार महत्त्वपूर्ण एजेंसियाँ वर्षों से काम कर रही हैं. बावजूद इसके राज्य में 17577 गाँवों के लाखों लोग आज भी पानी के संकट से जूझ रहे हैं. इन चारों एजेंसियों के अधिकारी यह मानते हैं कि पानी की समस्या राज्य में आगामी 20 वर्षों तक बनी रह सकती है.

पेयजल निगम बजट का रोना रोता है. निगम के अधिकारियों का कहना है कि पेयजल योजनाओं के निर्माण के लिये प्रतिवर्ष 700 करोड़ रु. का बजट मिलना चाहिए लेकिन 2018-19 वित्तीय वर्ष में मात्र 70 करोड़ रुपए ही जारी किये गए हैं.

यहां के इतने प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके

देहरादून में 1615, उत्तरकाशी में 617, बागेश्वर में 510, चम्पावत में 622, हरिद्वार में 311, नैनीताल में 358, रुद्रप्रयाग में 868, अल्मोड़ा में 1843, पिथौरागढ़ में 1136, चमोली में 1627, उधमसिंहनगर में 52 गाँवों के प्राकृतिक जलस्रोत सूखने से लाखों की आबादी के समक्ष पानी का संकट आ खड़ा हुआ है.

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First published: June 5, 2019, 2:34 PM IST
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