पढ़ें: क्या है कव्वाली, जानें- कैसे अस्तित्व में आई?

आखिर कव्वाली ऐसी कौन-सी विधा है जिसके सामने खून-खराबे करने वाले तक खुद को बेहद कमजोर महसूस करने लगते हैं?

  • News18India
  • Last Updated: June 25, 2016, 10:34 PM IST
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नई दिल्ली। मशहूर कव्वाल अमजद साबरी की मौत के बाद एक बार फिर दुनिया का ध्यान कव्वाली की तरफ गया है। क्या किसी खास कंठ से निकलने वाली आवाज चंद साज के साथ मिलकर ऐसी ताकत पैदा करते हैं जो बंदूकों की बोली बोलने वालों में खौफ पैदा कर दे? आखिर कव्वाली ऐसी कौन-सी विधा है जिसके सामने खून-खराबे करने वाले तक खुद को बेहद कमजोर महसूस करने लगते हैं?

कव्वाली संगीत की एक लोकप्रिय विधा है, जिसका इतिहास 700 साल से भी पुराना है। आठवीं सदी में ईरान और अफगानिस्तान में दस्तक देने वाली संगीत की अनोखी विधा शुरुआती दौर से ही सूफी रंगत में डूबी, वह विधा जो तेरहवीं सदी में भारत आई।

यह इस्लाम का सूफी स्वर ही था, जिसने उपेक्षा की शिकार निचली जातियों को अपनी ओर आकर्षित किया। अब जब सूफियन ने इन्हें अपना लिया है, तो इन जातियों को इनका मजहब याद दिलाने की कोशिश हो रही है, लेकिन कव्वाली तो कब की इंसानियत की आवाज बन चुकी है।



कव्वाली का आगाज मुस्लिम धर्म के सूफी पीर/फकीरों ने किया। आठवीं सदी में ईरान और दूसरे मुस्लिम देशों में धार्मिक महफिलों का आयोजन किया जाता था, जिसे समां कहा जाता था। समां का आयोजन धार्मिक विद्वानों यानी शेख की देखरेख में किया जाता था। समां का मकसद कव्वाली के जरिए ईश्वर के साथ संबंध स्थापित करना होता था।
शुरुआत में सूफियों ने अमन और सच्चाई का पैगाम पहुंचाने के लिए मौसिकी और समा का सहारा लिया। ईरान से चलकर कव्वाली भारत आई और भारत के सूफी संतों ने कव्वाली को लोकप्रिय बनाया। इसमें चिश्ती संत शेख निजामुद्दीन औलिया का प्रमुख योगदान रहा। इसके बाद अमीर खुसरो ने भारतीय संगीत और लोक भाषाओं का समायोजन करके कव्वाली को अपने समय की संगीत की एक विकसित और लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित किया।

प्रार्थना, भजन की तरह कव्वाली में भी शब्दों का ही असली खेल है, लेकिन कव्वाली की विशेष बनावट के कारण शब्दों और वाक्यों को अलग-अलग तरीके से निखारकर गाया जाता है। हर बार किसी विशेष स्थान पर ध्यान केंद्रित करने से अलग-अलग भाव सामने आते हैं।

लेकिन जैसे-जैसे कव्वाल शब्दों को दोहराते हैं शब्द बेमायने होते जाते हैं और सुनने वालों के लिए एक पुरसुकून अहसास बाकी रह जाता है, जहां जाकर वह अध्यात्मिक समाधि में खो जाते हैं। यही कव्वाली की कामयाबी का चरम है। कव्वाली को गाते समय कव्वाल को ध्यान रखना पड़ता है कि अगर कोई गाने वाला या सुनने वाला आध्यात्मिक समाधि में पहुंच जाए तो कव्वाल की जिम्मेदारी होती है कि वो बिना रुके कुछ ही शब्दों को तब तक दोहराता रहे जब तक वो व्यक्ति वापस पूर्व अवस्था में नहीं आ जाए।

कव्वाली एक गायन पद्धति तो है ही, लेकिन सैकड़ों साल पुरानी एक परंपरा का भी नाम है।  वो परंपरा जो ईरान-अफगानिस्तान होते हुए दुनिया के बड़े हिस्से में आहिस्ता-आहिस्ता पैठ बनाती गई और अब छा चुकी है।

कव्वाली दर्शकों को लुभाने का खेल नहीं, बल्कि सूफी संतों को न्योता देने की परंपरा का हिस्सा है। मंच पर बैठे कव्वालों में भी वरिष्ठता का खास ध्यान, सबसे वरिष्ठ सबसे दाएं और इसी तरह घटता हुआ क्रम,  इसके बाद मुख्य कव्वाल आलाप के साथ कव्वाली का पहला छंद गाते हैं। ये या तो अल्लाह की शान में होता है या सूफी रहस्य लिए। अमीर खुसरो, बुल्ले शाह, बाबा फरीद, ख्वाजा गुलाम फरीद, हजरत सुल्तान बाहू, वारिस शाह... ये नाम सुनते ही सूफियाना रंगत में डूबा कलाम याद आता है।

मोहब्बत के दीन को फैलाने वाला कलाम अपने बोल, अपने अंदाज, अपनी गायकी और दिल को छूने की क्षमता की वजह से पीरों के मजारों या सूफियों की मजलिसों तक ही सिमटा नहीं रहा, यह जन-जन की आवाज बन चुकी है। इस्माइल आजाद, आगा सरवर, शकीला बानो भोपाली, अजीज नाजां, यूसुफ आजाद, राशिदा खातून, उस्ताद नुसरत फतेह अली खान ने कव्वाली को जनता के दिलों की धड़कन बना दिया और अब तो आलम ये है कि इसका जादू सात समंदर पार गोरों के सिर चढ़ कर भी बोलने लगा है।
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