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Human Story : 'मुझे जानवरों से नहीं, इंसानों से डर लगता है'

अचला शर्मा बड़े गर्व से कहती हैं कि दिल्ली की सड़क पर रहने वाला हर कुत्ता उन्हें और उनकी गाड़ी को जानता है. अचला और जानवरों की दोस्ती की कहानी पढ़िए.

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    आज के दौर में जहां लोगों के पास एक दूसरे के लिए वक्त नहीं है, वहां किसी इंसान का जानवर को प्यार- दुलार करना थोड़ा अजीब नज़र से देखा जाता है. ऊपर से अगर वो शख्स सड़क पर रहने वाले जानवरों से इस हद तक प्यार करे कि रोज़ उसे खाना खिलाए, अस्पताल ले जाओ तो उसे 'नॉर्मल' नहीं माना जाता. ऐसी ही एक शख्स हैं अचला शर्मा जिनकी ज़िंदगी में जानवर बहुत अहमियत रखते हैं. उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि पड़ोसी क्या सोचते हैं, समाज क्या सोचता है. जानवरों के प्रति उनकी संवेदना इस हद तक है कि वह बड़े गर्व से कहती हैं कि दिल्ली की सड़क पर रहने वाला हर कुत्ता उन्हें और उनकी गाड़ी को जानता है.

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    मेरा नाम अचला शर्मा है, वैसे तो भोपाल की हूँ लेकिन कई सालों से दिल्ली में रह रही हूँ. मुझे जानवरों से लगाव है, इतना लगाव कि रोज़ मैं 400 से ज्यादा सड़क पर रहने वाले कुत्तों को खाना खिलाती हूँ. लोग कहते हैं पागल हो, क्यों कुत्तों को प्यार करती हो, इंसानों को प्यार कीजिए. मेरा जवाब होता है - इंसान ही काटने को दौड़ते हैं, कुत्ता तो कभी नहीं काटता.

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    अचला शर्मा सड़क पर रहने वाले जानवरों के लिए काम करती हैं


    मैं बचपन से यही कर रही हूँ, पर जब मैं दिल्ली आई यहां जानवरों का जो हाल देखा तब मैंने एक चैरिटी शुरू की. हम सड़क पर रहने वाले कुत्तों को दो वक्त का खाना देते हैं. हमें कोई नहीं काटता. हमारी गाड़ी है लाल रंग की, वो रंग देखकर ही पहचान लेते हैं. हम बीमार जानवरों को अस्पताल ले जाते हैं. उनकी जनसंख्या कम करवाते हैं, उनका ऑपरेशन करवाते हैं.

    मैं जानवरों को बुरी हालत में देख ही नहीं सकती. लोग अपने पालतू जानवर छोड़ देते हैं, कोई बीमार हो गया तो छोड़ देंगे. हाल ही में मेरे मोहल्ले का कुत्ता किसी की कार पर बैठता था. उसे किसी के हवाले कर दिया, पता नहीं किसके हवाले किया. हमने सब जगह उसे ढूंढ लिया, दो महीने हुए वो नहीं मिल रहा. उसके बारे में सोचती हूँ तो बहुत तकलीफ होती है. बयां नहीं कर सकती कितना कष्ट होता है.

    हम गैराज में मिट्टी का बर्तन रखते हैं, रोज़ कोई आकर उसे तोड़ देता है. हम भी जिद्दी हैं, बार-बार वो बर्तन रख देते हैं. दूसरे दिन वो मिलता ही नहीं. वो गराज कूड़ा रखने के लिए इस्तेमाल होता है पर कुत्ते के बैठने के लिए नहीं है. कई बार पूरा पड़ोस हमारे खिलाफ लामबंद हो जाता है. पार्किंग जैसी बातों पर लड़ने झगड़ने वाले लोग भी जानवरों को लेकर एक साथ हो जाते हैं. हम जैसे लोग जो थोड़ी सी संवेदना दिखाते हैं, उनके खिलाफ यह सब लोग एक हो जाते हैं.

    मैं ऐसे लोगों से बस इतना कीजिए कि दूसरों की भावनाओं को आदर कीजिए. अगर आप में जानवरों के प्रति संवेदना नहीं है तो कोई बात नहीं. लेकिन कम से कम उनसे नफरत मत करो. उनसे प्यार कीजिए, उन्हें पेट कीजिए.

    (इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.)

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