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Human Story : हॉकी का कद्रदान जिसने खेल के लिए नौकरी भी छोड़ दी

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 20, 2018, 6:28 PM IST
Human Story :  हॉकी का कद्रदान जिसने खेल के लिए नौकरी भी छोड़ दी
अरुमुगम ने हॉकी को बढ़ावा देने के लिए सरकारी नौकरी से जल्दी रिटायरमेंट लिया

हॉकी को भारत का राष्ट्रीय खेल माना जाता है लेकिन कितने लोग हैं जो इस खेल के लिए अपनी सरकारी नौकरी छोड़ सकते हैं. अंग्रेज़ी में ऐसे लोगों को 'क्रेज़ी' कहा जाता है लेकिन कभी कभी पागलपंती ज़रूरी हो जाती है.

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खेल के लिए पागलपन तो आपने बहुत देखा होगा लेकिन ऐसे लोग कम ही मिलेंगे जो अपने मनपसंद खेल के लिए अच्छी खासी नौकरी छोड़कर उसके प्रमोशन में जुट जाएं. ए अरुमुगम ऐसे ही एक शख़्स हैं जिन्होंने हॉकी खेली नहीं है लेकिन यह खेल उनके दिल के इतना करीब है कि वह सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक रिटायरमेंट सिर्फ इसलिए ले बैठे ताकि हॉकी को और करीब से समझ पाएं, जान पाएं और उसके लिए कुछ कर पाएं. पढ़िए अरुमुगम के हॉकी से प्यार की कहानी.

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साल 2008 की बात है जब भारतीय हॉकी टीम पहली बार ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई नहीं कर पाई. यह मेरे जैसे कई हॉकी प्रेमियों के लिए बहुत बड़ा झटका था. भारतीय हॉकी एक सुनहरे दौर को पार करके मुश्किल वक्त से गुज़र रही थी लेकिन हालात यहां तक पहुंच गए कि वो ओलंपिक के पहले पड़ाव को भी पार नहीं कर पाई, वही ओलंपिक जहां किसी वक्त भारतीय टीम ने लगातार 6 गोल्ड मेडल जीते थे. उस दिन मुझे एहसास हुआ कि हाथ पर हाथ रखकर टीम को कोसना अलग बात है और इस खेल के लिए कुछ कर पाना अलग बात है. 80 सालों में पहली बार भारतीय टीम क्वॉलिफाई नहीं कर पाई तो ऐसे में मैं इस खेल के लिए क्या कर सकता हूँ.



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अरुमुगम ने वंचित वर्ग के बच्चों की हॉकी से दोस्ती करवाई




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मैं जानता था कि दिल्ली में निजी और सरकारी दोनों मिलाकर 4 हज़ार से ज्यादा स्कूल हैं. इनमें से 4-5 के पास ही हॉकी टीम है, वो भी सरकारी फायदों के लिए है. इसलिए मैंने One Thousand Hockey Legs (OTHL) नाम की संस्था शुरू की जिसके तहत मैं उन बच्चों को हॉकी से मिलवाता हूँ, उनकी हॉकी से दोस्ती करवाता हूँ जो आर्थिक तौर पर मज़ूबत नहीं हैं. शुरूआती साल मेरे लिए बहुत मुश्किल रहे क्योंकि स्कूल इसके लिए जल्दी से तैयार नहीं होते थे. मैं कहूंगा कि मैंने सरकारी नौकरी भी की है, मैंने पत्रकारिता की है, मैंने हॉकी से जुड़ी शायद भारत की सबसे पहली वेबसाइट भी शुरू की है लेकिन स्कूलों को हॉकी के लिए मनाना अभी तक का सबसे मुश्किल काम रहा. स्कूल वालों को लगता है कि हॉकी एक लोकप्रिय खेल नहीं है इसलिए उसकी तरफ झुकाव कम है. लेकिन मैं यह कर रहा हूँ क्योंकि इस तरह खेल को प्रमोट करने से वंचित वर्ग के बच्चों को भी एक तरह का फोकस मिलता है. छुट्टी के दिन मैं बच्चों को कोच से मिलवाता हूँ, अलग अलग मैदानों पर लेकर जाता हूँ. उन्हें फोकस मिलता है, वो वक्त बर्बाद नहीं करते.

मुझे यह प्रोजेक्ट शुरू किए हुए 8-9 साल हो गए हैं. इसी बीच हम काफी प्रतिभाशाली खिलाड़ी मिल गए हैं. तो यह काम करके मैं सामाजिक और खेल के कल्याण के साथ-साथ व्यक्तित्व को भी निखार रहा हूँ. हमारी कोचिंग से ऐसे खिलाड़ी हैं जो आज खेल रहे हैं. अच्छा लगता है यह देखकर कि वो छठीं क्लास का बच्चा जिसे आप लेकर आए थे, आज वो स्टेट के लिए खेल रहा है. एक बच्चे ने अंडर 19 एशिया कप के लिए खेला. यह सब देखकर आप सोचते हैं कि मेरे लिए असल में क्या सबसे बड़ी उपलब्धि है, वो दस किताबें जो मैंने हॉकी पर लिखी हैं, या वो खेल जो मैंने 20 देशों में घूमकर लाइव देखे या फिर वो लड़के को भारत के लिए खेलते देखना जो कि एक ड्राइवर का बेटा है और आज उसकी पंजाब नेशनल बैंक में नौकरी भी है और वो 40 हज़ार रुपये कमा रहा है और अंडर 19 में खेल भी रहा है.

वैसे हॉकी से मेरा लगाव स्कूल के वक्त से रहा है. मैं तमिलनाडु के एक गांव में पला पढ़ा हूँ.  1980 में भारत की मॉस्को ओलंपिक में जीत ने मुझे इस खेल के और करीब ला दिया. आईआईटी बॉम्बे में दो साल की पढ़ाई के बाद यूपीएससी की परीक्षा क्लियर की और फिर बतौर जियोलोजिस्ट ट्रेनिंग लेकर मेरी सरकारी नौकरी लगी. 20 साल काम करके मैंने स्वेच्छा से रिटायरमेंट ले लिया. मैं अपने मनपसंद खेल हॉकी पर पूरी तरह काम करना चाहता था. मैं पहले भी इस खेल के लिए आर्टिकल लिखता आ रहा था लेकिन अब मुझे पूरी तरह यही काम करना था. इस बीच मैंने stick2hockey नाम की वेबसाइट भी शुरू की जो कि पूरी तरह हॉकी पर आधारित भारत की पहली वेबसाइट है. इस साइट पर मैंने उन सब आंकड़ों को इकट्ठा किया है जो इससे पहले भारतीय हॉकी के बारे में किसी को नहीं पता थे या फिर काफी बिखरे हुए थे. इस बीच मैंने नामी अखबारों के लिए कई देशों में भारतीय हॉकी के मैच भी कवर किये. इसके अलावा मैंने हॉकी पर किताबें भी लिखी हैं.

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अरुमुगम की अकादमी के
कई बच्चों राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी खेल रहे हैं


नौकरी छोड़ने के बाद भी मैं आर्थिक रूप से काफी मज़बूत रहा लेकिन 2008 में भारतीय टीम की ओलंपिक में विफलता ने मुझे अंदर तक हिला दिया. एक खेल प्रशसंक के तौर पर मैं ख़ुद से ही सवाल पूछने लगा. मैं सोचने लगा कि क्या एक प्रशंसक बने रहना ही काफी है. और OTHL जैसे प्रोजेक्ट के तहत बच्चों को हॉकी से मिलवाकर मुझे जो सुकून मिला है, वो राहत मुझे किसी विदेशी मैच को कवर करने या किताब लिखने से नहीं मिल सकती. आज अकेले दिल्ली में 24 से भी ज्यादा स्कूलों में हॉकी की टीम है और इस खेल को खेलने के लिए उचित मैदान भी हैं. मुझे खुशी है कि स्कूल से लेकर इंटर-ज़ोन और नैशनल तक पहुचंने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है और मैं ज्यादा से ज्यादा लड़के और लड़कियों को नेशनल टीम की दहलीज़ पर पहुंचते हुए देखना चाहता हूँ.

वैसे यह सफर काफी मज़ेदार भी रहा है. जैसे कई बच्चे 60 मिनट के खेल पर सवाल उठाते हुए पूछते हैं कि शाहरुख़ खान ने तो फिल्म में 70 मिनट के खेल की बात की थी. तो फिर आप 60 मिनट क्यों बोल रहे हैं. फिर मुझे उन्हें समझाना पड़ता है कि खेल के नियम बदलते रहते हैं. शाहरुख़ ने जब 70 मिनट बोला था तब यह खेल 70 मिनट का ही होता था लेकिन 2014 से यह खेल 60 मिनट का कर दिया गया है. इस तरह बच्चे कई दिलचस्प सवाल पूछते हैं जिनके जवाब कभी-कभी मैं दे पाता हूँ और कभी कभी मेरी बोलती ही बंद हो जाती है. हालांकि उनके सवाल भले ही मेरा मुंह बंद कर दे, पर मैं चाहूंगा कि उनकी स्टिक हमेशा चलती रहे.

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.)

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First published: December 20, 2018, 6:28 PM IST
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