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Human Story : 'ड्राइवरी से पापा के काले पड़ चुके हाथ नहीं देख सकता था'

कटिहार के इस परिवार की ईमानदारी और मेहनत के लिए चर्चा है

कटिहार के इस परिवार की ईमानदारी और मेहनत के लिए चर्चा है

18 साल के सुखविंदर सिंह ने जब से होश संभाला, उन्हें कुछ दिखा तो बस दिन रात मेहनत करते अपने मम्मी पापा. कहीं ड्राइवर का बेटा ड्राइवर ही न बन जाए, इस सोच के साथ सुखविंदर के माता-पिता ने उसकी पढ़ाई में अपना सब कुछ लगा दिया. और अब सुखविंदर अपने मम्मी पापा की पेंडिंग पड़ी खुशियों को उन तक पहुंचाने के लिए तैयार है.

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मेरा नाम सुखविंदर सिंह है. मैं 18 साल का हूँ. हम बिहार में कटिहार के लक्ष्मीपुर गांव से हैं. हाल ही में मेरा चयन नेशनल डिफेंस अकादमी के लिए हुआ है और मैं जल्दी ही भारतीय नौसेना में सब लेफ्टिनेंट की ट्रेनिंग शुरू करने कुछ दिनों में पुणे जा रहा हूँ. वैसे मेरी कहानी इतनी सिंपल नहीं है, मतलब मेरा एनडीए में चुना जाना इतना आसान नहीं होता अगर मेरे मम्मी पापा ने मेरे लिए दिन रात एक न किया होता.

घर में मेरी मम्मी और पापा है, बहन की शादी हो गई है. मेरे पापा पहले दूसरों की गाड़ी चलाते थे, फिर कम पैसा मिलने लगा तो किश्त पर एक गाड़ी खरीदी, 407 वैन. पिछले 20 साल से ड्राइवरी कर रहे हैं और मेरी माँ घर संभालती हैं. मेरे माँ बाप पढ़े लिखे नहीं है इसलिए उन्होंने सोचा कि कैसे भी करके मुझे पढ़ा लिखा दें. जहां तक मेरा सवाल है तो मेरा पढ़ने का मन करता था, कभी नहीं भी करता था. लेकिन जब गाड़ी चलाते हुए पापा के काले पड़ चुके हाथ देखता तो ख़ुद को मेहनत करने से रोक नहीं पाता. हालांकि उनकी मेहनत के सामने मेरी मेहनत कुछ भी नहीं है. इसलिए जब एनडीए का रिज़ल्ट आया तो पापा ने मुझसे पूछा कि क्या गिफ्ट चाहिए. मैंने कहा – पापा अब गाड़ी की चाबी मुझे दे दो. आपने बहुत काम कर लिया.

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मम्मी पापा के लिए राह आसान नहीं रही. शादी के बाद से ही उन्हें घरवालों का साथ मिलना बंद हो गया. सब कुछ अपने बल पर किया. ड्राइवरी से घर चलाना कितना मुश्किल है, यह तो आप भी समझ सकते हैं. इसलिए हमारा घर अभी तक कच्चा है. पापा सोचते बच्चे को पढ़ा देता हूँ, वरना यह भी ड्राइवरी करता रह जाएगा. मुझसे कहते – तुझे पढ़ा लेता हूँ, तुझे कुछ बना देता हूँ, फिर घर तो तू बना ही लेगा.

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सुखविंदर ने बंगाल के पुरुलिया सैनिक स्कूल से पढ़ाई की है

छठवीं तक तो मैं गांव के स्कूल में ही पढ़ा. मम्मी पापा के पास एक छोटी सी ज़मीन थी जो उन्होंने बेचकर मुझे छठी तक पढ़ाया. उसके बाद उन्होंने मुझे बंगाल के पुरुलिया सैनिक स्कूल में भर्ती करवाने के लिए अपनी गाड़ी पर लोन लिया. मैंने भी सैनिक स्कूल के लिए बहुत मेहनत की और आखिरकार मेरा दाखिला वहां हो गया. पिछले 11-12 साल से मैं वहीं पढ़ाई कर रहा हूँ. शुरूआत में मेरी सालाना फीस 90 हज़ार थी जो कि मेरे परिवार के लिए बड़ी बात थी. पापा दिन में गाड़ी चलाते और रात में बारातों में गाड़ी चलाते.

जैसे -तैसे करके मम्मी पापा ने मेरी फीस का इंतज़ाम किया लेकिन मुझे सिर्फ मेहनत पर ध्यान लगाने के लिए कहा. एक पल के लिए भी मेरी पढ़ाई के बीच पैसों को नहीं आने दिया. इधर मैं भी स्कूल में मन लगाकर पढ़ रहा था, कहा न, पापा के हाथ मुझे मेहनत करने के लिए आगे बढ़ाते थे. मैं स्कूल कैप्टन भी रहा. फिर 12वीं में मैंने यूपीएससी की परीक्षा दी जिसके बाद मेरा चयन एनडीए के लिए हो गया. 8 लाख से ज्यादा छात्रों में से 300 चुने गए थे. उसमें मेरी रैंक 206वीं थी. वैसे मैंने इंडियन आर्मी की टेक्निकल सेवा की परीक्षा भी दी थी.  उसमें भी मेरी अच्छी रैंक आई लेकिन मैं एनडीए में ही जाना चाहता था.

जब रिज़ल्ट आया तो हम तीनों, मैं, मम्मी और पापा एक दूसरे से चिपककर फूट फूटकर रोए. लगा अब सब ठीक हो जाएगा. अब तो परिवार के लिए बहुत कुछ करना है. उन्हें घर देना है, कपड़े देना है, माँ को गहने देना है जो उन्होंने आज तक नहीं पहने. सब खुशियां देनी है. उन्होंने मुझे 20 साल दे दिए हैं, अब मेरी बारी है उन्हें सुख देने की. पहले तो लोग शादी का कार्ड भी हमारे घर नहीं देकर जाते थे, अब तो गांववाले मुझसे सलाह लेने आते हैं, अपने बच्चों के लिए. मैं भी यहां तक पहुंचने वाला गांव में अकेला हूँ, एक दीपक, दूसरे दीपक को जलाने की कोशिश करेगा.

बाकी मेरे पापा के वो हाथ मुझे हमेशा याद रहेंगे. कुछ भी गलत करने से पहले अपने मम्मी पापा को याद करो, उन्हें याद रखोगे, उन्हें देखोगे तो गलत रास्ते पर नहीं जाओगे.

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.)

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