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#HumanStory: 'इस बूढ़े और बेकाम अब्बू को उसकी औलादों ने यतीम बना डाला'

News18Hindi
Updated: January 27, 2020, 9:39 AM IST
#HumanStory: 'इस बूढ़े और बेकाम अब्बू को उसकी औलादों ने यतीम बना डाला'
कहानी, उस पिता की, जिसने उसके बच्चों ने छोड़ दिया (प्रतीकात्मक फोटो)

बचपन में दोनों औलादें मुझे घेरकर सोया करतीं. कोहड़े की बेल जैसे नाजुक हाथ-पांव उलझाए हुए. तब गहरी नींद आती. नींद कभी खुल भी जाए तो उनकी सांसें लोरी की तरह थपककर दोबारा सुला देतीं. आज बेटे जवान हैं. मैं रेलवे प्लेटफॉर्म पर सोता हूं. अकेला. और खाली पेट.

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  • Last Updated: January 27, 2020, 9:39 AM IST
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कहते हैं कि बारीक-सी घास भी जब उगती है तो आसपास के तमाम दरख्तों को अपनी जगह से खिसकना होता है. मैं उन्हीं दरख्तों में से हूं. इतनी दूर सरकाया जा चुका कि मेरी छांह भी घास पर न पड़े. अपने ही बच्चों के लिए मैं बूढ़ा और बेकाम दरख्त हो गया. उन्होंने मुझे जड़ से उखाड़ फेंका. इस बुड्ढे (elderly man) को उसके बच्चों ने अनाथ (orphan) बना डाला.

मोहम्मद कासिम की कहानी...

पहले बेटे का जन्म हुआ तो खूब धूमधाम रही. मोहल्लेभर में मिठाइयां बंटी. घर पर जो भी मुबारक देने आता, मैं खुद उसे हाथ में रुपया थमाया करता था. ये वही रुपये थे, जिनके लिए मैंने दिन-रात मेहनत की थी. मुबारकों का दौर महीनेभर चला होगा. बेटा बड़ा होने लगा तो दिन और उजले होने लगे. इतना प्यारा था कि हंसता तो कांच की गोलियां छनकने लगतीं. फिर दूसरी औलाद जन्मी- वो भी बेटा. अल्लाह से बेटी मांगी थी.

थोड़ा मलाल हुआ लेकिन बेटे को गोद में लेते ही वो जाता रहा. गदबदे गाल. माथे पर दुनियाभर की लकीरें जैसे मेरे बूढ़े अब्बा सामने आ गए हों.



थोड़े बड़े हुए तो दोनों बेटे मुझे लेकर खींचतान करने लगे (प्रतीकात्मक फोटो)


थोड़े बड़े हुए तो दोनों बेटे मुझे लेकर खींचतान करने लगे. उनकी अम्मी का इंतकाल हुए साल बीत गया था. अब दोनों को लगता कि मैं ही उनका सहारा हूं. कौन मेरी गोद में बैठकर रात का खाना खाएगा, इसपर खूब मार-पिटाई होती. गुत्थमगुत्था दोनों लड़कों को अलग करता फिर दोनों को ही गोद के एक-एक ओर बिठाकर खिलाता.

उनके शौक ने मुझे उम्दा बावर्ची बना दिया था. ईद पर बिरयानी और कोरमा से लेकर शीर ख़ुर्मा और सेवइयां तक पकतीं.

इस बीच रिश्ते की फुफ्फी ने खासा जोर लगाया कि मैं दोबारा शादी कर लूं लेकिन मन नहीं माना. हवाले दिए गए कि छोटे बच्चों को मां मिल जाएगी. काम से लौटेगा तो तुझे पकी रसोई खाने को मिलेगी. मैंने सारी बातों का तोड़ निकाल लिया. बस, एक बात सीने में अटकी रह गई.

फुफ्फी ने कहा था- कासिम, हड्डियां बुढ़ाने लगें तो अपनी औलादें भी काम नहीं आतीं. उसी रोज के लिए शादी कर ले. उस वक्त तो मैं हंस पड़ा था, अब लगता है, उन्होंने ऐसा यूं ही नहीं कहा था.

अपनी बीवी के गुजरने के बाद मैंने शादी नहीं की. डर था कि बच्चों की नई अम्मी उनसे कैसा सुलूक करेगी. दबा हुआ-सा ये डर भी था कि कहीं मैं बच्चों के प्यार में नई-नवेली के साथ नाइंसाफी न कर जाऊं. उन्हें मां-बाप दोनों का प्यार मिले, इसके लिए मैंने हड्डियां गला दीं.

बच्चों के शौक ने मुझे उम्दा बावर्ची बना दिया था (प्रतीकात्मक फोटो)


सुबह मजदूरी के लिए निकलने से पहले गर्मागर्म खाना पकाता. बच्चों को स्कूल भेजता और फिर खुद निकल पड़ता. शाम होते-होते मैं हड़बड़ी में आ जाता- कब तो छुट्टी हो और कैसे तो जल्दी से जल्दी घर पहुंच सकूं. दौड़ते-भागते लौटता. कभी यार-दोस्तों के साथ सिनेमा नहीं देखा, कभी खाना खाने या मौज-मजे के लिए नहीं गया. दोनों बच्चे ही मेरी दुनिया थे. उनकी खुशी में मेरा सुकून. वक्त की रेत आहिस्ते-आहिस्ते गिरती रही.

जैसे एकदम से दिमागी बुखार चढ़ता है, वैसे ही मुझे बुढ़ापा आ गया. इतने आहिस्ते कि पता ही नहीं चला.

मेरे बाल सफेद हो रहे थे. मजदूरी करता तो घुटने टीसते. हांड़ियां पकाता तो था लेकिन खाने में स्वाद जाने लगा था. लड़के जवान हो गए थे. ज्यादा पढ़े नहीं थे लिकन काम-धंधे में लग गए थे. फुफ्फी अब भी जिंदा थीं. घर आईं तो तंज कसा- अब इनका तो ब्याह कर दो. या बिन मां के बच्चों को बीवियां भी नहीं मिलेंगी. लड़के मजे में मुस्कुराते बैठे रहे. न शर्म, न लिहाज. रिश्तेदारों की मदद से दोनों की शादियां रचा दीं.

जो पूंजी जोड़ी, वो बच्चों की शादी में लगा दी (प्रतीकात्मक फोटो)


कहां तो सोचा था कि बेटों के साथ दो बेटियां आई हैं. घर कहकहों और दावतों से भरा रहेगा. कहां तो मुझे घर-निकाला मिल गया.

नहीं. एकदम से नहीं. धीरे-धीरे. औलादों का बूढ़े बाप से प्यार ऐसे धीरे से खत्म हुआ कि बाप को अंदाजा भी नहीं हुआ. कासिम याद करते हैं. पहले रोटियों में कतर-ब्योंत होने लगी. फिर कानाफूसियां. और फिर लड़कों का बात-बे-बात भड़क उठना. मैंने घर छोड़ दिया.

अब रेलवे प्लेटफॉर्म मेरा घर है. दिन में भीख मांगता हूं. रात प्लेटफॉर्म पर सो रहता हूं. कई बार पुलिस आती है, घुड़काती है, तब सड़क पर निकल जाता हूं. कोई भिखमंगा कहता और ताने देता है. कोई लाल-भरी आंखें देखकर नशेड़ी सोचता है. मैं सब समझता हूं लेकिन लाचार हूं. सेहत रहते कभी हराम का नहीं खाया. जो जोड़ा, वो बच्चों की शादी में लगा दिया. अब करूं तो करूं भी क्या!

कई बार सड़कों पर साथी आपस में बात करते हैं. किस्से बांटते हैं. मैंने कभी नहीं बताया कि मेरी दो जवान औलादों ने मुझे अनाथ बना रखा है.

सोता हूं तो अब भी दोनों के गुंथे हुए पैर याद आते हैं. सोचता हूं, क्या कभी उन्हें भी अपने बूढ़े अब्बा की याद आती होगी!

(*अनुरोध पर पहचान बदली गई है.)

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First published: January 27, 2020, 9:31 AM IST
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