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#HumanStory: बिछड़ों को उनके अपनों से मिलाने वाले शख्स की कहानी

News18Hindi
Updated: January 14, 2020, 11:29 AM IST
#HumanStory: बिछड़ों को उनके अपनों से मिलाने वाले शख्स की कहानी
सुनील नागर गुमशुदा लोगों को उनके ठौर तक पहुंचाते हैं

सड़क पर भूख और ठंड में अकड़ते लोगों (homeless people) को घर पहुंचाना आसान नहीं. खासकर उन्हें, जो अपना पता तक भूल चुके हैं. पुलिस (police) को खबर दो, तो वो आती है, देखती है और कहती है- अरे, ये तो जिंदा है, तब किसलिए बुलाया हमें! मैं कहता हूं- जिंदा है इसीलिए बुलाया. मुर्दे की मदद नहीं होती.

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  • Last Updated: January 14, 2020, 11:29 AM IST
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सुनील नागर बड़े शहर के किसी भी आम युवा से अलग नहीं. उनकी तरह ख्वाब, उनसे हौसले. बस, जो बात उन्हें अलग बनाती है, वो है जज्बा.

बेतरतीब कपड़ों में, बाल बिखराए और अपने में ही गुम सड़क के जिन बाशिंदों को हम ट्रैफिक सिग्नल से भी कम तवज्जो देते हैं, सुनील उनके लिए घर खोजते हैं.

सर्दी का वक्त था. मैं घर लौट रहा था, तभी सड़क किनारे एक बुजुर्ग दिखे. अकेले, गुमसुम. ठंड में ठिठुरते हुए. मैंने गाड़ी रोकी और उनसे बात करने की कोशिश करने लगा. वो चुप थे. थोड़ी देर बाद थक-हारकर मैंने पुलिस को फोन किया. एक गाड़ी आई. बुजुर्ग को देखा और सीधे कहा- ये हमारा थाना नहीं लगता. दूसरा फोन किया. दूसरी गाड़ी आई. ये उनका भी इलाका नहीं था!

दोनों आपस में उलझने लगे. फिर तीसरी गाड़ी भी आ पहुंची. वे बिना बुजुर्ग को देखे मुझसे जिरह करने लगे. मैं कौन हूं. क्या करता हूं. मेरा इनसे क्या मतलब है. इतनी ठंड में मैं एक अनजान बूढ़े के लिए क्यों खड़ा हूं. इस तमाम जिरह में घंटाभर बीत गया. बूढ़े अंकल भूख और थकान से निढाल थे. लगातार बकझक के बाद आखिरकार एक थानेवालों ने उन्हें गाड़ी में डाला और अस्पताल ले गए. मैं लौट आया.

दो दिनों बाद कॉलोनी के वॉट्सएप ग्रुप में एक फोटो वायरल हो रही थी. एक अनाम बूढ़े की लाश सड़क पर मिली. ये फोटो उन्हीं बूढ़े अंकल की थी जिन्हें उस रोज मैंने पुलिसवालों को सौंपा था.

मानसिक संतुलन खो चुके लोग सड़क पर सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


इस वाकये के बाद दिनों तक चुप रहा. बार-बार लगता कि उन अंकल को पुलिस को सौंपने की बजाए खुद ही अस्पताल ले जाता तो शायद जान बच जाती.फिर तो सड़क पर जो भी खोया-भटकता हुआ दिखे, सुनील ठिठक जाते हैं. और तब तक नहीं टलते, जब तक उस शख्स को महफूज ठिकाने तक न पहुंचा दें. वे बताते हैं- खोए हुओं को घरों तक पहुंचाना आसान है लेकिन जिन्हें भूलों का ठिकाना खोजना बहुत मुश्किल है. मैं अक्सर उन लोगों से टकराता हूं जो मानसिक रूप से दिव्यांग हैं. जिन्हें अपना नाम भी याद नहीं. ऐसे में उनके घरवालों तक पहुंचना दिमागी कसरत से कम नहीं.

एक बार ग्रेटर नोएडा से गुजरते हुए जंगल की तरफ जाता एक लड़का दिखा. मुझे देखा तो जंगल की ओर सरपट भागा. जंगल इतना घना था कि मैं अकेले भीतर जाने की हिम्मत नहीं कर सका.

पूछताछ की तो पता चला कि वो महीनों से आसपास दिख रहा है. मैं अगले रोज गया. वो लड़का फिर से भीतर भाग गया. अब मैं रोज जाने लगा. साथ में खाना बंधवाकर ले जाता और थैली एक पेड़ पर लटका देता. दूर से देखता. वो लड़का थैली निकालकर ले जाता था. ऐसा 15 दिनों तक चला होगा. धीरे-धीरे वो मुझसे बात करने लगा. पता लगा कि पढ़ा-लिखा लड़का है.

घरेलू हालातों की वजह से डिप्रेशन में घर छोड़ दिया था. यहां-वहां भटकता रहा और अब जंगल ही उसका घर है. और कुरेदा तो उसका नाम और गांव पता चल गया.

घर से बिछड़े लोगों को उनके परिजनों तक पहुंचाना आसान नहीं (प्रतीकात्मक फोटो)


मैंने उसकी फोटो के साथ फेसबुक पोस्ट डाली. घंटों में वो धड़ल्ले से शेयर हुई और उसके घरवाले आ पहुंचे. मना-मुनूकर उसे लौटा लिया.

घर से भटके हुए लोगों को लौटाने की मुहिम में कई दिलचस्प बातें हुईं. एक बार कचरे के ढेर पर बैठा एक युवक मिला. उसे चोट लगी हुई थी. अस्पताल पहुंचा तो एडमिट करने से इन्कार कर दिया. खूब जद्दोजहद के बाद भर्ती किया गया. कुछ बेहतर हुआ तो पता-ठिकाना जानने की कोशिश की. नाम और जिले के अलावा वो ज्यादा कुछ नहीं बता सका, सिवाय इसके कि उसके गांव के पास नहर है. हमने फेसबुक पर डाला. पता चला, उस जिले में तीन गांवों के पास से नहर गुजरती है. तीनों गांवों के सरपंचों के नंबर निकलवाए. फोन किया तो एक गांव उसी लड़के का निकला.

ताबड़तोड़ फोन. पुलिस की डांट. अस्पतालों में बकझक. सड़क चलते जिन चेहरों को हम सिरफिरा मानकर आगे बढ़ जाते हैं, सुनील उनके लिए दिन के कई-कई घंटे दे रहे हैं.

सुनील को सोशल मीडिया से काफी मदद मिल रही है


कोई एनजीओ नहीं, कोई फंडिंग या किसी पुरस्कार की चाह नहीं. बस, अपना नाम भी बमुश्किल बता पाने वाले लोगों को महफूज रहना चाहिए. वे बताते हैं- अनाम तरीके से चलाई गई इस मुहिम में फेसबुक के दोस्त मदद करते हैं. पोस्ट के तुरंत बाद मैसेज आने लगते हैं. कोई गांव पता करता है, कोई वोटर लिस्ट निकाल देता है तो कोई सरपंचों या पुलिसवालों के नंबर. मदद के साथ ही कई मुश्किलें भी आती हैं. जैसे पुलिसिया तफ्तीश.

हर बार किसी की मदद को जाओ तो पुलिस का शक आपपर पहले होता है. क्यों मदद कर रहे हो. आईडी दिखाओ. अस्पताल वाले डपट देते हैं- अरे, ये तो नशेड़ी लग रहा है. इसका क्या इलाज करें!

सुनते हुए एकाध बार आपा भी खो देता हूं. एक बार एक पुलिसवाले ने एक लावारिस की तरह रहते शख्स को देखकर कहा था कि ऐसे तो हजारों पड़े रहते हैं. मैं तब भड़क गया था. रहते होंगे हजारों, लेकिन फिलहाल ये सामने है और भूख-प्यास-इलाज न मिलने पर मर सकता है. पुलिसवाला एकदम से तिलमिलाया और फिर पता नहीं क्या सोचकर मेरे साथ अस्पताल चले चला. वर्दी वाले साथ हों तो हर काम आसान हो जाता है, अस्पताल में इलाज भी.

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First published: January 14, 2020, 11:29 AM IST
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