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#HumanStory: 70 की उम्र में जंगल में लकड़ियां काटा करती, आज इटली में सजी है इनकी पेंटिंग

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Updated: December 9, 2019, 3:55 PM IST
#HumanStory: 70 की उम्र में जंगल में लकड़ियां काटा करती, आज इटली में सजी है इनकी पेंटिंग
मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के गुमनाम गांव की बैगा कलाकार जोधईया बाई

कमउम्र में ही तीन 'बच्चन' देकर पति चला गया. घर पालना था. लकड़ी काटने जंगल (forest) जाती तो कभी भालू (wild life creatures) मिलते तो कभी बाघ पीछे पड़ जाते. साथ में कुल्हाड़ी रखती. जैसे ही कोई जानवर दिखे, लकड़ी पर जोर से कुल्हाड़ी मारो. जानवर डरकर भाग जाते. और न भागे तो मैं भाग लेती...

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  • Last Updated: December 9, 2019, 3:55 PM IST
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(Interview Coordination: आशीष स्वामी, कलाकार और प्रशिक्षक)

खेतों की गुड़ाई, गोबर पाथने, लकड़ियां काटने और बाल-बच्चे संभालने के बीच 70 साल की उम्र में ब्रश थामा. जब हाथ कांपने लगते हैं, नजर थरथराने लगती है, तब पेंटिंग शुरू की. 10 सालों में हुनर ऐसा निखरा कि मिलान और पेरिस में इनकी पेंटिंग प्रदर्शनी की धूम मच गई. पढ़ें, मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के 'गुमनाम' गांव की बैगा कलाकार जोधईया बाई को.

बहुत साल गरीबी में बीते. याद नहीं कि कभी भरपेट खाकर सोए हों. बाल-बच्चे छोटे थे. सुबह काम पर निकलती तो देर शाम लौटती. काम भी क्या! किसी के खेत की गुड़ाई, किसी के घर गोबर के उपले बनाना, किसी की कोई और 'मजूरी'. हमारा गांव जंगलों से घिरा हुआ है. इतना घना कि पेड़ आपस में गुंथे हुए हैं. ऐसे जंगल में लकड़ी काटने जाती. शाम ढलने से पहले न लौटो तो शेर-चीते फाड़ खाते. भालू तो चटख धूप में भी आए-दिन किसी न किसी पर हमला करते. रोज सुबह उठती तो डर लगता, फिर बच्चों का मुंह देखकर निकल पड़ती. कंधे पर तेज धार कुल्हाड़ी लिए. पूरे जोर से लकड़ी काटते हुए ध्यान रखना होता था. जरा कोई आहट हो तो झुकी कमर सीधी कर खूंखार 'जानवर को डराने' के लिए तैयार हो जाओ.

उमर हो चली थी. चाल कमजोर हो गई. लकड़ी पर कुल्हाड़ी चलाते कमर-कंधे दुखते. कोई आसरा नहीं था. तब हिम्मत करके बैगा 'आरट' (आर्ट) सीखने की सोची.

कोई आसरा नहीं था. तब हिम्मत करके 'बैगा आरट' सीखने की सोची


गांव में ही शांतिनिकेतन से पढ़े कलाकार आशीष स्वामी रहते हैं. अनछुए बैगा आर्ट को दुनिया के सामने लाने के लिए वे यहीं पर स्टूडियो चला रहे हैं. नैसर्गिक तौर पर ट्रेंड बैगा समुदाय की महिलाओं की कला को मांजते हैं. जोधईया बाई आशीष को गुरू मानती हैं और उन्हीं के स्टूडियो में काम करती हैं.

वे याद करती हैं- गुरूजी के पास पहुंची तो लकड़ी काट-काटकर कमर झुक रही थी. सीखने बैठी तो कुछ समझ न आए. जिंदगी में कभी ब्रश नहीं देखा था. तब गोबर पर काम किया. फिर मिट्टी पर करने लगी.धीरे-धीरे कैनवास पकड़ा. और असल रंग. मिट्टी का रंग, जंगल का रंग, पानी का रंग. सोचती थी, लौटकर जंगल ही जाना होगा लेकिन सीखने लगी तो सीख गई. धीरे-धीरे रंग कर लेती हूं.

अपनी सबसे बुजुर्ग शिष्या के धीरे-धीरे पर गुरूजी बताते हैं- गजब की लगन और ताकत है इन बूढ़ी हड्डियों में. बैठती हैं तो हिलने का नाम नहीं लेतीं. बारीक काम करते हुए जब थोड़ी देर में ही जवान आंखें भी धुंधला जाएं, जोधईया बाई घंटों रंग लिए रहती हैं. जिस उम्र में बूढ़ा मतलब बेकार हो जाता है, वहां इनके जैसे लोग काम शुरू करते हैं.

अपने गुरु आशीष स्वामी के साथ जोधईया बाई


बघेली बोलने और ऊंचा सुनने वाली जोधईया को अपनी तारीफ से कतई मतलब नहीं. वे कहती हैं- नजर कमजोर हो गई है. एक आंख में मोतिया उभर गया है. धीरे-धीरे ही तो करती हूं. बस, काम बढ़िया है. घंटा- दो घंटा काम करती हूं, फिर थोड़ा टहल-टाल लो, बोल-बता लो. फिर काम में लग जाओ. और 'आरट' करने से भालू को भी खास फर्क नहीं पड़ता. वो जंगल में मजे में महुआ खाता होगा.

80 पार कर चुकी जोधईया के मजाक और दिलजोई के अंदाज गजब हैं.

एक बार पेंटिंग के किसी काम में उनके समूह को जबर्दस्त नुकसान हुआ. गुरूजी ने दर्द बांटते हुए कहा- बड़ा घाटा हो गया जोधईया. पैसे भी गए और आइडिया भी चोरी हो गया. जोधईया ने तपाक से कहा- काहे इतना सोग मनाते हो गुरूजी. भालू का एक बाल गिर जाए तो वो कभी रोता नहीं है.

सारी उम्र सिर्फ जंगलों को देखती रही जोधईया की पेंटिंग किसपर होती है. बघेली मिली हिंदी में सप्तम स्वर में जोधईया कहती हैं- हम तो वही बनाते हैं, जो देखते हैं. पेड़-पौधे. महुआ. भालू. शेर. बाघ. शेर हमारा भगवान है. उसकी हम पूजा करते हैं और उसी के इर्द-गिर्द रंग करते हैं.

तस्वीरों में गोबर, चूना, गेरू, खड़िया मिट्टी, पीली मिट्टी के रंगों की बहुतायत दिखेगी


जोधईया की तस्वीरों में गोबर, चूना, गेरू, खड़िया मिट्टी, पीली मिट्टी के रंगों की बहुतायत दिखेगी. साथ में सिंथेटिक रंग भी होते हैं. चटख. जिंदगी से भरपूर. उदासी या तकलीफ का कोई शेड नहीं.

वे खुद कहती हैं- बैगा उदास नहीं होते. वे जंगल की औलादें हैं.

हाल ही में जोधईया की पेंटिंग प्रदर्शनी इटली के मिलान और फ्रांस के पेरिस में भी लगी. जोधईया को इन शहरों के बारे में कुछ नहीं पता. वे इतना जानती हैं कि ये सात समंदर पार कहीं बसते हैं. वे कहती हैं- दिल्ली आई थी. रेल में बैठकर. अब हवाई जहाज में बैठना है. बघेसुर (शेर देवता) चाहेंगे तो बैठ जाऊंगी.

ताजिंदगी गुरबत में रही जोधईया अब पूरे उमरिया की स्टार हैं. हालांकि इस स्टार को अपने 'अदृश्य मुकुट' से कोई मतलब नहीं. बार-त्योहार या किसी भी मौके पर खूब लहक-लचककर करमा डांस करती 80 साल की ये कलाकार कहती है- पहले जंगल जाती थी. अब जंगल बनाती हूं.

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First published: December 5, 2019, 1:17 PM IST
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