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#HumanStory: कहानी, कुत्तों को कायदे सिखाती लड़की की- भूकंप के बाद उन्हीं ट्रेंड कुत्तों ने ढूंढी थी लाशें

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Updated: November 21, 2019, 10:15 AM IST
#HumanStory: कहानी, कुत्तों को कायदे सिखाती लड़की की- भूकंप के बाद उन्हीं ट्रेंड कुत्तों ने ढूंढी थी लाशें
डॉग बिहेवियरिस्ट शिरीन मर्चेंट कुत्तों को 'तौर-तरीके' सिखाती हैं

वो दिन भी ऐसा ही था. वॉक के बाद सुस्ताते पैर, ताजा नारियल की चुस्कियां, वड़ा-पाव की खुश्बुएं, लोकल में गिरते-लटकते लोग. तभी वो खबर आई. गुजरात का भुज थरथरा रहा था. भूकंप (earthquake) के लंबे-गहरे झटकों ने जमीन में खाइयां खोद दी थीं. टीवी की स्क्रीन भरभराती बिल्डिंगें और चीखते चेहरों से सहम गई थी.

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  • Last Updated: November 21, 2019, 10:15 AM IST
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शिरीन मर्चेंट कुत्तों को 'तौर-तरीके' सिखाती हैं. वे कहती हैं- 24 साल पहले जब काम शुरू किया तो लोग हंसते थे. पूछते- तुम क्या करती हो? कुत्ते की बोली आती है क्या तुम्हें? किसी भौंकते कुत्ते को दिखाकर पूछते- बताओ, वो क्या कह रहा है. अब वही लोग अपने कुत्ते को कायदे सिखलाने के लिए आते हैं. डॉग बिहेवियरिस्ट शिरीन की कहानी...

जनवरी 2001. सर्दियों में मुंबई और भी ताजातरीन हो जाती है. समंदर का पानी ऐसे उछलता है जैसे सुबह की सैर करते लोगों से बतिया रहा हो.

वो दिन भी ऐसा ही था. वॉक के बाद सुस्ताते पैर, ताजा नारियल की चुस्कियां, वड़ा-पाव की खुश्बुएं, लोकल में गिरते-लटकते लोग. तभी वो खबर आई. गुजरात का भुज थरथरा रहा था. भूकंप के लंबे-गहरे झटकों ने जमीन में खाइयां खोद दी थीं. टीवी की स्क्रीन भरभराती बिल्डिंगें और चीखते चेहरों से सहम गई थी. मुंबई मानो थम-सी गई. हर कोई अपने तईं मदद पहुंचाने लगा. मेरे पास भी एक जरिया था- मेरे कुत्ते.

वो दोनों क्राइसिस मैनेजमेंट में ट्रेंड थे. मलबे से जिंदा या मुर्दा लोगों को सूंघ निकालने का काम वो बिना डरे करते थे. यही उनका हुनर था.

तुरंत पहुंचना जरूरी था. उन हालातों में एक-एक मिनट कीमती था. मैंने अपने स्तर पर अधिकारियों से बात की. मुझे मना कर दिया गया. एक ने कहा- हमें नहीं चाहिए कुत्तों की मदद. मैं कोशिश करती रही. एक...दो...तीन दिन! तीन रोज बाद आर्मी की एक टुकड़ी हमें अपने साथ लेकर गई. मलबे लाशों की तरह महक रहे थे. कोई खेलता हुआ बच्चा, दफ्तर के लिए तैयार होता कोई शख्स, बाल संवारती कोई कॉलेज की लड़की... सबके सब मिट्टी के भीतर दफ्न हो चुके थे. कुत्तों ने काम शुरू किया. तीन दिन बाद जिंदा लोगों के मिलने की कोई गुंजाइश नहीं थी लेकिन मुर्दा खोज निकालना भी तब हासिल ही था. मलबे के बाहर कितनी ही आंखें इंतजार में थीं. जीते-जी खो जाने से बेहतर है लाशों का मिल जाना.

उन ट्रेंड कुत्तों ने एक के बाद एक कई लाशें सूंघ निकालीं. हम लौट आए, मलाल के साथ कि पहले जाते तो ये चेहरे जिंदा भी मिल सकते थे.

भूकंप के लंबे-गहरे झटकों ने जमीन में खाइयां खोद दी थीं
जिंदगी का बड़ा हिस्सा कुत्तों के बीच गुजार चुकी शिरीन के पास यादों का जखीरा है. वे बताती हैं- कुत्तों से प्यार मुझे बपौती में मिला, जैसे संगीत घराने में सुरीले बच्चे होते हैं. घर पर कुत्ते थे. बड़ी हुई तो आसपास भी कुत्ते तो दिखे लेकिन कई बातें खटकतीं. दफ्तर से गुस्साए लोग घर लौट अपने कुत्ते को लात मार देते. नो या यस न माने तो गालियां देते. कुत्ते भी कम नहीं थे. जिद करते. वॉक करती तो दिखता कि कैसे कुत्ते रास्ते में अड़ जाते हैं. कैसे राह चलते किसी अनजान पर सवार होने लगते हैं.

मैंने कुत्तों और उनके मालिकों के रिश्तों पर काम करने की ठानी. यहीं से मेरा करियर शुरू हुआ.

इंग्लैंड में 4 साल की पढ़ाई और ट्रेनिंग के बाद मुंबई लौटी. काम शुरू किया. कुत्तों के मालिकों से मिलती. उन्हें आपस में बिहेव सिखाने की ट्रेनिंग के लिए कहती. लोग हंसते. ये क्या काम है! अजी, तुम अपना काम करो, हमारा कुत्ता हम संभाल लेंगे. अब अनजान लोग भी मेरे पेशे को सुनकर रुक जाते हैं. उनकी आंखों और आवाज में हैरत होती है. अरे वाह, ये तो एकदम अलग काम है. और जरूरी भी!

कुत्तों को अदब सिखाना कितना जरूरी है ये उनसे पूछें जो उनसे डरते हैं. वे पूरी सज-धज में निकल रहे हों और अचानक कोई कुत्ता उनके पैर जकड़ ले. अब जख्मी पैर और फटी पतलून लेकर वे कुत्ते के मालिक से बहस करें या अस्पताल जाएं.

कुत्ते असल में छोटे बच्चे की तरह हैं. उनका भी मिजाज अलग-अलग होता है. कोई गुस्सैल होता है, कोई एकदम शांत-सुग्गा. कोई खूब सोता है तो कोई छककर खाता है. उन्हें भी बच्चों की तरह ही प्यार चाहिए. वक्त और ट्रेनिंग चाहिए. कई बार मेरे पास देर रात फोन आता है.

घबराई आवाज में कोई डॉग-ओनर शिकायत कर रहा होता है- मेरा कुत्ता तो हाथ से निकल गया है. अब मैं क्या करूं?

कुत्तों को अदब सिखाना कितना जरूरी है ये उनसे पूछें जो उनसे डरते हैं


मैं ट्रेन करना शुरू करती हूं तो दुखड़ा रोते हैं- और कितना वक्त लगेगा! हमें होमवर्क क्यों दे रही हैं! ट्रेनिंग तो कुत्ते की है. तब मैं समझाती हूं कि बेशक ट्रेनिंग उनकी है लेकिन साथ तो आपको रहना है. इसलिए आपको भी सीखना होगा. कई लोग क्विक फिक्स के लिए आते हैं. वे सोचते हैं कि रातोंरात उनके 'टॉमी-टाइगर-जेन' में लोगों से घुलने-मिलने की तमीज आ जाएगी. मैं ऐसे लोगों को वापस भेज देती हूं. बेसिक ट्रेनिंग में ही एक कुत्ते को 2 से 3 महीने लगते हैं. उन्हें वक्त देना होता है. बच्चों की तरह सिखाना होता है.

कुछ लोग फोन करते हैं. बताते हैं कि उनका घर कितना बड़ा है, उनके पास कितने ढेर पैसे हैं. फिर कहते हैं कि उन्हें कुत्ता पालने का 'मन' है. बड़ा घर और पैसे हैं तो कुत्ता भी तो चाहिए! मैं झट से टोक देती हूं. कुत्ते को ये सब नहीं, आपका वक्त चाहिए.

कईयों की शिकायत रहती है कि उनका डॉग प्यारा तो है लेकिन कई बार भड़क जाता है. मालिक के साथ ही काट-कूट कर जाता है.

तब मैं उन्हें लाइव ट्रेनिंग देती हूं- कुत्ते के शरीर की बोली समझने की. आंखें ऐसी दिखेंगी, पूंछ में ये हरकत होगी या शरीर ऐसे सिकुड़ जाएगा यानी कुत्ते को गुस्सा आ रहा है. उस वक्त उससे कोई उम्मीद न रखें. कुत्ते को भी कई बार प्राइवेसी चाहिए होती है. जब उसकी बॉडी लैंग्वेज कुछ खास इशारे दे तो उसे अकेला छोड़ दें.

लोगों को लगता है कि मेरा काम मजे का है, दिनभर कुत्तों के साथ खेलने के पैसे वसूलना. मैंने नहीं बताया कि ये काम खून-पसीना लेता है.

मेरे लिए ये पेशा नहीं, जुनून है. आधी रात भी कोई फोन आए तो करवट बदलकर सो नहीं जाती, जवाब देती हूं. एक फोन आया. एक औरत थी. मेरी जाननेवाली. शहर छोड़ रही थी और रातोंरात अपने दो-दो कुत्तों को कहीं 'एडजस्ट' करना चाहती थी. मैं कह नहीं सकी कि कुत्तों की जगह आपके बच्चे होते तो क्या आप उन्हें भी ऐसे ही कहीं एडजस्ट कर देतीं. कुत्ते पालें तो उनकी भी जिम्मेदारी लें, जैसे अपने मां-बाप या बच्चों की लेते हैं. कम से कम रातोंरात उन्हें अलग तो न करें.

कई बार लोग पूछते हैं कि 'असल में' मैं क्या करती हूं. असल में मैं दो नस्लों के बीच की दूरियां मिटा रही हूं.

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First published: November 21, 2019, 10:15 AM IST
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