#HumanStory: मुस्लिमों ने छोड़ा गांव, हिंदू युवक कर रहा मस्जिद की देखभाल, पांचों वक्त होती है नमाज

मुस्लिमों के जाने के बाद सालों तक मस्जिद सूनी पड़ी रही (प्रतीकात्मक फोटो)

सूनी मस्जिद (mosque) देख उसमें शराबी-कबाबी आने लगे. जुआं खेलते. गंदगी करते. खून ने उबाल मारा तो हमने मस्जिद की देखभाल का जिम्मा ले लिया. अब 10 बरस बीते, रोज झाड़-पोंछ होती है. धूप-लोबान की खुश्बुएं पसरी रहती हैं. पांचों वक्त अजान (azaan) भी होती है, नमाज (namaz) भी. हम हिंदू (Hindu) हैं लेकिन अल्लाह ने हमें इस काम के लिए चुना.

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आज से 100 बरस बाद इतिहास (history) लिखा जाए तो शायद उसमें हमारे वक्त का भी जिक्र हो. वो वक्त- जब मुल्क (nation) मजहबों की नफरत में झुलस रहा था. वक्त- जब मौत पर भले कोई न जुटे लेकिन हक के नाम पर सड़कों पर सैलाब बजबजाए. इतिहास में लेकिन, एक और दास्तां भी होगी. एक गांव की. उसके एक बाशिंदे की. भुच्च देहाती बोली-बानी वाले उस शख्स की, जो मस्जिद को मंदिर की तरह पूजता है.

पढ़ें, बिहार (Bihar) के अजय पासवान (Ajay Paswan) को, जो कहते हैं- पुरखों का मस्जिद (mosque) है. देखभाल कर रहे हैं तो इसमें कौन 'बड़ी' बात!

मारी गांव. बिहार के नालंदा जिले के इस गांव की आबादी बमुश्किल 3000 होगी. कच्चे-पक्के, अधपक्के मकानों में रहते सीधे-सरल लोग. फोन करो तो एलीट अंदाज में हलो नहीं कहेंगे- जोर से पूछ पड़ेंगे, 'कौन बोल रहा है'! इसी गांव के हैं अजय. गांव की इकलौती मस्जिद की पिछले 10 बरस से देखभाल कर रहे हैं. ठीक वैसे ही, जैसे कोई मुस्लिम करता.

वे बताते हैं- चालीस-एक साल पहले गांव में थोड़े-बहुत मुसलमान भाई थे. उन्होंने ही मस्जिद बनवाई और अजान-नमाज किया करते. फिर एक-एक करके वे गांव से चले गए.

बिहार के अजय पासवान मस्जिद की देखभाल कर रहे हैं


क्यों चले गए?

अब ये हम क्या जानें. हम तो थे नहीं. बड़े-बूढ़े कहते हैं कि रोजगार के लिए दूसरे शहर चले गए. ढेर हिंदू भी गए लेकिन उनकी आबादी ज्यादा थी तो गांव आबाद रहा.

मुस्लिमों के जाने के बाद सालों तक मस्जिद सूनी पड़ी रही. फिर यहां शराबी-कबाबी आने लगे. रात में पीते, हुल्लड़ करते. दिन में भी उन्हीं लोगों को जमावड़ा रहता. मैं तब लगभग 20 साल का था. रोज देखता कि भोलेनाथ का मंदिर साफ हो रहा है. बजरंग बली के मंदिर में लोग माथा टेक रहे हैं लेकिन मुसलमानों के धरम-करम की जगह पर शराबी बसने लगे हैं. मैंने अपने कुछ दोस्तों से बात की. गांव में मुसलमान भले न हों, लेकिन आदमी तो हैं. हिंदू हैं तो क्या अल्ला अपनी पूजा से मना करेंगे! हमने मन बना लिया और मस्जिद की देखभाल करने लगे.

अल्लाह को हमसे काम लेना था तो हमारे दिल में जुनून डाल दिया- अजय कहते हैं.

शुरुआत शराबियों को भगाने से की. फिर मस्जिद की साफ-सफाई शुरू की. दरवाजे तोड़े जा चुके थे. फर्श पर पान-तंबाखू के दाग थे. यहां-वहां बोतलें बिखरी पड़ी थीं. कहीं झाड़-झंखाड़ उग आई थी. एक सिरे से सब साफ करना शुरू किया, कई दिन लगे. इसके बाद दूसरे गांव गए और वहां के मुस्लिम दोस्तों से सलाह-मशविरा किया. मौलवी जी से अजान की रिकॉर्डिंग करवाई और पेन ड्राइव पर लेकर गांव लौटे. देखादेखी नमाज भी सीख ली. पहले दिन सुबह की अजान के लिए अलार्म लगाया.

घर की इकलौती अलार्मघड़ी चिंघाड़ी तो पूरे पड़ोस की नींद टूट गई. बड़े बुड़बुड़ाने लगे, बराबर वाले मुंह पर चादर ढांपकर दोबारा सो गए. हम ठिठुरते हुए नहाए और मस्जिद की तरफ दौड़ पड़े.

बिहार के नालंदा जिले की वो मस्जिद जो सालों सूनी पड़ी रही


अब 10 साल बीते, रोज पांचों वक्त की अजान और नमाज होती है. लोबान जलाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हनुमान मंदिर में धूप देते हैं.

हिंदू होकर नमाज पढ़ते हैं. धरम नहीं बिगड़ता?

काहे बिगड़ेगा! नमाज पढ़ते हैं लेकिन चालीसा नहीं भूले. मंदिर भी जाते हैं. पूजा-पाठ करते हैं. भोलेबाबा और बजरंग बली हमपर खूब प्रसन्न रहते हैं. अल्ला की भी हमपर 'किरपा' है. परिवार, बाल-बच्चे सब ठीक है. धरम कैसे बिगड़ा फिर.

लगभग 32 साल के अजय को मस्जिद की उम्र नहीं पता. वे बताते हैं- पूरा गांव इसे बुजुर्गवार मानता है. बूढ़ों से पूछो कि मस्जिद कब बनी तो कहते हैं कि हमने अपने जनम से यहीं देखा. शायद 200 बरस पुरानी हो. आज भी गांव में शादी होती है तो नया जोड़ा सबसे पहले मारी मस्जिद आता है, उसके बाद देवी-देवता पूजते हैं. पुरखों से यही रिवाज चला आ रहा है.

गांव में शादी होती है तो नया जोड़ा पहले मस्जिद आता है (प्रतीकात्मक फोटो)


पूरी बातचीत में अजय कई बार दोहराते हैं कि अल्ला ने उन्हें इस काम के लिए चुना है. शायद ऐसा ही हो क्योंकि पेशे से राजमिस्त्री अजय अब मस्जिद की मरम्मत का काम भी कर रहे हैं.

अजय याद करते हैं- बदमाशों ने अच्छी-खासी मस्जिद में तोड़फोड़ मचा रखी थी. आधे दरवाजे, टूटी खिड़कियां और दीवारों से झड़ता पलस्तर. सालों से अडोल मस्जिद अचानक ही बुढ़ाई दिखने लगी थी. तब हमने और कुछ दोस्तों ने मरम्मत का जिम्मा लिया.

20 साल के अजय अब 32 छू रहे हैं. बाल-बच्चेदार हैं लेकिन मस्जिद के लिए उनका जुनून बरकरार है. हाड़ कंपाती सर्दी हो या तूफानी बारिश, अजय सुबह 4 बजे की अजान से पहले नहा-धोकर मस्जिद पहुंच जाते हैं.

वे कहते हैं- ऐसा कैसे हो कि गांव के मंदिर चमचमाते रहें और इकलौती मस्जिद में शराबी ठाठ करें. अल्लाह भी भगवान ही हैं, पूजा तो होनी चाहिए.

(*अजय पासवान के अलावा गौतम प्रसाद और बखोरी भी मस्जिद की देखरेख में बराबरी से हिस्सा बंटाते हैं. )

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