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#HumanStory: वो शख्स जो 'ऑर्डर' पर लिखता है इज़हार-ए-मोहब्बत के ख़त

News18Hindi
Updated: November 25, 2019, 10:15 AM IST
#HumanStory: वो शख्स जो 'ऑर्डर' पर लिखता है इज़हार-ए-मोहब्बत के ख़त
अनुभव अंकित अब तक साढ़े सात लाख से ज्यादा खत लिख चुके हैं

बैंगलोर (Bengaluru) का वो छोटा-सा रेस्त्रां (restaurant)! कहवे की तुर्श-मीठी खुश्बू पसरी हुई थी. छोटी-छोटी चुस्कियां लेते बात निकली. चिट्ठियां! उनका जमाना अलग ही था. चिट्ठी (letter) में शुरू से आखिर तक हिज्जों (spelling) का घमासान हो लेकिन प्यार में डूबी हो तो पढ़ने वाला मान ही जाता. कॉफी (coffee) का सुरूर चढ़ा. आज हम 9 भाषाओं (languages) में इज़हार-ए-मोहब्बत से लेकर इज़हार-ए-जंग कर रहे हैं.

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अनुभव अंकित वो शख्स हैं, जो ऑर्डर पर चिट्ठियां लिखते हैं. अंकित का दावा है कि हाथ से लिखी गई ये चिट्ठियां अंटार्कटिका से लेकर नील नदी के किनारे तक पहुंचाई जा सकती हैं, बशर्तें पढ़ने वाला वहां इंतजार करता मिले. अंकित की कहानी...

उड़ीसा के एक गांव से हूं. पढ़ने के लिए इंदौर के एक बोर्डिंग स्कूल भेजा गया, तब 11 साल का था. जाते ही नक्शे देखने का शौक लग गया. रोज देखता कि शहर से गांव कितनी दूर है.

घर पर ताजी मछलियां और घी में पगे चावल खाने वाला बच्चा कैंटीन में खाने की थाली तब तक देखता, जब तक खाने का वक्त खत्म न होने लगे. फिर जैसे-तैसे कौर धकेल लेता. मां की याद आती. गांव के दोस्तों संग बोलने को जी करता. ऐसे में एक ही सहारा था- चिट्ठियां.

हॉस्टल में इतवार को घर चिट्ठी लिखने की इजाजत थी. उस रोज सोने-खाने का कोई नियम नहीं होता था. कई बच्चे पूरा-पूरा दिन खेलते, कुछ सोते तो कुछ पढ़ते. मैं पूरा दिन चिट्ठियां लिखा करता था. मां को, बाबा को, दादा को, कबड्डी खेलने वाले दोस्तों को, साथ तैरने वाले साथियों को. एक बार तो मैंने गांव के पोस्टमास्टर अंकल को भी थैंक-यू लेटर लिखा था.

चिट्ठी में सारा बही-खाता रहता कि क्या करता हूं, कैसे रहता हूं, कैसे खेल-खेल में पैर टूट गया...अंतरर्देशीय भर जाता. फिर छोटे-छोटे अक्षर बनाने लगा ताकि कम जगह में हाले-दिल समा जाए.

हॉस्टल में इतवार को चिट्ठी लिखने की इजाजत थी (प्रतीकात्मक फोटो)


चिट्ठी भेजना अकेली रस्म नहीं थी. उसके बाद शुरू होता था इंतजार. लड़कों में शर्तें बद जातीं कि किसकी चिट्ठी पहले आएगी या फिर किसे पूरे महीने में सबसे ज्यादा जवाब मिलेंगे. तब लैंडलाइन तो था लेकिन इतने पैसे नहीं हुआ करते थे कि जब याद आए, फोन घुमा सकें. मुझे भी खूब चिट्ठियां मिलतीं. मां उड़िया में ऐसे लिखती जैसे बगल में लेटी लोरी सुना रही हो. दादा की चिट्ठी में ऐसा दुलार होता जैसे सबकी डांट से मुझे बचा रहे हों.शहर में हिंदी-अंग्रेजी पढ़ने-बोलने वाला वो लड़का चिट्ठियों और सपने में सिर्फ उड़िया में बातें करता.

कैलेंडर बदलने के साथ ही चिट्ठियों का दस्तूर भी पुराना पड़ गया. जब याद आती, धड़ाक से फोन लगा लेते. मैं भी नई जमात में शामिल हो गया. पढ़ाई के बाद काम के सिलसिले में बैंगलोर रहने लगा. उड़ीसा से बहुत दूर. गांवघर याद आता तो चिट्ठियों वाले इतवार की बाट जोहे बिना खट से फोन लगा लेता.

जी करता तो दोस्तों को मेल भी करता. लंबे-लंबे ई-मेल. लंबे जवाब भी आते लेकिन उनमें वो नमक नहीं मिलता था, जो चिट्ठियों में था.

साल 2016! बैंगलोर के एक रेस्त्रां में बात चल पड़ी. दोस्त भी बोर्डिंग में पढ़ा था. चिट्ठियों के दौर उसने भी देखे थे. हम दोनों ही चिट्ठियां लिखने-पाने को शिद्दत से याद कर रहे थे. तय हुआ. आधी रात में ही ब्लॉग तैयार हुआ. नाम पड़ा The Indian Handwritten Letter Co. अब हम खाली वक्त में लोगों के लिए ऑर्डर पर चिट्ठियां लिखा करते. धीरे-धीरे ऑर्डर बढ़ने लगे. हमारे क्लाइंट वे थे, जिनके पास चौबीसों घंटे स्मार्टफोन रहता है. जो हफ्ते के 5 रोज ईमेल करने के ही पैसे लेते हैं. फिर उन्हें चिट्ठियां लिखवाने की क्या जरूरत!

अनुभव अंकित ने अपने इसी दोस्त के साथ मिलकर काम की शुरुआत की


चिट्ठी जिंदा चीज है. सांस लेती है. पढ़ने वाला उसे पढ़ता ही नहीं, छूता भी है, देखता भी है.

खत पढ़ते हुए कोई प्रेमी सोचता है कि फलां लाइन लिखते हुए प्रेमिका कैसे बैठी होगा, उसका कमरा कितना बिखरा होगा या फिर कितने पन्ने फेंकने के बाद वो ये लिख सकी होगी. चिट्ठी आपके सामने एक अलग ही दुनिया खोल देती है. जैसे टाइम मशीन में बैठकर आप एक साथ दो जगहें जी रहे हों.

एक ही चिट्ठी दिन के पांच अलग-अलग वक्त पढ़ी जाए तो उसके पांच मायने निकल आते हैं. ई-मेल या फोन में वो बात नहीं. हमें चिट्ठी ऑर्डर देने वाले भी ये बात समझते हैं.

पहले हम केवल अपनी हैंडराइटिंग में चिट्ठी लिखा करते और उसे पते पर पहुंचवाते. फिर एक रोज फोन आया. किसी को लव लेटर भेजना था. उसने कहा- मैं दफ्तरी मेल कर पाता हूं लेकिन प्यार में डूबी चिट्ठी लिखना मेरे बस का नहीं. तब हमने उसके लिए कंटेंट भी लिखा. अप्रूवल के बाद वो उसकी प्रेमिका तक पहुंचा दिया गया. अब डिमांड के चलते हमारे पास लेटर लिखने, लेटर का कंटेट लिखने, हैंडराइटिंग, लेटर पैड, इंक, कुरियर सबके ढेरों विकल्प हैं.

आजकल ब्रेकअप लेटर लिखवाने की भी डिमांड आ रही है (प्रतीकात्मक फोटो)


4 सालों में अनुभव सात लाख से भी ज्यादा चिट्ठियां लिख चुके हैं. वे बताते हैं- 9 अलग-अलग भाषाओं में चिट्ठियां लिखी जाती हैं. इसके लिए हमारे पास लेटर राइटर भी हैं. इसमें अधिकतर हाउस वाइव्स हैं, कई फुलटाइम प्रोफेशनल भी हैं, जिन्हें चिट्ठियां लिखना पसंद है. ऐसे 39 लोग अभी पूल में हैं. मैं खुद भी लिखता हूं.

लाखों-लाख चिट्ठियों में सबसे ज्यादा क्या लिखा गया?

तपाक से जवाब आता है- बेशक, लव-लेटर्स! दिन में अगर 100 चिट्ठियां लिखता हूं तो उनमें से 75 प्रेमपत्र होते हैं.


प्यार के इजहार के ये खत हम बड़ी नाजुकी से लिखते हैं,. एहतियात से जैसे अपने लिए ही लिख रहे हों. आजकल ब्रेकअप लेटर लिखवाने की भी डिमांड आ रही है. क्लाइंट बुलेट पॉइंट्स में डीटेल भेज देता है और हमें खोलकर लिखना होता है. ऐसे कि रिश्ता टूटने की असल वजह समझ आ सके.

वो चेहरे जिन्हें हम कभी देख नहीं सकते, वे ही अपनी जिंदगी के कितने ही पोशीदा पन्ने हमारे सामने खोलकर रख देते हैं.

ऐसे में हमारी भी जिम्मेदारी बनती है उनकी गुमशुदगी बनाए रखना. हमारी वेबसाइट ऐसे बनाई गई है कि सारा डेटा तीन हफ्ते बाद चला जाता है. चिट्ठी लिखवाने वाला जब तक खुद हमें अप्रोच न करे, हम दोबारा उसतक नहीं पहुंच सकते हैं. अपने हाथ से चिट्ठी लिखना और उसे सही शख्स तक पहुंचाना- बस, हमारा काम यहीं खत्म हो जाता है.

चिट्ठियों के मार्फत कुछ अजीबोगरीब मामले भी आते हैं. कई राज भी खुलते हैं. कईयों इंतजार टूटते हैं. कई दिल टूटते हैं. कई मामले आए, जिनमें 'आगे क्या हुआ' जानने की खलिश अब भी बाकी है.

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First published: November 25, 2019, 10:15 AM IST
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