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#HumanStory: गैंग रेप सर्वाइवर की मां का दर्द- 'नींद में चीखकर रोती है...एक आंख से दिखाई नहीं देता'

News18Hindi
Updated: December 3, 2019, 11:37 AM IST
#HumanStory: गैंग रेप सर्वाइवर की मां का दर्द- 'नींद में चीखकर रोती है...एक आंख से दिखाई नहीं देता'
ये कहानी है गुड़िया की, जिसे स्कूल से उठा लिया गया (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)

हैदराबाद गैंग रेप (hyderabad gang rape) अकेला मामला नहीं. बस, जगह और तारीखें बदल रही हैं. जैसे बीते साल मंदसौर (mandsaur) में 7 बरस की बच्ची के साथ गैंग रेप (rape with minor). चौबीस घंटों के भीतर मुजरिम (criminal) हिरासत में थे. लेकिन, कोई भी सजा, संसद का शोर और 'दिल्ली-दार' भीड़ उस मां के लिए मरहम नहीं, जिसकी बेटी का रेप होता है.

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  • Last Updated: December 3, 2019, 11:37 AM IST
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ये कहानी है गुड़िया* की, जिसे स्कूल से उठा लिया गया. बीतती गर्मियों की उस रात तेज बारिश हुई. पूरा घर उसे खोज रहा था, वो जंगल में पड़ी थी. ये कहानी है गुड़िया के लौटने की. अस्पताल, इंजेक्शन, नलियों और दवाओं की. थाने की, कोर्ट की. न खत्म होने वाली रातों की. और उस मां की जो अपनी गुड़िया के साथ मिलकर उसके डर से लड़ी- छोटे- बड़े डर. चीर देनेवाले डर. रोज. साल-दर-साल.

जून, 2018 को मध्यप्रदेश के मंदसौर में एक बच्ची का बलात्कार हुआ
देश सड़कों पर उतर आया. अखबार रंग गए. मोमबत्तीदार रो पड़े. धाराओं पर बहसें हुईं. इस सबके बीच तकरीबन दो महीने बच्ची अस्पताल में रही. उसका प्राइवेट पार्ट गंभीर रूप से जख्मी था. आंतें बाहर आ चुकी थीं. मुंह से लेकर पूरे शरीर पर दांत और नाखूनों के निशान. चोटें इतनी गहरी कि पहली सर्जरी 7 घंटे चली. गले पर टांके लगे. ऑपरेशन और इलाज चलता रहा. डेढ़ साल बीत चुके हैं लेकिन बच्ची के साथ-साथ पूरे परिवार की जिंदगी तितर-बितर है.

अब जबकि हैदराबाद में महिला वेटेनरी डॉक्टर से गैंग रेप और हत्या से पूरे मुल्क का खून उबल रहा है, मंदसौर की मां 'शनिवार का इंतजार' कर रही है. ये इंतजार हर हफ्ते आता है.

वो कहती हैं- हादसे के बाद लोथ बनी बच्ची को देखने लोग आते तो लौटते हुए बुदबुदाते थे कि अब इसका क्या होगा! हमने तब मंदसौर छोड़ दिया. बच्चों को लेकर इंदौर आ गए. आसपास के लोग बच्ची की हालत के बारे में सवाल-जवाब न करें इसलिए उसे हॉस्टल में डाल दिया. शनिवार-इतवार छुट्टी होती है तो वो घर लौटती है. मेरे लिए अब इन्हीं दो दिनों से हफ्ता बनता है.

लोग बच्ची की हालत के बारे में सवाल-जवाब न करें इसलिए उसे हॉस्टल में डाल दिया (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)


साल 2018 की गर्मियां अब भी उस मां को बखूबी याद हैं.
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26 जून की शाम. उसका स्कूल शाम पांच बजे छूटता था. छोटी सी जगह. ऐसी कुछ खास दूरी नहीं थी और न कोई डर. वहां लोग एक-दूसरे को लगभग जानते हैं. उस रोज ‘उसके’ पापा थोड़ी देर से स्कूल पहुंचे. वो जा चुकी थी. वहीं से मुझे फोन किया. वो घर नहीं पहुंची थी. कहां जा सकती है! कभी अकेली गई-आई भी नहीं थी. स्कूल में पूछा. उन्होंने उसे किसी और के साथ जाने दिया था. घंटाभर से ज्यादा हो चुका था. 12 लोगों का परिवार है और वो सबसे छोटी. खोजबीन मच गई. सब जगह ढूंढा. नदी-नाले हर कहीं खोजा. रात हो चुकी थी. हल्की बारिश हो रही थी. रातभर खोज चली. थाने में रिपोर्ट भी लिखवाई.

अगली रोज सुबह तो हुई लेकिन उजाला नहीं
रातभर बारिश हुई. पास ही एक जंगल भी है. वहां से बाहर गुजरती पक्की सड़क से जाते हुए एक बच्चे ने एक बच्ची को देखा. खून से सनी हुई. वो बच्ची मेरी गुड़िया थी. उन्होंने उसका बलात्कार किया. चाकू मारा. भीतर के हिस्से में सरिया घुसेड़ दी और मरा समझकर चले गए. वो रातभर जंगल में पड़ी रही. बारिश की बूंदों से होश आया तो किसी तरह चलकर सड़क पर आई और उस बच्चे से मदद मांगी. बच्चा लोगों को इकट्ठा करने लगा. पुलिस पहुंची. हमें बुलाया. पुलिस की गाड़ी में ही उसे लेकर मंदसौर के अस्पताल पहुंचे. डॉक्टरों ने मरहम-पट्टी कर खून रोका और हाथ खड़े कर दिए. वे इतना 'सीरियस' मामला नहीं देख सकते थे. उसे इंदौर के बड़े अस्पताल भेज दिया गया.

छोटा-सा शरीर दर्द में ऐंठता. कभी खून चढ़ता, कभी ग्लूकोज़ (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)


लगभग मरी हुई हालत में वो मिली थी.
शरीर हर जगह से नुचा-कटा, खून में लथपथ. उसे देखते ही होश खो बैठी. बेहोशी टूटी तब उसने मुझे सब बताया. मैं बार-बार बेहोश हो रही थी. उधर गुड़िया रो रही थी. वो बार-बार पानी मांगती और मुझे बुलाती. आठ रोज मैं होश और बेहोशी के बीच झूलती रही. 'अपनेवाले' आते. समझाते. और चले जाते. मैं मां हूं. ऑपरेशन करके मेरी बच्ची की आंतों को बाहर निकाल रखा था. छोटा-सा शरीर दर्द में ऐंठता. कभी खून चढ़ता, कभी ग्लूकोज़. क्या बताऊं, कितनी चोटें लगीं! इतनी-सी बच्ची ने पता नहीं कैसे हिम्मत रख ली!

पूरे देश में गुड़िया के लिए इंसाफ की मांगें बुलंद हुईं
दोषियों को 55 दिनों के भीतर सजा-ए-मौत का एलान हो गया. दोषी जिस समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, उसमें उनकी मौत के बाद जनाजा न उठाने और कब्र के लिए जमीन न देने का एलान हुआ. सोशल मीडिया खुशी से चीत्कार उठा. इसे कहते हैं इंसाफ! इंसाफ से हालांकि उस बच्ची की तकलीफें जरा भी कम होती नहीं दिखती हैं.

तब से कभी भरपेट नहीं सोई
गुड़िया की मां याद करती हैं, ‘वो बताती, अंकल लोगों ने गंदा काम किया. खूब मारा. चाकू से, हाथ-पैर से. लोहा घुसेड़ दिया. बताते हुए रो-रो पड़ती. अब चुप रहने लगी है. हॉस्टल में है. लोगों की टोक-टाक से दूर. हफ्ते के 2 दिन घर आती है तो मुझसे चिपकी रहती है. साथ में सोती है. हंसती-बोलती भी है. बस, एक ही तकलीफ है. हादसे के बाद से वो एक रात भी पूरी नींद नहीं सो पाई. 'चमककर' जाग उठती है. चीखकर रो देती है. जागते हुए कुछ नहीं कहती लेकिन नींद में उसका डर जाग जाता है. तब चिपटाकर सुलाती हूं. हॉस्टल में 5 रातें अपनी एक टीचर के साथ सोती है, अभी उसे अकेला छोड़ना ठीक नहीं.

मिली तो जैसी हालत थी, किसी को नहीं लगा था कि वो जी जाएगी (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)


अब 8 साल की हो चुकी गुड़िया को दाईं आंख से धुंधला दिखता है. मां ऐसी आवाज में बताती हैं जो बोल-बोलकर ऊब चुकी हो.

'उसे सीधी (दाहिनी) आंख से दिखाई नहीं देता.'

'क्यों?'

'उन्होंने मारा था न. जान तो नहीं गई लेकिन आंख चली गई. पढ़ नहीं पाती. पहले पढ़ने में बहुत तेज थी. जब अस्पताल में थी तो डॉक्टरों ने कहा था, अभी बहुत कमजोर है, आंख के लिए बाद में सर्जरी करेंगे. अब अस्पताल जाएं तो कोई सुनने को तैयार नहीं होता. किसे दिखाएं?'

मीडिया की दखलंदाजी की आदी हो चुकी गुड़िया की मां छोटे-छोटे वाक्य बोलती हैं. जितना पूछा जाए, सिर्फ उतना. लंबी-लंबी चुप्पियों से भरे वाक्य. चुप्पियों के बीच अपनी बेटी के गुम हो चुके नाम को तलाशते हुए. वो बेटी जब गुड़िया नहीं थी, तब क्या रही होगी!

(पहचान छिपाने के लिए गुड़िया* का नाम और चेहरा बदला जा रहा है.)

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First published: December 3, 2019, 11:06 AM IST
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