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Human Story: मुझे डर है कि एक दिन वह मुझे छोड़ जाएगी क्‍योंकि 'मैं पूरा नहीं हूं'

Human Story: मुझे डर है कि एक दिन वह मुझे छोड़ जाएगी क्‍योंकि 'मैं पूरा नहीं हूं'

डिंपल मिथिलेश चौधरी दुनिया के लिए लड़की है. शरीर से लड़की दिखती है, पीरियड्स भी होते हैं, वो खुद को लड़का मानती है. लड़कों की तरह रहती है, लड़कों की तरह महसूस करती है. उसने दुनिया में पहचान की लड़ाई तो जीत ली, लेकिन प्रेम में अब भी अकेली है.

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    मेरा नाम है डिंपल मिथिलेश चौधरी और ये है मेरी कहानी.

    मैं लेस्बियन हूं. हालांकि इस शब्‍द से मुझे बहुत कोफ्त होती है. गे, लेस्बियन, होमोसेक्‍सुअल आदि-आदि.
    पैदा हुई तो लड़की जैसी थी. पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश का एक पारंपरिक घर था, लेकिन हमारे यहां लड़कियां मारी या हिकारत की नजर से नहीं देखी जाती थीं. हालांकि लड़की को लड़की की तरह होना चाहिए, इस पर भी पूरा परिवार, मुहल्‍ला और गांव वैसे ही एकमत था, जैसे पूरा देश था. लड़की को प्‍यार दो, लेकिन लड़की होने की आचार संहिता भी बता दो.

    मैं छोटी थी. मुझे क्‍या पता कि ये लड़का-लड़की क्‍या होता है. मैं तो जो थी, वो थी. जो महसूस करती थी, वो करती थी. ये दिखने और महसूस करने के बीच जो भेद है, उसकी कोई समझ नहीं थी. बस मुझे इतना याद है कि मैं जो भी करती, उसकी लिए पिटती थी क्‍योंकि दिखती मैं अपनी बहन जैसी थी, लेकिन मिजाज मेरे बिलकुल भाई जैसे थे. लड़कियां लड़कियों वाले कपड़े पहनती थीं और मैं बार-बार भाई के कपड़े चुराकर पहन लेती. मुझे फ्रॉक पहनना बिलकुल पसंद नहीं था. लड़कियां लड़कियों के बीच खुसुर-पुसुर करतीं और मैं दिन भर मुहल्‍ले के लड़कों के बीच धूप में भटकती, खेलती रहती. लड़कियां गुडि़या से खेलतीं और मैं लड़कों के साथ क्रिकेट, गिल्‍ली-डंडे और कंचों में लगी रहती. लड़कियां नेल पेंट लगातीं और मैं भाइयों के साथ जूतमपैजार में व्‍यस्‍त रहती. कभी कुहनी टूटती तो कभी घुटने छिलते. मां से रोज धुनाई होती, लेकिन मजाल है जो मैं मान जाऊं या घर में बहनों के साथ वक्‍त बिताऊं. रोज पिटती, रोज लड़कों के साथ खेलने भाग जाती.

    मां को तब ये सिर्फ मेरा लड़कपन और बदमाशी लगती थी. मुझे कुछ लगता नहीं था. मैं तो बस वो करती थी, जो मुझे अच्‍छा लगता था. लेकिन मुझे जो अच्‍छा लगता, वो औरों को अच्‍छा नहीं लगता था. बचपन ऐसे ही निकल गया. असली चुनौतियां तो अभी आनी थीं.

    मैं बड़ी हुई तो मेरी देह भी लड़कियों की तरह आकार लेने लगी. मुझे पीरियड्स भी आने लगे. मैं बाकी लड़कियों की तरह शलवार-कुर्ता पहनकर स्‍कूल जाती थी. स्‍कूल में लड़के-लड़कियां सब थे. लड़के मेरे दोस्‍त थे, मैं उनके साथ फुटबॉल खेलती थी, लेकिन लड़कियों के लिए मुझे अजीब सा आकर्षण महसूस होता था. मेरे क्‍लास में एक लड़की थी. वो मुझे अच्‍छी लगती थी. मुझे पता नहीं था कि ये अच्‍छा लगना क्‍या था, लेकिन मैं उसे लेकर हमेशा पजेसिव रहती. उसे देखती तो देह में एक अजीब सी खुशी की लहर दौड़ जाती, वो स्‍कूल न आए तो किसी काम में मन नहीं लगता. मैं लड़कियों को वैसे देखती और महसूस करती थी, जैसे बड़े होते लड़के लड़कियों को करते हैं. एक अजीब बेचैनी और गुदगुदी का सा एहसास.

    लेकिन दुनिया के लिए तो मैं लड़की थी, लड़कियों के लिए भी लड़की ही थी. वो सब मुझे पसंद करती थीं, मेरी दोस्‍त थीं, मेरे आसपास मंडराती रहती थीं. मैं उन्‍हें लेकर पजेसिव भी होती, लेकिन उनमें से कोई मुझे वैसे नहीं देखता था, जैसे मैं उन्‍हें. उन्‍हें लड़के पसंद थे, लेकिन लड़के क्‍लास की लड़कियों की वैसी निकटता नहीं पा सकते थे, जैसे मुझे मिली हुई थी. मैं खुद को ज्‍यादा लकी मानती. फिर एक दिन ये हुआ कि मेरी पूरी दुनिया हिल गई.

    क्‍लास में दो लड़कियां थीं- मीनल और अंजलि. एक दिन मीनल बोली, “अजय उसे मिला था पान की दुकान के पास. उसने उसे लेटर देने की कोशिश की. मैं तो डर गई, मम्‍मी-पापा को पता चल गया तो.”



    मुझे ये सुनकर इतना गुस्‍सा आया कि ये लड़के के बारे में क्‍यों बात कर रही है. उस दिन मुझे पहली बार लगा कि दुनिया में लड़के भी होते हैं और लड़कियां लड़कों को पसंद करती हैं, लड़कों के साथ घूमती हैं, लड़कों के साथ डेट पर जाती हैं. मुझे लगा कि ये लड़की, जो मुझे पसंद है, क्‍या उसे कोई लड़का पसंद है. क्‍या ये सारी लड़कियां लड़कों को पसंद करती हैं, लड़कों को प्‍यार करती हैं.

    मुझे लड़की पसंद थीं, अभी तक सारी लड़कियां मेरे आसपास थीं. अचानक मुझे लगा कि इनमें से कोई मेरी नहीं. इन सबको कोई लड़का ले जाएगा. फिर मेरा क्‍या होगा.

    लगा मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है. खाना खाना मुश्किल हो गया था उस दिन मेरा, आंखों से नींद उड़ गई. दर्द इतना कि लगे सीने पर सौ मन का पत्‍थर आ गिरा हो. जब कदम दुख से भारी और आंखें गीली होती हैं.

    उस दिन दो चीजें हुईं. पहला- लड़के मुझे दुश्‍मन लगने लगे, वो उन सारी लड़कियों से प्‍यार करने वाले थे, जिन्‍हें मैं प्‍यार करना चाहती थी. दूसरा- पहली बार अपनी पहचान का सवाल दिमाग में कैक्‍टस की तरह उग आया और उसके कांटे मुझे चुभने लगे. मैं क्‍या हूं, क्‍या मैं लड़की हूं. लेकिन मैं तो लड़कियों को प्‍यार करती हूं. तो फिर क्‍या मैं लड़का हूं. लेकिन मैं तो पूरा लड़का भी नहीं हूं. मैं पूरा लड़का नहीं हूं और लड़कियां लड़कों को प्‍यार करती हैं. फिर मुझे कौन प्‍यार करेगा?



    मैं निजी और सामाजिक जीवन में हर क्षण जिस तकलीफ से गुजरी हूं, उसे शब्‍दों में कैसे बयां करूं. कोई कैसे उस तकलीफ को बताए कि जब वो हर जगह से खुद को ठुकराया हुआ महसूस करता है, जब उसे लगता है कि उसके जैसा कोई नहीं, कि उसका अपना कोई नहीं. दफ्तर में जब सब उसे टेढ़ी नजरों से देखते हैं. ये कैसी स्‍त्री है, जिसकी देह स्‍त्री की, लेकिन व्‍यवहार मर्दों वाला है. जब वह खुद को पुरुष माने और पुरुष की तरह महसूस करे, लेकिन यह सच उसे खाए जाए कि वो संपूर्ण पुरुष भी नहीं है. लड़कों के पास कुछ ऐसा होता है, जो उसके पास नहीं है. वो कमरे में बंद होकर जब खुद को आईने में देखे तो लगे कि उसकी पूरी देह पर कांटे उग आए हैं. मैं आईने के सामने निर्वस्‍त्र खड़ी होती. अपनी छातियों को दाहिने बाजू से ढककर खुद को आईने में निहारती हुई. ये मेरी देह का हिस्‍सा है, लेकिन मुझे अपना नहीं लगता. मैं इन छातियों से मुक्‍त होना चाहती हूं. ऊपरी हिस्‍सा ढका हो तो खुद को एक पुरुष की तरह देखना और महसूस करना एक अद्भुत एहसास होता. मेरे कंधे, बाजू, कमर, पैर सब पुरुषत्‍व के बल और गौरव से दीप्‍त हैं. बस जो नहीं है और जो अतिरिक्‍त है, वो पीड़ा का सबब है. मैं अपने अस्तित्‍व, अपनी पहचान की लड़ाई अकेले ही लड़ती रही.

    ये सब कहना मेरे लिए आसान नहीं. इतना खुलकर मैंने पहले कभी नहीं बोला कि अपनी देह की एक-एक कोने में मैंने क्‍या महसूस किया. खुशी और वेदना, दोनों को कहने के लिए मेरे पास कोई जगह नहीं थी. यह साहस मुझे अब आया है कि मैं आंख मिलाकर और सिर उठाकर खुद को स्‍वीकार करूं कि मैं क्‍या हूं. अब मैं अपनी पहचान छिपाती नहीं. फेसबुक पर खुलकर लिखती हूं. अब मुझे किसी का डर नहीं.

    जब मां को बताया कि मैं क्‍या हूं
    वह बहुत भावुक कर देने वाला क्षण था. मैंने मां से कहा कि मुझे आपसे बात करनी है. हम आमने- सामने बैठे थे. मैंने बोलना शुरू किया, “मां, आपको लगता है कि मैं लड़की हूं, लेकिन मैं लड़की नहीं हूं. मैं खुद को लड़के की तरह महसूस करती हूं और मुझे लड़कियां अच्‍छी लगती हैं.” मैंने अपनी कहानी कहनी शुरू की तो कहती चली गई. बचपन की घटनाओं का जिक्र करती रही. “तुम्‍हें याद है मां, मैं कैसे कपड़े पहनती थी, कैसे लड़कों के साथ खेलती थी और तुम हमेशा मेरी पिटाई करती. पहली बार जब शलवार-कुर्ता पहनाया था तो मैं कितना रोई थी.”

    मैं बोलती रही. बीच-बीच में बोलते-बोलते रोने लगती. मां भी रोने लगतीं. वो अपनी साड़ी के आंचल से अपना मुंह ढंके, बीच-बीच में आंखों को पोंछती मेरी बात सुनती रहीं. हमने एक भी बार नजरें नहीं मिलाईं. मैं बोली, “मैं गलत शरीर में पैदा हो गई मां. मैं लड़का हूं. मैं लड़की को प्‍यार करती हूं, लड़की के साथ शादी करना चाहती हूं.” आखिर में कहा कि मैं ऑपरेशन करवाकर अपने ब्रेस्‍ट रिमूव करवाऊंगी. बोलते-बोलते मैं उनकी गोद में सिर रखकर फूट पड़ी.



    मां ने मेरा सिर अपनी दोनों हथेलियों से पकड़कर उठाया और अपनी बोली में बस इतना ही बोलीं, “तो क्‍या हो गया. लड़की पसंद है तो कोई ना. तू मेरा छोरा है. बस ये ऑपरेशन ना करवाना. जैसी है, अच्‍छी है.”
    मेरे घरवालों ने बहुत दुख, लेकिन उससे भी ज्‍यादा प्‍यार से मुझे स्‍वीकार किया. मेरे पिता ट्रक ड्राइवर थे, मां ज्‍यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन वो प्‍यार की भाषा समझते थे. उन्‍हें दुख हो सकता था, लेकिन नफरत करना उन्‍हें नहीं आता था. प्‍यार ने उन्‍हें इस सच को स्‍वीकारने की ताकत दी. अब तो मेरी भाभी मेरी गर्लफ्रेंड को चिढ़ाती हैं, “क्‍या दिल्‍ली में बैठी हुई हो, आकर थोड़ी जेठानी की सेवा कर जाओ.”

    मुझे डर है कि एक दिन वो किसी संपूर्ण पुरुष के लिए मुझे छोड़ जाएगी
    मेरी मां मेरी गर्लफ्रेंड को अपनी बहू बोलती हैं, लेकिन फिर कभी-कभी उदास होकर कहती हैं, “तू भी इसे छोड़ जाएगी न. उन्‍होंने देखा है, इसके पहले जिन भी लड़कियों से मैंने प्रेम किया, उन्‍होंने मुझे छोड़कर किसी पुरुष से शादी कर ली. ये बात वो कहती नहीं, लेकिन उन्‍हें डर है कि हर वो लड़की जिससे मैं प्‍यार करूंगी, वो एक दिन किसी पुरुष के लिए मुझे छोड़ जाएगी.

    वो लड़की है, मैं लड़का हूं. वो लड़की एक लड़के को प्‍यार करती है, वो लड़का मैं हूं. लेकिन मैं भी जानती हूं कि मैं संपूर्ण लड़का नहीं हूं. मुझे डर है कि एक दिन वो किसी संपूर्ण पुरुष के लिए मुझे छोड़ जाएगी. ऐसा हुआ है. अतीत में जिन भी लड़कियों को मैंने प्‍यार किया, उन्‍होंने आखिरकार किसी पुरुष से शादी कर ली. मेरी एक गर्लफ्रेंड ने मुझे बोला था, डिंपल सब ठीक है, लेकिन क्‍या तुम मुझे बच्‍चा दे सकती हो. मैं मां बनना चाहती हूं. मैं जानती हूं कि मैं पुरुष हूं, लेकिन मेरा पुरुषत्‍व अधूरा है. मैं किसी स्‍त्री को मां बनने का सुख नहीं दे सकता.



    मैं हमेशा इस डर में रहती हूं कि ये जो रिश्‍ता है, जिसमें इतना सुख, इतना प्रेम, इतनी खुशी है, वो एक दिन खत्‍म हो जाएगा. अंत में मेरा अकेले छूट जाना ही नियति है. मैं इस नियति को शायद कभी बदल न पाऊं. मैं अपनी स्‍त्री को संसार का सब सुख, प्रेम दे सकती हूं. देह के खेल में भी मेरे‍ लिए मेरी प्रेमिका का सुख ही केंद्र में है. पुरुष के लिए ऐसा कहां होता है? पुरुष तो स्‍वार्थी होता है, लिंग के साथ पैदा हुआ मर्द जब देह के खेल में भागीदार होता है तो केंद्र में वो खुद होता है और उसकी इच्‍छाएं. मुझमें सबकुछ मर्दों जैसा है, बस उनका कमीनापन छोड़कर. मेरे लिए मेरी स्‍त्री ही मेरा केंद्र है, उसका सुख सर्वोपरि है. मैं उसकी हर खुशी का ख्‍याल रखती हूं. अपने डैने फैलाकर धूप, गर्मी, बारिश से उसकी सुरक्षा करती हूं. उसे प्रेम का वादा करती हूं, अपना वादा निभाती हूं. मैं उसकी वो आश्‍वस्ति हूं, जो उसे भी पता है कि कभी नहीं छूटेगी. जीवन में चाहे जो भी छूट जाए, ये वादा नहीं छूट सकता.

    लेकिन इन सबके बावजूद एक दिन ये होगा कि कोई आएगा, जो मुझसे ज्‍यादा पुरुष होगा और फिर मेरी दुनिया उजड़ जाएगी.

    हम सब रोज टूटते हैं, रोज फिर से टुकड़ा-टुकड़ा खुद को जोड़कर फिर से खड़ा करते हैं.

    मैं भी टूटती हूं रोज. पहले टूटती थी क्‍योंकि दुनिया से डरती थी, समाज से डरती थी, अपनी पहचान को लेकर डरती थी. टूटती थी क्‍योंकि सच नहीं बोल पाती थी. खुद को रोज छिपाती, अपने आप से लड़ती. आखिरकार वो लड़ाई मैंने जीत ली.

    लेकिन प्रेम के दुख से पार न पा सकी. उस अकेलेपन से नहीं, उस छोड़ दिए जाने, बिसरा दिए जाने के दुख से नहीं.

    मुझे डर है कि एक दिन ये होगा और ये सिर्फ इसलिए होगा क्‍योंकि मैं संपूर्ण पुरुष नहीं.

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    Tags: Human story

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