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#HumanStory: दास्तां उस महिला दिहाड़ी मजदूर की, जो मशहूर चित्रकार बन गईं

जिस इमारत में ईंट-गारे उठाती, एक रोज वहां की दीवारें मेरी बनाई तस्वीरों से पट गईं.

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(बचपन निपट गरीबी में बीता. याद नहीं कि कभी सारे लोग भरपेट खाकर सोए हों. बड़ी बहन के साथ काम करने निकली तो लोग काम देने से मना करते. इतनी छोटी लड़की भला कैसे मजदूरी करेगी! जरूरत के हवाले पर काम मिलता लेकिन पैसे नहीं. शादी के बाद जिस इमारत में ईंट-गारे उठाती, एक रोज वहां की दीवारें मेरी बनाई तस्वीरों से पट गईं. ये जिंदगी है मध्यप्रदेश के झाबुआ के छोटे से गांव की भील महिला भूरी बाई की, जो मजदूरी करते-करते ख्यात चित्रकार बन गईं.)

सिर से पैर तक चांदी के दम-दम दमकते गहनों से सजी भूरी बाई की उजली मुस्कान के आगे गहने मुरझाए लगते हैं. कभी भीली तो कभी हिंदी में बोलती इस कलाकार की चमक और बढ़ जाती है जब वे रंगों की बात करती हैं. ठेठ गांव में हमारा बचपन बीता. परिवार में सदस्य खूब थे लेकिन गरीबी से ज्यादा नहीं. पिता के पास जमीन का छोटा टुकड़ा था. छोटे-बड़े सारे सदस्य मन लगाकर खेती करते लेकिन कभी पानी कम बरसता तो कभी इतना ज्यादा कि धान गल जाते.



10 साल की थी, जब कमाने के लिए गुजरात गई. बड़ी इमारत बन रही थी. छोटी सी दुबली-पतली लड़की को देखते ही ठेकेदार भड़क गया. ये इतनी छोटी बच्ची कैसे काम करेगी. चाचा और बड़ी बहन साथ थे. दोनों ने मेरी खूब सिफारिश की कि कद, वजन पर न जाएं, मैं बड़ों जैसा ही काम कर लेती हूं. आखिरकार मुझे काम मिल गया. इमारत का काम खत्म हुआ तो हम दोनों बहनें लकड़ी काटकर बेचने लगीं. झाबुआ से लकड़ी काटकर ट्रेन से गुजरात जाते. वहां कीमत ठीक मिल जाती थी. लौटते हुए कभी ट्रेन मिलती तो कभी कई-कई घंटे प्लेटफॉर्म पर काटते. आधी रात में लौटने के बाद भूखे सो जाते. बड़ी हो रही थी, तब अक्सर रातों में पानी पीकर पेट पर कपड़ा बांधकर सोया करती. खाना भले न मिले लेकिन नींद तो मिले.

पत्थर, मिट्टी-गारे में सने छुटपन की एक रंग-बिरंगी याद भी है. मुझे चित्र बनाने का शौक था. त्योहार-ब्याह आते तो मां से लेकर पास-पड़ोस की औरतें मुझे बुलातीं. भूरी, दीवारें सजा दे. भूरी, जमीन पर अल्पना उकेर दे. मैं तैयारियां शुरू कर देती. जिस घर में खाने को भात नहीं मिलती, वहां रंग और कैनवास कहां से आएंगे! मैं पत्तियों से हरा रंग बनाने लगी. कपास से सफेद. मिट्टी के तवे पर रोटी बना करती. तवा का किनारा खुरचकर काला रंग बनता. गेरू से लाल रंग. कपड़े की चिंदी से ब्रश बना लेती. फिर घंटों दीवारें रंगती. उसपर घोड़े, पंक्षियों, बचपन से लेकर सारी बातों को उकरेती. शादी वाला घर एकदम जगमगा जाता. ये हम भील लोगों की खास पिथोरा कला थी. ये 'खास' शब्द बाद में सीखा, तब तो एक गरीब लड़की बस शादी-त्योहार वाले घर का हिस्सा हुआ करती.



17 बरस की उम्र में ब्याहकर भोपाल आई. बड़ा शहर, बड़ी इमारतें, ढेर-ढेर गाड़ियां और हिंदी बोलते लोग! मैं एकदम चुप देखती रही. मुझे भीली बोली से अलग कुछ नहीं आता था. पैरों में चप्पल नहीं थी. शादी के तुरंत बाद की नवब्याहता वाली कोई बात भी नहीं थी. तब भारत भवन (भोपाल का कला केंद्र) बन रहा था. पति ने वहां मजदूरी के काम पर लगवा दिया, जिंदगी उसी ढर्रे पर चलने को तैयार थी.

एक दोपहर सारी मजदूरिनें डिब्बा खा रही थीं तभी ढीले-ढाले कुरते और दाढ़ी में एक आदमी आया. शक्ल से कलाकार था. बाद में जाना कि उसका नाम जगदीश स्वामीनाथन है और वो शक्ल से ही नहीं, असल में नामी कलाकार और कवि है. स्वामीनाथन जी ने हम औरतों से पूछा कि तुम्हारे यहां शादी-ब्याह कैसे होता है. कौन से त्योहार-बार मनाते हो. किस देवी-देवता को मानते हो. क्या ये सब चित्र में बनाकर दिखा सकते हो? औरतें खुसर-पुसर करने लगीं, फिर सबने मना कर दिया. हम सब दिहाड़ी मजदूर थे, कलाकार नहीं. मैंने भी कहा- स्वामी जी, हम चित्र बनाएंगे तो हमारी मजदूरी का क्या होगा! उन्होंने पूछा- कितनी दिहाड़ी पाती हो? मैंने बताया- एक रोज के 6 रुपए. मुझे 10 दिन के 15 सौ रुपए मिले.



पैसे लेकर घर लौटी तो पति भड़क गया. जेठ-जेठानी ने जाना तो मेरे चरित्र पर कहानी बन गई. सबके-सब गुस्साने लगे. ऐसा कौन सा काम कर दिया जो इतने पैसे मिले. पति ने काम के लिए बाहर जाने से मना कर दिया. अब मेरा मन अपनी कला को पहचानने लगा था. मजदूर औरत चुप रह जाती लेकिन कलाकार बोल उठती. हमारा खूब लड़ाई-झगड़ा होने लगा. एक दिन स्वामी जी ने मुझे और मेरे पति को पैगाम भिजवाया. पति से कहा कि तुम आओ और भारत भवन में ही चौकीदारी का काम करो. इमारत के साथ पत्नी की भी चौकीदारी कर लेना. देखना कि वो क्या काम करती है. पति साथ ही रहने लगा. उसके बाद उसने कभी शक नहीं किया. उसका नजरिया बदल गया था. अब घर पर भी मैं रंग लेकर बैठ जाती तो वो घर के काम संभाल लेता था.

भोपाल तक तो फिर भी ठीक था लेकिन मुझे अमेरिका बुलाया गया. अपनी कला के बारे में बात करने. पूरा घर, पास-पड़ोस भौंचक था. लोकल ट्रेन में लकड़ियों के गट्ठर लेकर आने-जाने वाली अनपढ़ औरत को हवाई जहाज में बैठना था. लोग-बाग खूब डराए. किस्मत वाले लोग होते हैं जो हवाई जहाज में बैठने के बाद वापस लौटते हैं. जहाज गिर जाता है. आग लग जाती है. लोग मर जाते हैं. दिल्ली तक ट्रेन से गई. जहाज में बैठने का समय आया तो रोने लगी. बच्चों से कहा, अब तुम लोग घर देखो. जा तो रही हूं लेकिन लौटने का अब कोई ठिकाना नहीं. वे भी रो पड़े.



जहाज नहीं पलटा, न आग लगी. अमेरिका पहुंची तो अलग खटराग शुरू हो गया. सरकार की तरफ से दो दुभाषिए मेरे साथ थे जो भील से हिंदी और अंग्रेजी करते. मैं तब भी भकुआयी रही. कौन क्या बोल रहा है, किसे क्या जवाब दूं- कुछ समझ नहीं आता था. डरती थी. कहीं बोलती थी, कहीं रुक जाती थी. लोग मेरा मुंह जोह रहे थे और मैं उनका. धीरे-धीरे लगा कि ये अपनी ही तो कला है. बचपन में लकड़ी काटती, ईंटें उठाती छोटी बच्ची थक जाती तो यही काम उसे बचाता था. तब बोलना शुरू किया. अब अपनी उम्र से ज्यादा बार हवाई जहाज में बैठ चुकी हूं. मंच पर जाती हूं तो मैं भले हकला जाऊं लेकिन मेरी चित्रकारी बोल पड़ती है.

बाहर निकली थी तो नंगे पांव थी. हिंदी न बोलती थी, न समझती. मजदूरी करने निकली थी. पहली बार बने-बनाए रंग और बाजार का ब्रश मिला तो हाथ और दिल दोनों कांप रहे थे. अब कैनवास के नाम जानती हूं. रंगों और ब्रश से घर का एक कमरा अटा पड़ा है. साथ की कांच की अलमारी में अवार्ड्स रखें हैं जिनपर अंग्रेजी में मेरा नाम लिखा है.

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human story पर क्लिक करें.)

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