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#HumanStory: पुलवामा हमले की बरसी पर बोली शहीद की बेटी...फोन का ही सहारा था, आतंकियों ने वो भी छीन लिया

पुलवामा में शहीद हुए हेमराज मीणा की बेटी रीना मीणा

पुलवामा में शहीद हुए हेमराज मीणा की बेटी रीना मीणा

सालभर पहले पापा को बस स्टॉप छोड़ने गई थी. वर्दी में सजा उनका चेहरा उदास था, लेकिन रुआब वैसा ही था. बस चली तो देर तक खिड़की से हाथ लहराता रहा. मैं लौट आई. 14 को उनका फोन आया. और फिर ये खबर. बड़ी बेटी होने के कारण अफसरों ने मुझे ही बताया. बड़ा होना बड़ी हिम्मत मांगता है.

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    कश्मीर के पुलवामा (Pulwama in Kashmir) में सालभर पहले आज ही दिन CRPF के काफिले पर आतंकी हमला (terrorist attack on CRPF) हुआ था. हमले में 40 जवान शहीद (martyr) हुए. इन्हीं शहीदों में से एक हेमराज मीणा (Hemraj Meena) की बेटी रीना से बातचीत...

    कोटा का सांगोद शहर! लगभग 20 हजार की आबादी वाले इस शहर को जादूओं का शहर माना जाता है. कहते है कि आज से 300 बरस पहले यहां एक से बढ़कर एक जादूगर रहते थे. उनकी जादूगरी के किस्से सुन-सुनकर उकताई बंगाल की एक जादूगरनी भानुमति यहां आ पहुंची. लाल पाड़ की सफेद साड़ी पहने जादूगरनी के आसपास जादुई दुनिया चलती. जिंदा इंसान को मोम की मक्खी बना देने वाली भानुमति यहां आई तो जादूगरों को हराने थी, लेकिन हारकर खुद यहीं बस गई.

    सैकड़ों सालों बाद वो जादू हिम्मत में बदल गया. इसी हिम्मत की झलक शहीद हेमराज की बेटी में मिलती है, जब वे कहती हैं- याद तो आती है लेकिन रोना नहीं आता. लगता है जैसे पापा ने जाते हुए भी हमें कोई तोहफा दे दिया हो. जहां भी हम जाते हैं, लोग शहीद के बच्चे पुकारते हैं.

    20 साल की रीना फोन पर 'पापा की बात' करते हुए एकदम सहज हैं. पहली बरसी पर भी आवाज में कोई थरथराहट नहीं.

    पुलवामा में शहीद हुए हेमराज मीणा कुछ ही महीनों में रिटायर होने वाले थे


    वे खुद ही वजह बताती हैं- हमेशा से ही पापा को पोस्टिंग पर सुना. मां ने सब देखा-भाला. घर-बाहर के काम संभाले. पापा छुट्टियों में घर आते थे. वे दिन मिलने-मिलाने में बीत जाते. पापा से फोन पर ही जान-पहचान हुई और फिर दोस्ती. फोन पर उनसे बात ही एक सहारा थी. अब उनसे तो बात हो नहीं सकती, इसलिए उनकी बात करते हैं.

    महज 20 साल की रीना उन सारे फोन कॉल्स का जवाब देती हैं, जो हेमराज से जुड़े हों. चाहे वो किसी दोस्त का हो, या फिर किसी अफसर का. ये आसान नहीं.

    वे याद करती हैं- 14 फरवरी को 3 बजे कॉल आया. पापा पढ़ाई-लिखाई की पूछते रहे. अपना हालचाल बताया और फटाक से फोन रख दिया. शायद वे जल्दी में थे. थोड़ी देर बाद अजमेर से उनके एक दोस्त का फोन आया. वे मुझसे बहुत संभल-संभलकर पूछ रहे थे कि पापा कब निकले, फोन पर आखिरी बार कब बात हुई... मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन खुटका-सा हुआ. मैंने किसी से कुछ कहे बिना पापा को कॉल लगाया. फोन बंद बता रहा था. इसके बाद कंट्रोल रूम से मेरे नंबर पर फोन आया. वे पापा की खबर दे रहे थे!

    शुरुआती दिनों में घर में जमावड़ा रहा. नातेदार-पड़ोसियों से लेकर नेता-अफसर सब आए. सबने तसल्ली दी. कंधे थामकर कहा, पुचकारकर कहा, गले लगाते हुए कहा. खूब वादे किए.

    14 फरवरी 2019 को पुलवामा में CRPF पर आतंकी हमला हुआ था, हमले के बाद की तस्वीर


    वे जितनी ही बातें कहते, मन उतना ही खाली होता जाता. फौजियों के बच्चों की जिंदगी अलग होती है. पिता साल- छह मासे आते हैं. उन्हें ये पता नहीं होता कि उनके बच्चे किस क्लास में हैं. किस बच्चे को क्या पसंद है. किस बच्चे को बार-बार सर्दी होती है. या फिर कौन सा बच्चा फुटबॉल प्लेयर बनना चाहता है. वे घर लौटने का इंतजार करते हैं ताकि परिवार के बारे में सबकुछ जान सकें. जानकर लौटते भी हैं लेकिन सालभर बाद दोबारा लौटते हैं तो पसंद-नापसंद बदल चुकी होती है.

    पापा अलग थे. वे रोज हमारी पढ़ाई की अपडेट लेते. आते तो कोचिंग सेंटर तक जाते. आखिरी बार फोन पर बात हुई तब भी वे पढ़ाई की पूछ रहे थे.

    घर आते तो एकाध दिन थकान उतारने में लग जाते. फिर हमारी जानने में. कभी-कभार वे वहां के हालात भी बताया करते कि श्रीनगर में फौजियों को किस निगाह से देखा जाता है. एक बार उन्होंने बताया था कि वहां पोस्टेड फौजियों में से शायद ही कोई छूटा हो, जिसने पत्थरबाजी न झेली हो. तब बहुत डर लगता था. एक दिन भी फोन न आए तो मन बैठ जाता. हम बारी-बारी से उनके सारे दोस्तों को फोन लगाते. बस, एक बार पापा से बात हो जाए और वो इतना कह दें कि मैं ठीक हूं.

    भगवान के आले की तरह इस्तेमाल में आता शहीद हेमराज का ट्रंक


    खुशआवाज रीना की बातों में पहली बार उदासी झलक रही थी. छोटा-सा पॉज जैसे वे कुछ याद कर रही हों. फिर कहती हैं- बस, फोन का ही सहारा था. 14 फरवरी ने वो भी छीन लिया.

    61वीं बटालियन से जुड़े हेमराज लगभग डेढ़ साल बाद रिटायर होने वाले थे. CRPF को लगभग 18 साल दे चुके हेमराज की शहादत ने उनके बच्चों को कमउम्र में ही पक्का कर दिया. रीना याद करती हैं- पापा के जाने के बाद की बात है. एक बार छोटे भाई की अपने दोस्तों से बात हो गई. बच्चे चिढ़ाने लगे कि तेरे पापा तो मर गए हैं. सुनकर 5 साल का मेरा भाई रो नहीं पड़ा, बल्कि तुरंत बोला- 'पापा मरे नहीं, शहीद हुए हैं. हर कोई ये नहीं कर सकता.' बच्चों को समझ आया या नहीं, पता नहीं लेकिन उस दिन के बाद से उसे किसी ने नहीं चिढ़ाया.

    एक साल बीते. अब भी कहीं जाओ तो लोग शहीद की बेटी बुलाते हैं. अलग ही अहसास है. पापा जब भी छुट्टी पर आते, ट्रंक में सबकी पसंद की चीजें लाते. बीते साल जाते हुए भी वे हमें तोहफा देकर गए- शहीद के परिवार का.

    शहीद हेमराज का वो फौजी ट्रंक अब घर में पूजा के आले की तरह रखा हुआ है, जिसपर सारे देवी-देवताओं के साथ-साथ हेमराज की भी तस्वीर रखी है.

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