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#HumanStory: चीन से आंखों-देखी... 'कोरोना वायरस के खौफ ने शंघाई शहर को भुतहा बना दिया'

News18Hindi
Updated: February 6, 2020, 10:50 AM IST
#HumanStory: चीन से आंखों-देखी... 'कोरोना वायरस के खौफ ने शंघाई शहर को भुतहा बना दिया'
शंघाई में रहने वाले भारतीय व्यापारी नवीन विलियम्स के जरिए जानें चीन की दुनिया

दूध-ब्रेड, अंडे-तरकारी लेने जाता हूं तो सड़क पर इक्का-दुक्का चेहरे होते हैं. वो भी मास्क (mask) के पीछे. मैं खुद मास्क में होता हूं. घर से निकलते हुए चप्पलें पहनना भले याद न रहे लेकिन मास्क के बगैर कोई बाहर नहीं निकलता. कुछ रोज पहले शंघाई की सड़कों पर गाड़ियां नहीं समाती थीं, अब वही सड़कें खाली हैं. कोरोना वायरस (Corona virus) के खौफ ने चीन (China) के सबसे बड़े शहर को भुतहा (ghost town) बना दिया.

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  • Last Updated: February 6, 2020, 10:50 AM IST
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चीन के शंघाई (Shanghai in China ) में रहने वाले भारतीय नवीन विलियम्स (Navin Williams) के जरिए वहां का सीधा हाल...

12 साल पहले काम के सिलसिले में चीन आया. साल 2008 की गर्मियां. जगह-जगह छोटी-छोटी झीलें. सूरज जैसे-जैसे ऊपर चढ़ता, फूल पूरे खिल जाते. लाल गुड़हल, बैंगनी चाइना एस्टर और भी किस्म-किस्म के फूल. झील की झिलमिल में सैर करते लोगों की हंसी तैरती. नए देश में जल्द ही मन रमने लगा.

साफ-सुथरी सड़कें. कांच-सी पारदर्शी इमारतें. सुबह दफ्तर की भागमभाग में भी तरतीब थी. भीड़ भी ऐसे चलती मानो कदमताल कर रही हो. काम के बाद शाम की रौनकें. रंग. खुश्बुएं.



गृहस्थी की आम खरीद-फरोख्त भी यहां पिकनिक जैसी लगती. Wet market (जहां सब्जियां, फल, मीट, सी-फूड मिलते हैं) जाओ तो गाजर-मूलियां भी ऐसे सजी होतीं कि आंखों को आराम मिल जाए. यहां कोई पालक ले लो... टमाटर सबसे सस्ते... की टेर नहीं लगाता. सजी हुई सब्जियों के ढेर पर ढेर होते हैं और हर सब्जी के आगे दाम की तख्ती लगी होती है.



चीन के एक वेट मार्केट का दृश्य जहां फल-सब्जी और मांस साथ में मिलते हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


सब्जियों के साथ ही मांस की भी एक कतार होती. तमाम तरह की मछलियां, सी-फूड, चिकन और लाल मांस की किस्में. पहले से कटे मांस से परहेज हो तो ताजा गोश्त खरीदने के भी विकल्प.

सब्जी और मांस का साथ-साथ रखा जाना शाकाहारियों को सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन यहां सफाई का खासा खयाल रखा जाता. जैसे बांग्लादेशियों में रात नींद कैसी आई, या ब्रिटेन में मौसम पर चर्चा आम है, वैसे ही चीन में गृहस्थनें आपस में ये पूछती हैं कि आज वेट मार्केट से क्या खरीदा.

शुरू में फल-सब्जियां लेने के लिए सुपरमार्केट जाया करता, फिर जल्द ही वेट मार्केट की आदत डल गई. यहां बड़े ही ट्रेडिशनल अंदाज में लोग सब्जी और मांस की रेसिपी पर बात करते भी दिख जाएंगे. सब्जीवाला भी आपको फलां सब्जी की ठेठ चाइनीज रेसिपी बता सकता है.

एक तरफ नवीन वेट मार्केट के घरेलू माहौल को बता रहे थे, दूसरी ओर मेरे दिमाग में चीन की मांस मंडियों की वो तस्वीरें घूम रही थीं जो सुर्खियों में हैं. चारों ओर जानवरों के गोश्त का अजायबघर...

सिर पर ट्रॉफी की तरह झूलते मांस के टुकड़े... मछलियों से लेकर कांच के मर्तबान में जिंदा सांप तक... डिमांड आते ही कसाईनुमा दुकानदार केक की तरह उनके टुकड़े कर दे!

शंघाई शहर भी कोरोना की तकलीफ से बचा हुआ नहीं है (प्रतीकात्मक फोटो)


इस जिक्र पर नवीन तुरंत कहते हैं- ऐसा है क्या! पिछले 12 सालों में मैंने तो ऐसा कभी नहीं देखा. हर हफ्ते सब्जियां और मांस लेता हूं लेकिन जिंदा सांप या चूहे-चमगादड़ जैसी चीजें नहीं दिखीं. आम लोग सांप- चमगादड़ नहीं खाते. ये एग्जॉटिक (खास) चीजें हैं. बहुत महंगी होती हैं. और सबको पसंद भी नहीं आतीं. सब्जी-मांस की मंडी में ये चीजें नहीं मिलतीं.

कई बार किसी रेस्त्रां में जरूर मैंने कुछ लोगों को ये ऑर्डर करते देखा है. बड़ी महंगी डिश. नवीन कुछ याद करते हुए बताते हैं.

सवाल-दर-सवाल नवीन बड़ी ही तसल्ली से जवाब देते हैं. बगैर किसी अफरातफरी. बिना किसी झुंझलाहट के. वे बताते हैं- ये चाइनीज न्यू ईयर का मौसम है. ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसा हमारे लिए दिवाली का वक्त. चीनी लोग अपने परिवार के साथ वक्त बिताते हैं. ज्यादातर लोग दूसरे शहरों या देश चले जाते हैं.

पूरे शहर में जैसे कर्फ्यू लग जाता है. दुकानें बंद, खाने के ठिये बंद, गाड़ियां नहीं के बराबर. इस कुछ रोज के बाद चीन फिर दौड़ने-भागने लगता है.

शंघाई शहर में खाली मेट्रो भी टाइम-टेबल के अनुसार चल रही है (Photo- Navin Williams)


ये नया साल अलग है. कोरोना के खौफ से लोग जहां हैं, वहीं ठहरे हुए हैं. सरकार ने 10 तारीख तक की छुट्टी घोषित कर दी है. कुछ बहुत जरूरी सरकारी दफ्तरों को छोड़ सब बंद है. गाड़ियां बंद. रेल बंद. हवाई यात्रा बंद. बाहर निकलो तो सड़कें भांय-भांय करती हैं. जैसे पूरा शहर रातोंरात कहीं गायब हो गया हो और कुछेक लोग ही बाकी हों.

हम लोग जैसे किसी साइंस फिक्शन का हिस्सा बन चुके हैं. मुट्ठीभर लोग बाकी हैं और जिंदा रहने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

शंघाई के इस बाशिंदे का डर, जिंदा डर है. हालात इतने खराब हैं कि यहां कई शहर नजरबंदी में जी रहे हैं. न कोई आ सकता है, न जा सकता है. अस्पताल भरे हुए. सड़कें खाली. एकाध चेहरा दिख भी जाए तो नकाब में ढंका दिखता है. कोई दुआ-सलाम नहीं. कोई मुस्कान नहीं. जल्दी से जल्दी घर में बंद हो जाने की हड़बड़ी.

हरी घास, गीली मिट्टी या खुला आसमान मानो कोरोना का कहर बरसा रहे हों. नवीन कहते हैं- शहर भुतहा शहर हो चुका है. छींक भी आए तो जान जाने का डर लगता है.

शंघाई की सड़कें खाली पड़ी हुई हैं और दुकानें बंद (Photo- Navin Williams)


नवीन का इससे भी इनकार नहीं कि बीमारी का पता चलते ही चीनी सरकार ने काफी काम किया. वे बताते हैं- आनन-फानन सब बंद करने का एलान हुआ. सरकारी दफ्तरों से लेकर हर इमारत में भरपूर मास्क बांटे गए. सारी एहतियात बरती जा रही है लेकिन तब भी रोज नए मरीज आ रहे हैं. ऐसे में डर तो लगता है.

दूध-ब्रेड लेने नीचे उतरता हूं तो मास्क में कैद रहता हूं. कुछ मिनट भी जानलेवा हो सकते हैं!

आज किसी काम से बाहर निकला. मेट्रो स्टेशन पहुंचा तो पूरी गाड़ी खाली थी. जैसे पूरी मेट्रो सिर्फ मेरे लिए चल रही हो. मेट्रो से लेकर दूसरी पब्लिक गाड़ियां बगैर सवारी भी चल रही हैं. सारे डर के बावजूद चलते रहना इस मुल्क की खासियत है.

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First published: February 6, 2020, 10:44 AM IST
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