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#HumanStory: जोकर की कहानी- 'रंग लगाते-लगाते नाक और गालों पर काले धब्बे हो गए हैं'

News18Hindi
Updated: December 4, 2019, 2:52 PM IST
#HumanStory: जोकर की कहानी- 'रंग लगाते-लगाते नाक और गालों पर काले धब्बे हो गए हैं'
दुकानों के आगे खड़े होकर आवाज देने वाले जोकर की कहानी (प्रतीकात्मक फोटो)

रोज 8 घंटे सड़कों पर बीतते हैं. लोगों को बुलाना होता है. हमारी आवाज में कोई खासियत नहीं, लेकिन चेहरे पर लगी नाक और बालों का रंगीला विग हमें अलग बनाता है. पढ़ें, दुकानों के आगे खड़े होकर 'भावी ग्राहकों' को बुलाने वाले जोकर (joker) की कहानी (story).

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  • Last Updated: December 4, 2019, 2:52 PM IST
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दक्षिणी दिल्ली का लाजपत नगर बाजार. देश की राजधानी की तमाम रंगीनियत जमीन के इस रक्बे पर दिख जाएगी- मौसमों के साथ बदलते कपड़े, फहराते स्कार्फ से नौलखा हार, किरमिची जूतों से लेकर विदेशी ब्रांड. छोले-कुलचों से लेकर पिज्जा-पास्ता की महक. और ठेठ देसी के साथ फिरंगी कदमताल. मौसम के बदलते मिजाज और आती-लौटती भीड़ के बीच एक चेहरा रोज होता है. बड़े-से शोरूम के आगे ठहरा ये चेहरा गुजरती भीड़ को 'अपने यहां' बुलाता है. जोकर की धज वाले इस चेहरे का नाम है- सनी.

नाम पूछने पर सनी ठिठक जाते हैं, फिर बताते हैं- आज तक किसी ने नहीं पूछा.

सालों से जोकर का काम कर रहे सनी की नाक गुलाबी है, भौंहों पर नीला रंग है. रंग-बिरंगी घुंघराली विग और झालरनुमा कपड़ों में सनी या तो जोर-जोर से आवाज दे रहे होते हैं या किसी बच्चे के साथ फोटो खिंचवा रहे होते हैं. वे याद करते हैं- साढ़े 4 हुए इस पेशे में. देखने में मजेदार लगने वाला ये काम बड़ी मेहनत मांगता है. हम सुबह उठते ही जींस-शर्ट पहनकर और टिफिन लेकर दौड़ नहीं सकते. काम पर पहुंचने से पहले काम की पूरी तैयारी होती है. चेहरा अच्छी तरह साफ करने से लेकर उसपर अलग-अलग रंग लगाना.

हमारी नाक रोज लाल नहीं होती- ये रंग बदलती है. पूरे चेहरे के लिए रोज अलग-अलग तरीके का मेकअप सोचना होता है. जितना अलग लगेंगे, लोग हमारी आवाज पर उतना ही ठहरेंगे.

वैसे तो सनी से जोकर बनने का काम दो से तीन घंटे ले लेता है लेकिन अब हाथ और दिमाग इतने फुर्तीले हो गए हैं कि मुझे घंटाभर ही लगता है.

सालों से जोकर का काम कर रहे सनी का पूरा परिवार यही काम करता है (फोटो क्रेडिट- मृदुलिका)


मेट्रो में इंसानों और सामानों का आना-जाना तो ठीक है लेकिन जोकर का थोड़ा मुश्किल है. लोग शक की नजरों से देखते हैं. पहले कई बार मेट्रो स्टेशन में पूरी तलाशी हुई. किए-कराए मेकअप को उतारना पड़ा. इसके बाद से जोकर बनकर आना-जाना छोड़ दिया. अब घर से थैले में मेकअप लेकर निकलता हूं. लाजपत नगर पहुंचकर सुलभ शौचालय जाकर तैयार होता हूं और फिर काम की जगह खड़ा हो जाता है. हमारा काम 8 घंटे का है लेकिन मेकअप करने और मेकअप उतारकर घर लौटने की कवायद में तीनेक घंटे ज्यादा लग जाते हैं.
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दिन के 14 घंटे मैं जोकर रहता हूं और 10 घंटे सनी. सनी सोता है, जोकर जागता है, लोगों से मिलता है.

दिनभर के काम के बाद सनी थके हुए हैं लेकिन पहली बार अपना नाम पूछे जाने पर बच्चों-सी ललक से भरे हुए भी. वे याद करते हैं- मां-बाप राजस्थान से हैं लेकिन मेरी पैदाइश और परवरिश यहीं की है. दिल्ली ही मेरा गांव और शहर दोनों है. बच्चा था तो स्कूल जाता. पढ़ाई-लिखाई कम करता, दोस्तों के साथ घुमक्कड़ी ज्यादा होती. 12 साल की उम्र में जवान हो गया. पापा दिहाड़ी मजदूर थे. उन्हीं के साथ छोटे-छोटे काम करता. एक रोज पापा घर लौटे तो उनके हाथ में एक जोड़ एक्सट्रा कपड़ा था. चटख रंग का वो पकड़ा फिर पापा का रोज का कपड़ा बन गया. बात आज से दसेक साल पहले की है. तब मेकअप का सामान अलग से नहीं मिलता था. सारे जोकर एक जगह इकट्ठे होते, तब मेकअप लगता.

पापा का जोकरपन मुझसे भी आ गया और मेरे भाइयों में भी. अब हम सारे लोग यही कर रहे हैं.

देश की राजधानी की तमाम रंगीनियत जमीन के इस रक्बे पर दिख जाएगी (प्रतीकात्मक फोटो)


चेहरे पर गलती से कुछ लगा रह जाए तो लोग अकबका जाते हैं. साफ करने के लिए आईना खोजते हैं. दूसरों से पूछकर तसल्ली करते हैं कि चेहरा एकदम साफ-सुथरा है. जोकर के साथ उलट है. हमारे चेहरे पर जितने रंग हों, जितने अजीबोगरीब कपड़े हों, हम उतने जोकर लगते हैं. पहली बार जोकर के कपड़े पहने तो सड़क पर खड़ा होने में मशक्कत लगी. शर्म आ रही थी. जैसे-तैसे खड़ा हुआ तो आवाज 'मारने' की हिम्मत नहीं हुई. लग रहा था कि कोई देख लेगा, पहचान लेगा तो कितना मजाक बनेगा.

पापा ने ही समझाया- जोकर के कपड़े और रंग उतारकर खड़े हो जाओगे तो इसी भीड़ का चेहरा लगोगे. कोई तुम्हें पहचान नहीं सकता. तब हिम्मत आई.

23 साल के सनी जोकर की पोशाक में 15-16 साल के बच्चे लगते हैं. जोकरपन शायद उम्र थाम लेता है. सनी खुद ही इस बात को पुख्ता कर देते है. वे कहते हैं- जब कोई मेकअप लगाता है तो वो आजाद हो जाता है. कुछ भी करने के लिए. बिना मेकअप के मैं बाराती नाच भी नहीं कर सकता लेकिन जोकर बनता हूं तो हिंदी-अंग्रेजी-पंजाबी हर गाने पर खूब नाच लेता हूं. गला फाड़कर गा भी लेता हूं और मौज में आता हूं तो रो भी देता हूं. जोकर बनकर आप बेवकूफी के लिए भी आजाद हो जाते हैं.

जिस उम्र में दिल्ली के ज्यादातर लड़कों के पास नए फैशन के तमाम कपड़े मिलते हैं, उस उम्र में सनी के पास कपड़ों की ख्वाहिश ही है.

सनी के पास जोकर के कपड़ों की भरमार है (प्रतीकात्मक फोटो)


मेरे पास जोकर के कपड़े हैं. चार रंग के. चार डिजाइन वाले. कई रंगीन जूते हैं. चेहरे पर लगाने वाला पेंट है. तीन विग हैं. जींस- टीशर्ट का शौक है लेकिन पहनने का न तो मौका है और न खरीदने की कूवत. पैसे जोड़ रहा हूं. शादी करूंगा और घर बसाऊंगा.

फिर तो पत्नी भी आपके साथ जोकर बनकर खड़ी होंगी!

नहीं. बिल्कुल नहीं. सनी की जोरदार न आती है. अपनी बीवी को इस काम में कतई ना लाऊंगा. इस काम में बड़ी तकलीफ है.

कैसी तकलीफ!

सर्दियों में रजाई-कंबल ओढ़ने का मन करता है तो सड़क पर रहते हैं. गर्मियों में हवा से थपेड़ों से गाल जलने लगते हैं तो भी सड़क पर रहते हैं. रोज 8 घंटे गला फाड़ते हैं. हर कोई देखता है लेकिन सुनता कोई नहीं. कोई अपने बच्चे के साथ फोटो उतारने बोलता है तो ऐसे बोलता है जैसे धौंस जमा रहा हो. मेकअप लगाते-लगाते चेहरा पपड़ा गया है. मेकअप उतारते हैं तो स्किन जलती है. नाक पर रंग की जगह काला धब्बा बनने लगा है.

जब जोकर नहीं रहूंगा तब भी जोकर ही रहूंगा.

बात करते हुए लगता है कि सनी के गदबदे चेहरे और फंसी हुई आवाज के साथ शायद रूह भी जोकर की हो गई है.

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First published: December 4, 2019, 2:52 PM IST
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