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#HumanStory: 'मां के घर जाते हुए गाढ़ा मेकअप धोया और ब्याहता की तरह सजी'- कहानी सेक्स वर्कर की

News18Hindi
Updated: November 28, 2019, 11:40 AM IST
#HumanStory: 'मां के घर जाते हुए गाढ़ा मेकअप धोया और ब्याहता की तरह सजी'- कहानी सेक्स वर्कर की
उस लड़की की कहानी जिसे गरीबी और बदकिस्मती ने सेक्स-वर्क में धकेल दिया (प्रतीकात्मक तस्वीर)

पिछले हफ्ते की बात है. मैं मां से मिलने पहुंची. शादी के बाद पहली बार. मिलते ही वो हिलककर रो पड़ी. संभली तो टक लगाकर देखती रही, फिर कहा- अच्छी लग रही है. लगता है, दामाद खूब ख्याल रख रहे हैं! मैं नहीं बता सकी कि उसने मुझे शादी की अगली सुबह ही बेच दिया. अब एक नहीं, कई दामाद उसकी बेटी का ख्याल रख रहे हैं.

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  • Last Updated: November 28, 2019, 11:40 AM IST
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विरासत में अमीरी या कर्ज मिलता है. मुझे अपनी मां से विरासत में 'छोड़ा जाना' मिला. मां ने कभी कहा नहीं लेकिन गांव की औरतें खुसुर-पुसुर करतीं. उसी से अंदाजा मिला कि शादी के एकाध साल बाद बाबा घर से गए तो लौटे नहीं. न कभी उनकी कोई खबर लौटी. अक्सर असीसते (दुआ देना) हुए मां कहा करती- तुझे जहान की खुशियां मिलें, बस मेरा नसीब न मिले.

शायद ऊपरवाले ने मां की बात आधी-अधूरी सुन ली. पढ़ें, उस लड़की को, गरीबी और बदकिस्मती ने जिसे सेक्स-वर्क में धकेल दिया...

छोटी थी तो जन्नतों में रहा करती. चारों ओर ढेर-सी हरियाली और खूब प्यार करने वाली मां. हम गरीब थे लेकिन गांवों की गरीबी कुछ कम शहरी होती है. गांव के गरीब सीवन लगे कपड़े भले पहन लें लेकिन खाली पेट नहीं सोते. मां दिहाड़ी के काम के लिए दिन में ही निकल जाती. मैं अड़ोस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेलती, उन्हीं के घर खाना खाती और इंतजार करती. दिन में खाली हाथ गई मां, शाम गए लौटती तो हाथ कभी खाली नहीं होते थे. एक हाथ में सब्जी-तरकारी तो दूसरे हाथ में टॉफी-बिस्कुट. मां खाना पकाती तो मैं उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाती रहती. मिलकर खाते और साथ सोते. वो मुझसे दिनभर का हिसाब लिया करती, सिर्फ अपने बारे में कुछ नहीं कहती थी.

मुझे मां की बड़ी-बड़ी आंखें, मां-सी ऊंची नाक मिली है. और मां की ही न बताने वाली आदत भी. उसने अपना दर्द कभी नहीं उधेड़ा, उनकी बेटी भी नहीं बता सकी कि शादी के चंद महीनों में उसके साथ क्या बीती.

शक्लोसूरत के साथ मुझे मां की आदतें भी विरासत में मिलीं (प्रतीकात्मक तस्वीर)


वो परचून की दुकान में आया करता था. दुबला-पतला. दांतों के बीच चौबीसों घंटे खैनी दबी रहती. बोलता तो फटी-सी आवाज आती. वो हरदम देखा करता था. साथिन लड़कियां मुझे टहोके मारने लगी. हंसी-ठिठोली होने लगी. मैं दिल में रो-रो पड़ती. 'बे-बाप' सही, लेकिन क्या यही आदमी मेरी किस्मत है! ऊपर-ऊपर से लड़कियों के साथ मैं भी हंसती.

एक शाम वो घर आया. हाथ में मिठाई का डिब्बा. झक गुलाबी शर्ट और पैरों पर चुस्त पैंट के साथ किरमिच के जूते. हंसते हुए मुंह से खैनी और बासी शराब का भभका आ रहा था. उबकाई रोकते हुए मैंने अंदर आने को रास्ता दिया. वो बगैर दुआ-सलाम पलंग पर बैठ गया. मां किनारे पड़े प्लास्टिक के पटरे पर बैठी और मैं चूल्हे की तरफ मुंह किए बैठी रही. उसकी आंखें मेरी पीठ पर चुभ रही थीं. बात निकली. वो मुझसे शादी करना चहाता था. बहुत सारे सवालों-वादों के बीच मां ने उसपर यकीन कर लिया. ये पहली दफे था कि मुझसे बिना पूछे मां फैसला ले रही थी. वो भी मेरे लिए.

रात मां ने कहा- मुझसे तो हुआ, अब शायद इसका नसीब ही तेरा नसीब खोल दे! मां पहली बार मेरे सामने रो रही थी. उसका चेहरा हर बीती तकलीफ का नक्शा हो रहा था. मैंने हां कर दी.

सादे से समारोह के बाद विदा होकर उसके घर पहुंची. सांवली-संकरी गलियों में माचिस रखकर बने घर. बारिश हो तो छत की टकर-टकर रात जगाए. गर्मियों में मानो सूरज घर में ही उतर आया हो. मैं चुपचाप कोने में खड़ी थी. उसने फटी हुई आवाज में पूछा- कोई राजरानी हो क्या! ये इशारा था मुझे औकात याद दिलाने का. शक्ल-सूरत या घर-बार, कुछ भी तो ऐसा नहीं कि कोई भला लड़का लपककर मुझे पसंद कर लेता.

अगली सुबह मैं बेची जा चुकी थी. फटी हुई आवाज में पति उर्फ दलाल ने कहा- नथ उतराई तो कल रात हो चुकी. अब कीमत भी ज्यादा नहीं मिलेगी.

दो-चार रोज की मार-पीट और कुलबुलाते पेट ने झट से हां कहलवा दी (प्रतीकात्मक तस्वीर)


नए काम के लिए राजी होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. दो-चार रोज की मार-पीट और कुलबुलाते पेट ने झट से हां कहलवा दी. बांस की टट्टी से बने घर में छोटे-छोटे कई कमरे हैं. हर कमरे में दरवाजे की जगह फटी-पुरानी चादरें या साड़ी झूलती होती है. भीतर जाएं तो चीकट बिस्तर की बदबू बांहें पसारे मिलती है. वो नरक, जहां मिनटभर सांस न आए, वहां एक सीला हुआ कमरा मेरा घर है.

मैं हर बात पर हां कहती हूं. जब थकी हुई लड़कियां नींद से कुनमुनाती हैं, तब भी राजी रहती हूं. शराब की भभकियां मारता क्लाइंट उल्टी कर देता है तो भी मेरा चेहरा सपाट रहता है.

मैडम मुझपर खास खुश रहती हैं. नई लड़कियों को मेरे हवाले से कहती हैं- इससे सीखो, इसका कोई नखरा नहीं है. मैं बुत बनी सुनती हूं. किसी बहाने भी सही, वो खुश रहें तो जिंदगी आसान रहेगी. बुढ़ा चुकी कुछ लड़कियों ने आते ही मुझे ये गुर सिखा दिया.

हाल में मैंने मां के घर जाने को छुट्टी मांगी. हर बात पर बकझक करने वाली मैडम ने झट से हां कर दी. जानती है कि ये नरक भोग चुकी लड़की और कहीं नहीं जाएगी. जाते-जाते कुछ पैसे भी मेरे हाथ में रख दिए. निकलने से पहले मैंने गाढ़े मेकअप से पुता चेहरा धोया और खूब जतन से ब्याहता जैसा सिंगार किया.

दो दिन मां के पास रही. कुछ किलोमीटरों पर बसी जिंदगी के बारे ऐसे भूलकर, जैसे जिंदा लोग मौत को भूले रहते हैं.

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First published: November 28, 2019, 11:40 AM IST
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