#HumanStory: वो एवरेस्ट जीतने वाली लड़की: -40 डिग्री तापमान था, तभी ऑक्सीजन सिलेंडर लीक होने लगा

जमा देने वाला तापमान. आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर चढ़ रही थी, तभी रस्सी पर कुछ लटका दिखा. वो एक लाश थी. अब अगर मैं ऊपर जा सकती थी तो मुझे उसे छूते हुए गुजरना था. एवरेस्ट पर लाशों के सैकड़ों किस्से सुने थे लेकिन सोचा नहीं था कि मेरा भी इससे सामना हो सकता है. एक तरफ एवरेस्ट था तो दूसरी तरफ मेरा डर.

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बर्फीली आंधी जो अपने साथ सबकुछ उड़ा ले. ठंड इतनी कि ऊंगलियां बाहर निकलें तो बर्फ की तरह गल जाएं. सफेद चादर में जहां-तहां दबे मुर्दा शरीर. ये वे शरीर हैं जो कभी एवरेस्ट जीतने का ख्वाब लेकर चले थे. इन्हीं के मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा की लड़की भावना डहरिया आगे बढ़ती जाती है. ये कहानी है दुनिया के सबसे खतरनाक लेकिन सबसे खूबसूरत पहाड़ की. ये कहानी है उन पहाड़ों से एक लड़की के प्यार की. पढ़ें, भावना को.

एवरेस्ट से महज कुछ सौ मीटर बाकी थे. तभी मेरा ऑक्सीजन खत्म हो गया. शेरपा ने सिलेंडर बदलने के लिए जैसे ही रेगुलेटर खोला, वो अटक गया. ऑक्सीजन तेजी से लीक हो रही थी. एक के बाद एक तीन सिलेंडरों में रेगुलेटर लगाने की कोशिश की लेकिन सब बेकार. टेंपरेचर लगातार नीचे जा रहा था. ऐसे में एक जगह खड़ा रहने पर कुछ भी हो सकता था. मैं खड़े-खड़े ही हाथ-पैर हिला रही थी.

डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद शेरपा ने हार मान ली. वो मुझे वापस लौटने को कह रहा था. मैं ऊपर जाने की जिद पर थी. तय था कि लौटी तो फिर ऊपर नहीं जा सकूंगी.




कैंप के मेरे दूसरे साथी एक-एक करके आगे चले गए. अंधेरा गहरा रहा था. आखिरकार मैंने एक फैसला लिया. शेरपा से अपने सिलेंडर की अदला-बदली कर ली. नीचे लौटना आसान था. तय हुआ कि वो नीचे लौटेगा और मैं अकेली ऊपर जाऊंगी. एवरेस्ट पर अकेले चढ़ना आसान नहीं था. सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि खत्म होने पर मेरा सिलेंडर कौन बदलेगा.

पहाड़ पर, जहां जरा सी भूल पर आपका शरीर बर्फ में हमेशा के लिए खो सकता है, वहां अब इरादे ही मेरे साथी थे.

जाते-जाते शेरपा ने हिदायत दी. धीरे-धीरे अपने ट्रैक पर ही आगे बढ़िएगा. भटकी तो सबसे पहला खतरा लाशों से टकराने का था. दूसरा खतरा बर्फ में खो जाने का था. तीनों सिलेंडरों की ऑक्सीजन थोड़ी-थोड़ी लीक हो चुकी थी, मैंने ऑक्सीजन सप्लाई थोड़ी कम की और आगे बढ़ने लगी. मुझे नहीं पता था कि मैं कहीं पहुंच भी सकूंगी. बस बचपन याद आ रहा था. पहाड़ियों से घिरा मेरा वो गांव. कैसे मैं पहाड़ों के प्यार में पड़ी.



शाम को जब दूसरे बच्चे पकड़म-पकड़ाई खेलते, मैं पहाड़ी चढ़ती. भाई-बहनों से झगड़ती तो पहाड़ चढ़कर गुस्सा उतारती. खुश होती तो पहाड़ भी साथ खिलखिलाते. तब से मैं ख्वाबों में एवरेस्ट देखने लगी थी.

स्कूल में एडवेंचर ट्रिप पर गई, तब जाना कि पहाड़ों पर चढ़ने की ट्रेनिंग भी मिलती है. काफी खर्चीली ट्रेनिंग. मैंने पढ़ाई में दिल लगा लिया लेकिन रोज शाम पहाड़ियों के पीछे ढलता सूरज मुझे बेचैन कर देता. कॉलेज की पढ़ाई के लिए भोपाल पहुंची तो सपना दोबारा जोर मारने लगा. जैसे-तैसे ट्रेनिंग कर ही ली. पहले बेसिक, फिर एडवांस. तभी एक नई बात पता चली. एवरेस्ट चढ़ने के लिए कम से कम 25 लाख रुपए चाहिए.

तब शुरू हुआ कंपनियों को ईमेल करने का सिलसिला. मैं चाहती थी कि कोई मुझे स्पॉन्सर कर दे. दो साल बीते. फिर मैंने सरकारी दफ्तर में दरख्वास्त दी. कॉलेज की बजाए सारी-सारी दोपहर मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर बैठी रहती. साल 2019 के शुरुआत की बात है.



नेपाल सरकार की इजाजत के लिए पैसे जमा कराने की तारीख करीब थी. 25 लाख दूर, मेरे पास 25 हजार भी नहीं थे. तभी सीएम ऑफिस से फोन आया. पैसे जमा किये जा चुके थे.

2 अप्रैल 2019. भोपाल से दिल्ली और फिर काठमांडू. 8 लोगों की टीम बनी. 3 भारत के, 2 ग्रीस, 1 सीरिया और 2 यूरोप से. ट्रैकिंग शुरू हुई. दिनभर पहाड़ी गांवों को पार करते और शाम को किसी गांव में कैंप लगाते. रातभर ठहरने के बाद सुबह फिर निकल पड़ते. 9 दिन तक चलने के बाद एवरेस्ट के बेस कैंप पहुंचे. ये वो दुनिया थी जो हमें एवरेस्ट से जोड़ने वाली थी.

यहीं पर हम आखिरी बार गर्म पका हुआ खाना खाने जा रहे थे. मैं वेजिटेरियन हूं तो दाल-चावल या कभी-कभार साग ही खाने को मिलती.

एक रात के आराम के बाद प्रैक्टिस शुरू हुई. शरीर को अलग-अलग टेंपरेचर झेलने लायक बनाना था वरना सीधे ऊपर जाएं तो ठंड से मौत हो जाती है. हम ऊपर चढ़ते, फिर बेस कैंप लौटते. ये 5 दिनों तक चला. इस बीच लगातार मौसम की रिपोर्ट आती रही. एवरेस्ट किसी भी दिन नहीं चढ़ा जा सकता. इसके लिए खुले मौसम का इंतजार करना होता है.



आखिरकार 18 की रात चढ़ाई शुरू की. सांय-सांय करती हवा से कान बहरे से हो गए थे. कभी तेज आंधी चलने लगती तो कभी एकदम से बर्फ चमकने लगती.

एक बार इतना तेज तूफान आया कि कैंप 3 तहस-नहस हो गया. टेंट के परखच्चे उड़ गए. जैसे-तैसे हमने चढ़ाई जारी रखी. इसी बीच सिलेंडर का रेगुलेटर खराब होने पर शेरपा को लौटना पड़ा. बेस कैंप के बाद हर पर्वतारोही का एक शेरपा होता है. मैं अकेली थी और यही सबसे बड़ी चुनौती थी.

कदम-कदम पर हादसे हुए. एक बार मेरी रस्सी पर ही एक और लाश लटकती मिली. वो भी मेरी तरह ही एवरेस्ट लांघने निकला रहा होगा. लेकिन उस अनजान मौत पर मैं आंसू नहीं बहा सकती थी. उसे क्रॉस करते हुए आगे बढ़ी. आगे कितनी ही लाशें दिखीं. बर्फ में अधदबी. वे कभी अपने देश, अपने लोगों के पास नहीं लौट सकेंगी.



अंधेरा हो रहा था. सिर पर चमकती टॉर्च को एडजस्ट कर रही थी कि तभी कोई आता दिखा. पास आने पर देखा कि मेरा शेरपा सही रेगुलेटर के साथ लौट आया है. लगा मानो बिछड़े दोस्त से मिली हूं. मेरी पीठ पर तीन सिलेंडर थे. 9 किलो का बैग, जिसमें खाने का सामान और पानी की बोतल थी. 4 किलो का वजनी सूट. शेरपा ने मेरा थोड़ा वजन खुद संभाल लिया. आगे बढ़े तो ऐन चोटी से पहले जाम लगा हुआ था. उस रोज काफी कैजुएलिटी हुई थी. आखिरकार रास्ता खुला और हम आगे बढ़े.

तारीख- 22 अप्रैल 2019. मैं एवरेस्ट की चोटी पर थी. दुनिया की सबसे ऊंची चोटी. जहां तक नजरें जाएं, बर्फ ही बर्फ.

सन्नाटे में बर्फीली हवाओं की आवाज. देर तक पहाड़ों को देखती रही. बेहद-बेहद खुश थी लेकिन खुशी में चीख या हंस नहीं सकती थी. थोड़ी भी आवाज से एवरेस्ट पर यहां-वहां अटकी बर्फ के गिरने का खतरा रहता है. कुछ तस्वीरें खिंचवाईं और नीचे उतर गई.

दो महीने बीतने को हैं, अब भी सोती हूं तो लगता है जैसे टेंट में दुबकी हूं और चारों ओर बर्फ की आंधियां हैं. 

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