#HumanStory: कैसी होती है फ़ोन के उस पार ज़िंदगी: कॉल सेंटर का अनकहा सच

प्रतीकात्मक तस्वीर

ऑफिस पहुंचकर हेडफोन लगाते ही जो पहली आवाज कानों में पड़ती है, वो झुंझलाई हुई है. शिकायत से भरी है. वो आवाज कोसती है. चीखती है. हमें फोन 'डिसकनेक्ट' करने की इजाजत नहीं वरना हमारा परफॉर्मेंस खराब माना जाएगा.

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(कंप्यूटर की गड़बड़ी से लेकर फोन का बिल ज्यादा आने पर कॉल सेंटर में फोन करके हम जिनपर अपनी भड़ास निकालते हैं, वो सिर्फ आवाज नहीं, चेहरा भी हैं. लंबा वक्त डोमेस्टिक कॉल सेंटर में काम कर चुकी निशा के साथ रूबरू हों कॉल सेंटर की ज़िंदगी के अनकहे सच से.)

मेरी मॉर्निंग शिफ्ट थी. जाते ही हेडफोन लगाया तो जो पहला फोन आया, वो चीख रहा था. उसे किसी जगह के बारे में जानना था. उसकी शुरुआत थी- 'अरे, कौन है रे तू? किसने तुझे यहां बिठाया? धंधा करने बैठी है क्या?' मैं जितना उसे शांत करने की कोशिश करती, वो उतना ही भड़कता. आखिरकार मैंने 'म्यूट' कर दिया. कॉल अपने टीम लीड को सुनाया लेकिन उसने किसी भी मदद से इनकार कर दिया.

अश्लील भाषा बोलने वाले उस क्लाइंट को मुझे ही संभालना था. ऐसा एक बार नहीं, रोज कई-कई बार हो सकता है.



साल 2007 से निशा ने बीपीओ में काम शुरू किया. वो एक डोमेस्टिक कॉल सेंटर था. वहां भिंड-मुरैना से लेकर बैंगलोर-मुंबई के क्लाइंट्स कॉल करते. निशा याद करती हैं, शुरुआत ठीक वैसी ही थी, जैसी किसी भी कॉल सेंटर की हो सकती है. बोलने की ट्रेनिंग दी गई. स्क्रिप्ट सिखाई गई. फिर हेडफोन और सीट अलॉट हो गई. यहां से जिंदगी बदल जाती है.

'आप दिन में एक शिकायत पर झुंझला जाते हैं. हमारा काम सिर्फ शिकायतें सुनना है', निशा कहती हैं.
हम एक तरह से शिकायत पेटी का काम करते हैं. या फिर उससे भी एक कदम आगे. सुनकर चुप ही नहीं रहते, हल भी सुझाना होता है. बहुत कम ही कस्मटर होते हैं जो ठीक से बात करें. ज्यादातर लोग चिड़चिड़ाए हुए बात करते हैं. चीखते हैं. कोई-कोई ठीक से बात करता है तो कोई सिर्फ इसलिए बात करना चाहता है क्योंकि उसकी एक 'लड़की' से बात हो रही है. कई लोग अश्लील भाषा इस्तेमाल करते हैं. हम तुरंत फोन नहीं काट सकते. इसके लिए हमें तीन बार स्क्रिप्ट बोलनी होती है. जब वे तीसरी बार में भी न सुनें तो ही कॉल काटा जा सकता है.

क्या है वो स्क्रिप्ट
'सर/मैडम, आपसे अनुरोध है कि प्रोफेशनल तरीके से बात करें, अन्यथा हमें फोन काटना होगा.'
निशा याद करती हैं, ये स्क्रिप्ट हमारा डिफेन्स मेकेनिज़्म थी लेकिन जब तक हमें इसके इस्तेमाल की इजाजत मिलती, हमारा पूरा दिन खराब हो चुका होता था. तीसरी बार स्क्रिप्ट कहे बिना फोन काटना मना होता है. हमपर एवरेज टॉक टाइम (एटीटी) का भी दबाव रहता है. एक मिनट में एक ग्राहक से बात हो चुकनी चाहिए. कई क्लाइंट फोन पर लड़की को सुनकर जान-बूझकर लंबी बात करते हैं.

अगर वो असभ्य भाषा में बात नहीं कर रहे हैं तो हम उनका फोन नहीं काट सकते, चाहे वो कितनी ही लंबी बात क्यों न करें.



क्वालिटी डिपार्टमेंट हमें जज कर रहा होता है. टीम लीड की नजरें गड़ी होती हैं. फ्लोर मैनेजर हमारी कॉल वॉच कर सकता है. हम पूरी तरह से घिरे होते हैं. कई बार पानी सिर से ऊपर चले जाता है लेकिन तब भी टीम लीड हमें ही डील करने को कहते हैं.

यहां बाथरूम जाने के लिए भी इजाजत लेनी पड़ती है
कॉल सेंटर में काम करने वालों को 'भरे हुए ब्लेडर' के साथ काम करने की आदत पड़ जाती है. यहां सिर्फ आधे घंटे का ब्रेक मिलता है. उसी में चाहे खाना खा लें या फिर वॉशरूम हो आएं. बीच में एक मिनट के लिए लॉग-आउट नहीं कर सकते. अगर किसी को वॉशरूम जाना ही है तो उसे टीम लीड की इजाजत लेनी होगी.

टीम लीड अगर किसी बात पर आपसे नाराज है तो वॉशरूम-ब्रेक के लिए खड़ा होने पर भी आपको अनदेखा करता है. बिना इजाजत वॉशरूम चले जाएं तो फिर आपका सेशन लिया जाता है. ऐसे माहौल में काम करना काफी मुश्किल होता है.



इंटरनेशनल कॉल सेंटरों के हाल और बुरे हैं. वहां नाइट शिफ्ट होती है. लड़के-लड़कियों दोनों की. अक्सर यहां काम करने वाले किसी न किसी नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं. निशा ने भी एक साथी ऐसा देखा. उसका तर्क था कि स्ट्रेस झेलने के लिए कुछ न कुछ सहारा तो चाहिए. वे याद करती हैं, 'कमउम्र लोग अक्सर पढ़ाई के साथ कमाई के लिए यहां आते हैं. यहां का माहौल उनकी ताकत और यहां तक कि उनके सपनों को सोख लेता है.'

'शायद ही कोई हो जो कॉल सेंटर में करियर बनाने की सोचे. चाहे लड़का हो या लड़की, आने के चंद रोज बाद ही वे जान चुके होते हैं कि यहां ज्यादा दिनों तक 'कंटीन्यू' नहीं किया जा सकता. झुंझलाया हुआ कोई इंसान उस चेहरे का तसव्वुर नहीं कर पाता जो हेडफोन लगाए हुए दिनभर सॉरी और थैंक्यू ही बोलता रहता है.' 

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