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#Human Story: ट्रेन के टॉयलेट से लौटी नन्ही बेटी की बदहवासी ने मेरी ज़िंदगी बदलकर रख दी

उत्तम कुमार सिन्हा
उत्तम कुमार सिन्हा

टॉयलेट में इतनी गंदी चीजें लिखी होती हैं कि कई बार साफ करते हुए उबकाई आ जाती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 23, 2019, 10:58 AM IST
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झारखंड से पश्चिम बंगाल की दूरी पाटने वाली ट्रेनों की एक अलग महक होती है. आप उन्हें अलग से पहचान सकते हैं. झालमूड़ी यानी चटख मिर्चीली भेल की टेर लगाते लोग. सुरीली आवाज में जादू देखने को पुकारते मैजिशियन. ठसाठस भरी बर्थ पर थोड़ी जगह की मनुहार करते लोग. इस रूट पर लगातार चलें तो एक और खास बात दिखेगी. एक शख्स रूमाल, पानी की बोतल और साबुन लिए चढ़ता है और सीधे टॉयलेट में घुस जाता है. घंटे-दो घंटे बाद पसीने में नहाए हुए बाहर आता है और पहले स्टॉप पर उतर जाता है. ये शख्स है उत्तम कुमार सिन्हा जिसकी जिंदगी का मकसद है ट्रेनों और तमाम सार्वजनिक जगहों को अश्लील शब्दों और तस्वीरों से मुक्त करना. बेटी के एक सवाल ने इस पिता को इतना परेशान कर दिया कि इनकी जिंदगी को एक इरादा मिल गया.

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वो दिन मेरे जहन से शायद ही कभी उतर सके. दो साल पहले मैं कोलफील्ड एक्सप्रेस से हावड़ा से अपने घर धनबाद लौट रहा था. साथ में 8 साल की बेटी भी थी. वो लगातार यहां से वहां कूद-फांद रही थी. कभी खिड़की से झांककर बाहर छूटते पेड़-पौधे गिनने लगती. कभी आते-जाते झालमूड़ी वाले को रोककर मुझसे पैसे मांगती. डिब्बे के बाकी यात्री भी बातों में रमे हुए थे.




इसी बीच बेटी टॉयलेट गई. वहां से लौटी तो आते ही पूछा- पापा, टॉयलेट की दीवार पर जो लिखा है, उसका क्या मतलब है. पूरे डिब्बे में सन्नाटा छा गया. बेटी सवाल दोहराते हुए फिर खेल में रम गई. इस बीच मैं चुपके से टॉयलेट पहुंचा और दरवाजा बंद कर दीवारों को रूमाल से रगड़ने लगा. रूमाल गंदा हो गया तो अपने गमछे से साफ करने लगा. लगभग आधे घंटे बाद बर्थ पर लौटा तो दिल में एक धुंधली सी तस्वीर थी.

सफर से घर लौटकर भी पूरे वक्त वही सब सोचता रहा. इसी बीच बेटी को दोबारा अपना सवाल याद आ गया. इरादा और मजबूत हो गया. मैं पेशे से व्यापारी हूं. दिनभर काम के बाद रात में घर पहुंचने पर परिवार के साथ रहने का आदी. अब मेरा रुटीन बदल चुका था. रात का खाना खाकर मैं खराब हो चुकी चादरों के टुकड़े, पानी की बोतल और सर्फ लेकर निकलता. स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में चढ़कर सीधे उसके टॉयलेट में घुसता. आमतौर पर हर टॉयलेट में अश्लील-भद्दी तस्वीरें और कोई न कोई बात लिखी होती.

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कई बार किसी लड़की का नाम और नंबर भी लिखा होता. रोज कितने लोग उस नंबर को देखते होंगे. कितने फोन उस नंबर पर जाते होंगे. अंदाजा लगाकर भी मैं सिहर उठता हूं तो जिसका नंबर है, उसे कितनी परेशानी होती होगी. लेकिन अभी सोचने का वक्त नहीं. मैं फटाफट अपना काम शुरू करता हूं.



ट्रेन के शौचालय की दीवार पर कला के सारे नमूने दिख जाते. कोई पेन से तस्वीरें उकेरता तो कोई-कोई पेन न होने पर दीवारों को खुरचकर अपनी कुंठा निकालता. भद्दी कल्पनाओं का बेजोड़ नमूना यहां मैंने देखा. मिटाते हुए खुद उबकाई आती. पेन की लिखी चीजें तो साबुन से मिट जातीं लेकिन खुरचे हुए को मिटाना मुश्किल होता. तब मैंने एक पोस्टर छपवाया. उसपर लिखा हुआ है- स्टॉप राइटिंग डर्टी वर्ड्स. जहां मिटाना मुमकिन नहीं हो पाता था, मैं वहां ये शब्द चिपकाने लगा.

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मिटाने के दौरान अक्सर ट्रेन चल पड़ती. मैं घर से काफी दूर निकल आता. कई छोटे स्टेशनों पर उतरने पर लौटने का कोई ठिकाना नहीं रहता था. मैं घंटों के इंतजार के बाद घर लौटकर सोता. थकान थी, घरवालों के साथ वक्त न बिताने का मलाल था लेकिन संतोष था- मेरी बेटी या दूसरों की बेटियां उस ट्रेन से गुजरेंगी तो टॉयलेट से लौटकर कोई अपने पिता से सवाल नहीं करेगी. या फिर कोई बेवजह शर्मिंदा होकर हड़बड़ाती हुई टॉयलेट से बाहर नहीं आएगी.



लगभग दो सालों में मेरी इस मुहिम ने कई रंग देखे. पहले-पहल मैं ट्रेनों के शौचालयों पर काम करता. बाद में सरकारी- गैर सरकारी दफ्तरों के टॉयलेट भी साफ करने लगा. धनबाद के ही एक दफ्तर के सामने एक पब्लिक टॉयलेट की दीवार साफ कर रहा था कि एक शख्स वहां से गुजरा. वो ठिठककर मुझे देखने लगा. थोड़ी देर देखने के बाद वो पक्का हो गया कि कपड़े से दीवार पोंछता आदमी पागल है. वो खेपा-खेपा कहकर मुझपर हंसने लगा. साथ में कई और लोग भी जमा हो गए. मैं तब भी चुपचाप साबुनपानी रगड़ता रहा. कितने लोग कितने तरह की बातें करते लेकिन हरदम मुझे बेटी का चेहरा याद रहा.

अब मेरे साथ शहर की एक गैर-सरकारी संस्था भी जुड़ गई है. रोज रात के नौ बजे के आसपास 15 लोग अपने घरों से निकलते हैं. हाथों में कपड़े, साबुन, स्पिरिट और दिल में एक इरादे के साथ कि सार्वजनिक जगहों के शौचालय ऐसे न हों, जहां जाते ही लड़कियों के जहन में अखबारों में छपी बलात्कार की खबरें तैरने लगें.

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