#HumanStory: आपबीती, उस लड़के की जिसे लिपस्टिक लगाना पसंद है

नाइट शिफ्ट थी. कैब का कॉल आया. बाहर निकला तो सड़क खाली थी. पता चला कि कैब पहुंचने में 5 मिनट और लगेंगे. चौड़े गले की टी-शर्ट, लंबे बाल, हल्की लिपस्टिक और हाई हील्स. मैं लड़का था लेकिन अपने पहनावे की वजह से उस रात एक बेहद खौफनाक हादसे का शिकार होते-होते बचा. मैनेजर से बात की तो उसने गला खंखारते हुए समझाया- 'नाइट शिफ्ट में सिर्फ लड़कियों को सिक्योरिटी मिलती है'.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 12, 2019, 10:48 AM IST
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हरियाणा का सुस्ताता हुआ शहर अंबाला. यहां एक आम स्कूल का बेहद आम-सा लड़का सहमी आंखें लिए स्टेज पर खड़ा है. कुछ पलों बाद वो गाना शुरू करता है- पैरों में बंधन है... हॉल ठहाकों से गूंज उठा है. बच्चों को डांटते टीचर्स खुद भी मुस्कुरा रहे हैं. लड़का रो पड़ता है. फिर कभी स्टेज पर न जाने की कसमें खाता है. आज वो बच्चा ड्रैग क्वीन यानी औरतों की पोशाक में स्टेज पर गाता-नाचता है. रॉविन शर्मा  उन तमाम लड़कों की जुबान हैं जो लड़की या लड़का के खांचे में फिट नहीं.

दूसरे बच्चों की तरह मैं भी सपने देखता. किसी को गाते देखता तो खुद भी गाना चाहता. कोई अच्छा पढ़ता तो उसकी जगह खुद को देखता. कोई अच्छा खेलता तो सोचता कि मैं भी ऐसा खेल सकूंगा. एक रोज फुटबॉल के मैदान पहुंचा. किक मारते ही साथ के लड़के हंसने लगे. एक चिल्लाया- 'छक्का'. फिर तो हर ओर से वही सुनाई देने लगा. ये मेरी नई पहचान थी. बड़ा होते हुए समझने लगा था कि मुझमें कोई चीज है जो दूसरे लड़कों से अलग है.

स्कूल में लड़के छेड़ते. कई बार कुछ मजबूत लड़कों ने मेरी टांगें छूने की कोशिश की. मैं डर गया लेकिन घर लौटकर मां से बता नहीं सका कि मुझे स्कूल जाने का मन नहीं करता, बच्चे चिढ़ाते हैं.




मैं अलग था. मेरी चाल अलग थी. आवाज अलग थी. खेल में मजाक उड़ा तो गाने की ठानी. स्टेज पर जैसे ही गाना शुरू किया, सब हंसने और कमेंट करने लगे. आठ-नौ साल का वो लड़का नहीं जानता था कि गानों का भी 'जेंडर' होता है. जैसे-तैसे कुछ दोस्त बने. फिर पता चला कि एक दोस्त ने अपनी फोनबुक में मेरा नाम छक्के के नाम से सेव कर रखा है. बस, उस वाकये के बाद मैं सिमट गया. पढ़ता और घर लौट जाता.

घर पर भी दुनिया थोड़ी अलग थी. मैं अकेला होने का इंतजार किया करता. मम्मी घर से बाहर जाएं तो उनकी साड़ी पहनूं और देखूं कि कैसा लगता हूं!

लड़कियों वाले गाने गा सकूं. पापा ने एक बार मुझे गाते सुन लिया था और तबीयत से मेरी धुनाई की. उसके बाद से और भी अकेला हो गया. वक्त के साथ समझने लगा था. मेरे भीतर कुछ तो ऐसा है जो दूसरों से अलग है. या अलग लगता है. अब तक उस अलग की पहचान घरवालों को नहीं हुई थी.

शर्मिंदगी से बचने-बचाने के लिए अंबाला छोड़कर दिल्ली आ गया. एक कॉर्पोरेट में नौकरी शुरू की, साथ में डिस्टेंस से पढ़ाई करने लगा. शुरुआती मुश्किलें आज भी जहन में ताजा हैं. सब मेरे साथ बैठने से कतराते. चाय पीने के लिए साथ ढूंढता तो एक चेहरा नहीं मिलता. लंच अकेले- डिनर अकेले.



मैं लंबे बालों वाला वो लड़का था, जो कपड़े खरीदने के लिए 'गलती से' हर बार लड़कियों के स्टोर में घुस जाता है. ढाई साल ऐसे ही चला. फिर मैंने नौकरी बदल ली.

नई जगह पैकेज बड़ा था. दफ्तर बड़ा था लेकिन दिल उतना ही तंग. अक्सर नाइट शिफ्ट लगती. ऐसे ही एक रोज सड़क पर कैब का इंतजार कर रहा था, जब दो बाइक सवारों ने मुझे परेशान किया. सर्दी की रात मैं पसीना-पसीना था. कैब में बैठने के बाद रो सकने की छूट नहीं थी. वजह- मैं लड़का था. मैनेजर से वाकया कहा. वो सुनता रहा. फिर कहा- आपकी बात समझता हूं लेकिन सिक्योरिटी सिर्फ फीमेल एम्प्लॉयीज को ही मिलती है. लड़कों को नहीं. अगले रोज मैंने वो नौकरी भी छोड़ दी.

दिलदार दिल्ली ने बुरी तरह से डराया. सड़क पर चलूं तो कोई भी मुझे साथ चलने को कह सकता है. भद्दे इशारे कर सकता है. हाथ लगा सकता है. ऐसा करते हुए उसे डर नहीं लगेगा.

नौकरी-दर-नौकरी अहसास कराया गया कि मैं अलग हूं. लंबे बालों को संवारूं तो लोगों का ध्यान भटकने लगता. मर्द टांगों पर हाथ रखते. लड़कियां बात करने से बचतीं. मैं अपने शहर लौट आया. हारा हुआ. नहीं जानता था, आगे सब बदलने वाला है.



घर पर दिन फ्लैशबैक में गुजरने लगा. वे सारे दफ्तर याद आते जहां काम किया था. जहां वॉशरूम जाने से पहले भी सौ बार सोचता. जहां डेस्क से उठते ही कई नजरें आपकी चाल का पीछा करतीं. मैंने उन्हीं दफ्तरों के लिए कंसेप्ट नोट बना डाला. एक दिन मेरे इनबॉक्स में एक ईमेल था. मुझे एक कॉर्पोरेट में जेंडर डाइवर्सिटी पर लेक्चर के लिए बुलाया गया था.

इसके बाद देश की कई टॉप यूनिवर्सिटीज में लेक्चर दिया. मुझे सुनने के लिए भीड़ जमा हो जाती. इसकी एक वजह मेरे कपड़े भी थे. मैं क्रॉप टॉप पहनता, जिसके कंधे नीचे गिरे रहते. ढीली-ढाली पैंट और खूब ऊंची हील्स. लेक्चर देते हुए अपने बालों से खेलता. मैं जतलाना चाहता था कि कपड़ों या आदतों का जेंडर नहीं होता. मैं लड़का होकर भी लड़कियों की तरह रह सकता हूं.

फिर एक रोज रॉविन शर्मा... रुवीना टेंपोन बन गई. स्टेज पर रॉविन के पैर कांपते. आवाज थरथराती. रुवीना स्टेज पर खुलकर डांस करती हैं. उसकी आवाज में शोर गुनगुनाहट में बदल जाता है.



जो काम बचपन में मैं छिपकर किया करता था, रुवीना बनने के बाद वो स्टेज पर सबके सामने करने लगा. इस नाम ने मुझे दौलत-शोहरत सब दिया. रुवीना ने बताया कि मैं खूबसूरत हूं. हालांकि इस खूबसूरती को पाने में घंटों पसीना बहता है. क्लीन शेव करना होता है. फिर मेकअप की मोटी परत थोपी जाती है.

गहरी लिपस्टिक. आंखों पर नकली पलकें. मोटा लाइनर. दिनभर खाना नहीं खाता हूं ताकि पेट भीतर रहे और कॉस्ट्यूम फिट. ऐसे बनती है स्टेज की रुवीना.

ड्रैग क्वीन बनने के बाद एक सुबह मां का कॉल आया. आवाज घबराई हुई थी. सहमते हुए उसने पूछा- क्या तूने प्रॉस्टिट्यूशन शुरू कर दिया है? जवाब दे सकूं, उससे पहले दूसरा सवाल आ गया- तू लड़का है या लड़की? और फिर... तुझे डॉक्टर के पास ले चलती हूं.

दिल्ली में 8 साल हुए. इन सालों में पूरी जिंदगी देख ली. इंस्टाग्राम पर रुवीना के हजारों फॉलोवर्स हैं लेकिन असल जिंदगी में रॉविन का कोई दोस्त नहीं. आधी रात कोई मुसीबत आए तो मैं किसी को फोन नहीं कर सकता. मैं लड़का हूं जिसकी पसंद लड़कियों जैसी है.

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