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#HumanStory: 'ससुराल वालों ने पढ़ने से रोका, कहा- बहुएं पढ़ेंगी तो बर्तन-खाना कौन करेगा'

#HumanStory: 'ससुराल वालों ने पढ़ने से रोका, कहा- बहुएं पढ़ेंगी तो बर्तन-खाना कौन करेगा'

मंदसौर की गिरिजा बैरागी आज पढ़ाई करते हुए सुरक्षा गार्ड का काम कर रही हैं

मंदसौर की गिरिजा बैरागी आज पढ़ाई करते हुए सुरक्षा गार्ड का काम कर रही हैं

गांवघर में नई दुल्हन को इस बात से भी तौला जाता है कि वो कितना कम और कितना धीरे बोलती है. ऐसे में दिन के उजाले में कोई मांग करना किसी गुनाह से कम नहीं.

    14 बरस की उम्र में गिरिजा ब्याहकर ससुराल गईं तो पाया कि घर की बहुएं बाहर निकलकर पढ़ाई नहीं कर सकती हैं. गिरिजा मां के घर लौटीं, कोर्ट में शादी निरस्त कराने के लिए आवेदन दिया. ताने-धमकियों के बावजूद डटी रहीं. अब वह लगभग 20 साल की हैं. बाल विवाह निरस्त हो चुका है. वो बस्ते में किताबों के साथ सपने बांधकर कॉलेज जा रही हैं. पढ़िए, मध्यप्रदेश के मंदसौर की गिरिजा बैरागी की कहानी...

    शादी के बाद विदाई के वक्त मां मेरा संदूक तैयार कर रही थीं. यकायक मेरी रुलाई फूट पड़ी. कच्ची उम्र में शादी कर दी, अब क्या एकदम से मार ही दोगे. मां मुझे देखती रह गईं. मैंने फटाफट संदूक से शादी के कुछ कपड़े फेंके और उसमें अपनी किताबें ठूंस दीं.

    नई ब्याहता को कपड़े-लत्ते का शौक होता है. गिरिजा का शौक उनकी किताबें थीं.

    शादी होकर ससुराल पहुंची तो वहां देखा कि सब लोग हर वक्त काम में लगे रहते हैं. गाय-गोरू, गोबर-उथला, खेती के हजारों काम होते. रात तक छोटी सी गिरिजा इतना निढाल पड़ जाती कि खाना भी नहीं खाती थी. ऐसा अक्सर होता. उनकी किताबें संदूक में ही बंद थीं. रोज सोचती कि अब उन शब्दों को दोबारा महसूस करने का वक्त मिलेगा, लेकिन वो दिन आने का नाम ही नहीं ले रहा था.

    वे डरने लगीं कि क्या किताबों पर भी वक्त के साथ जंग लग जाती होगी!

    14 साल की उम्र में गिरिजा का ब्याह हो गया (प्रतीकात्मक फोटो)


    तब वे नौवीं कक्षा में थीं. शादी के वक्त बात हुई थी कि वे थोड़े दिनों के लिए ससुराल आकर रहेंगी. फिर मायके जाकर परीक्षाएं देंगी. गिरिजा इसी शर्त पर शादी के लिए राजी हुई थीं. वे रोज ससुरालवालों से बात करने की सोचतीं कि दोपहर का कोई वक्त उन्हें पढ़ने के लिए मिले.

    गिरिजा याद करती हैं- गांवघर में नई दुल्हन को इस बात से भी तौला जाता है कि वो कितना कम और कितना धीरे बोलती है. ऐसे में दिन के उजाले में कोई मांग करना भी गुनाह है, ये तब तक मैं समझ चुकी थी. इसलिए कई दिनों तक चुप रही.

    एक दिन आपस की बातचीत में गिरिजा ने सुना कि ससुराल वाले उसे किसी भी हाल में दसवीं से आगे नहीं पढ़ने देंगे. गिरिजा सन्न रह गईं. इस बार उन्होंने नवेली दुल्हन वाला सारा डर किनारे कर दिया. साफ बात की. ससुराल वालों ने उन्हें तफसील से बताया कि खेती-किसानी वाले घर में ढेरों काम रहते हैं. एक जवान सदस्य पढ़ाई में लगा रहेगा तो काम का हर्जा हो जाएगा.

    गिरिजा ने पहले-पहल समझाने की कोशिश की कि पढ़ाई से काम के हर्जे का कोई ताल्लुक नहीं. वे अलसुबह उठकर काम में जुट जातीं, घर के सारे काम निपटाने के बाद ऊपर के काम भी करतीं ताकि दिखा सकें कि वे काम के साथ पढ़ाई कर सकती हैं.

    अलसुबह उठकर काम में जुटती तो देर रात लगी रहती (प्रतीकात्मक फोटो)


    वे थक जातीं लेकिन खुश थीं कि अब किसी के पास पढ़ाई न करने देने के लिए कोई बहाना नहीं होगा. इस बार घरवालों के पास नया तर्क था. लोग क्या कहेंगे कि घर की बहू बस्ता लेकर स्कूल जा रही है!
    इसके आगे गिरिजा के पास कहने को कुछ नहीं था. वे इंतजार करती रहीं. थोड़े वक्त बाद मायके लौटीं तो इतने दिनों से जज्ब किया बांध फूट पड़ा.

    गिरिजा याद करती हैं कि वे दिन जिंदगी के सबसे मुश्किल दिन थे. घर पर मेरा लगभग सबसे अबोला था. दिनभर कमरे के एक कोने में बैठी सुबकती रहती. आसपड़ोस की हमउम्र लड़कियां आतीं, मुझसे मजाक करना चाहतीं लेकिन मेरी सूजी आंखें देखकर सहम जातीं.

    मैं डर गई थी कि अब वापस लौटकर क्या अपने स्कूल की किताबों पर उपले पाथने होंगे. मुझे खेती-किसानी से कोई परहेज नहीं, लेकिन मैं पढ़ना चाहती थी.

    कई दिनों के अबोले और भूख-हड़ताल के बाद आखिर मेरे माता-पिता समझ गए कि इससे आगे मुझे मजबूर नहीं किया जा सकता. उन्होंने खबर पहुंचा दी कि उनकी बेटी अब वापस नहीं लौटेगी. अब दूसरी ओर से भी ताने मिलने लगे.

    पढ़कर क्या करेगी. कौन सी तुझे पढ़कर कलेक्टर बनना है. शादी टूट जाएगी तो सारी उमर किताबों के साथ जीना. मैंने अपनी आंखें किताबों में गड़ा दीं ताकि कुछ और दिखाई न दे. जोर से बोलकर पढ़ने लगी ताकि कान अपनी ही आवाज सुनें.

    शादी खत्म करने के कदम पर ससुराल की ओर से धमकियां मिलने लगीं


    मायके में रहते हुए मैंने पढ़ाई के साथ-साथ विवाह शून्य यानी निरस्त करने के लिए बाल संरक्षण अधिकारी के पास आवेदन डाल दिया. केस फैमिली कोर्ट पहुंचा. इसके बाद ससुराल की ओर से कई तरह की धमकियां मिलने लगीं. मजाक उड़ा. लोगों ने हमारे घर आना छोड़ दिया. लेकिन तबतक मेरा परिवार मेरी बात समझ चुका था, वे मेरे साथ रहे. अगले ही साल फरवरी में कोर्ट ने मेरी शादी को निरस्त कर दिया.

    अब मैं आर्ट्स में ग्रेजुएशन कर रही हूं. हमउम्र लड़कियों के साथ कॉलेज जाती हूं. साथ में सिक्योरिटी गार्ड का काम भी करती हूं.

    सबने मजाक उड़ाया था कि कौन सा पढ़कर कलेक्टर बन जाएगी. उसी मजाक ने रास्ता सुझाया है- अब मैं पढ़कर पीएससी का एग्जाम दूंगी.

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    Tags: Child marriage, Child sexual abuse, Human story, Madhya pradesh news

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