#HumanStory: वो 'काली लड़की' जिसे खेल में चोर बनाया जाता, अब है देश की पहली संथाल RJ

स्कूल में सबको यकीन था कि घर पर हम कच्चा मांस खाते हैं और हमारे गंवई रिश्तेदार पत्तों के कपड़े पहनते हैं.

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बंगाल के छोटे-से गांव में संथाली बोलती लड़की का गांव छूट जाता है. पढ़ने के लिए कोलकाता पहुंचती है लेकिन तभी मुलाकात होती है चमकीले महानगर के स्याह अंधेरों से. लड़की को खेल में हमेशा 'चोर' ही बनाया जाता और डांस के लिए साफ मना हो जाता. वजह -वो काली थी. अब गहरे रंग वाली वही लड़की शिखा मंडी देश की पहली संथाल रेडियो जॉकी है. 

शिखा मूलतः बंगाल के झारग्राम की रहनेवाली हैं. एक ऐसे गांव की, वक्त के साथ भी ठहराव ही जिसकी पहचान है. माओवादियों के डर से गांव छोड़ना पड़ा. शिखा याद करती हैं. मां-बाबू ने मुझे कोलकाता भेजने का फैसला लिया. एक रिश्तेदार के घर ठौर मिली. घर से बाहर निकली तो नया संसार डरा रहा था. भागते-दौड़ते लोग. चौड़ी सड़कों पर फरफराती गाड़ियां. दुकानों में हरदम खरीद-फरोख्त. अंग्रेजीदां चेहरे. और उनका गहरा-ठंडा लहजा.

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बोली सबसे बड़ी दिक्कत थी. हम संथाली बोलते. बाकी लोग बांग्ला या अंग्रेजी. बाहर निकलो तो समझने-समझाने में इतना वक्त लगता कि कई बार गूंगे की एक्टिंग करनी पड़ती. स्कूल गए तो भी यही हाल. सबसे पहले बांग्ला सीखी. तब भी बच्चे मुझे ऐसे देखते मानो कोई अजूबा आ गया हो. मेरा सरनेम सबसे अलग था. मेरा रंग सबसे पक्का. और बोली सबसे कच्ची.


आज भी याद है, जब एक बच्चे ने मेरे टिफिन में ताकझांक की थी. वो सोचते थे, मैं कच्चा मांस खाती हूं. एक ने पूछा- तुम लोग घर पर पत्तों के कपड़े पहनते हो न! उसे यकीन था कि मैं हां में सिर हिलाऊंगी. मैं बेसाख्ता रो पड़ी. बच्चा घबरा गया लेकिन तब उसका यकीन तब भी नहीं डोला कि हम संथाल लोग नील नदी के किनारे रहते आदिवासियों के बिरादर हैं जो झींगालाला गाते होंगे.

तब बात-बात पर मेरे आंसू ढरक आते थे. कोसती कि मैं क्यों संथाल घर में जन्मी.

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खेलने जाती तो हरदम चोर का रोल मिलता. चोर बनो और बाकी बच्चों से पिटाई खाओ. मांगने पर भी कभी मुझे पुलिस का रोल नहीं मिला. स्कूल में डांस कंपीटिशन में हिस्सा लेने गई तो टीचर ने मना कर दिया. हर साल मेरे जाते ही जगह 'फुल' हो जाती. बहुत बाद में जाना कि काली लड़कियां डांस करती हुई अच्छी नहीं लगतीं. कुछ सालों बाद मैंने कोशिश छोड़ दी. काली हूं. संथाल हूं. ये इतनी-इतनी बार सुना कि अब फर्क नहीं पड़ता.



हरदम अकेली रहती शिखा ने धीरे-धीरे रेडियो से दोस्ती कर ली. यही दोस्ती एक रोज जिंदगी में यू-टर्न लेकर आई. खनकती आवाज की मालकिन शिखा याद करते हुए एकदम से भावुक हो जाती हैं.
मैंने घरवालों से अपने रेडियो जॉकी बनने का सपना शेयर किया. उन्होंने इनकार कर दिया. इनकार सुनना तब जिंदगी का हिस्सा बन चुका था. मैं चुप हो गई. फिर एक रोज अचानक रेडियो के लिए इंटरव्यू का एड देखा. मैं बिना बताए इंटरव्यू देने चली गई. यकीन था कि यहां भी नहीं ही सुनूंगी. इस बार उल्टा हुआ.

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ट्रेनिंग शुरू होने जा रही थी और इधर मैं घरवालों को मना रही थी. रेडियो जॉकी का काम हमारे पूरे खानदान, गांवभर में किसी ने नहीं किया था. उन्हें तो ये भी नहीं पता था कि ये कोई काम भी है. वे मुझे 'नॉर्मल' पढ़ाई के लिए मना रहे थे और मैं अपना सामान पैक कर रही थी.



लगने लगा था कि अब मेरी भी जिंदगी सिंड्रेला जैसी खुशरंग हो जाएगी लेकिन मैं शिखा थी- सिंड्रेला नहीं. ट्रेनिंग के बाद मैंने संथाली में प्रोग्राम देना शुरू किया. तब वही बोली, जो कभी मेरी अपनी जबान थी, अब उसे बोलते जबान कांपती. कोलकाता आने के बाद इसी बोली को बड़े ही जतन से मैंने खुद से अलग किया था. खुद को संथाल बोलने से बचती. अब वही बोली मुझसे अपनी दुश्मनी निकाल रही थी. अब प्रोग्राम देती तो आवाज डगमगाती. प्रोग्राम संथाली था लेकिन उसमें बांग्ला शब्द ज्यादा होते. शिकायतें आने लगी. लोग गरियाते. फेसबुक पर अनाप-शनाप लिखते. 'काम छोड़ दो. संथाली को बदनाम मत करो'.

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जिस बोली को छोड़ने के लिए इतने जतन किए, वो अब मुझसे नाराज थी. मुझे उसे मनाना था. मैंने संथाली बोलनी शुरू की. सोते-जागते इसी भाषा में बोलती.

इस बात को डेढ़ साल बीते. अब मुझे सुननेवाले देश के कोने-कोने में हैं. घंटेभर की जगह तीन घंटे का प्रोग्राम देती हूं. जैसे ही RJ की सीट पर बैठती हूं- भीतर की नन्ही गंवार शिखा जाग जाती है जो सांस भी संथाली में ही लेती है.

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