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#HumanStory: ये जर्मन औरत 40 सालों से मथुरा में बीमार गायें पाल रही है

घर पर कोई मांस या बीफ न खाए, इसी शर्त पर जर्मनी जाती हूं. यहां तक कि डर के मारे मैंने अन्न-सब्जियां खाना छोड़ दिया.

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(झुर्रीदार चेहरे पर स्लेटी-बादामी आंखें. बेतरतीबी से बंधे बाल और ढीला चोगेनुमा कुरता. जर्मन महिला फ्रेडरिक ब्रुइनिंग की यही धज है. वे दिन से देर शाम तक गौशाला में काम करती हैं. गोबर साफ करने से लेकर दूध दुहने और बीमार गायों को मरहम लगाने का भी. 40 साल पहले एक टूरिस्ट की तरह भारत आईं फ्रेडरिक को पूरा मथुरा शहर अब सुदेवी माता के नाम से जानता है. उनकी गौशाला में 18 सौ के लगभग गायें हैं, जिन्हें वे बाकायदा नाम से पुचकारती हैं.)

साल 1978 में जर्मनी से घूमने के लिए भारत आई. यहां बड़े-छोटे तमाम शहर देखने के बाद मथुरा पहुंची. ब्रज भा गया. भगवत गीता पढ़ी और फिर दीक्षा लेकर यहीं रम गई. साधु-संतों के साथ उठना-बैठना और सत्संग की बातें सुनना- मेरा यही काम था. फ्रेडरिक बताती हैं. तब मैं हिंदी सीखने की मशक्कत किया करती. किताबें तो अंग्रेजी में पढ़ने को मिल जातीं लेकिन साधुओं से बातचीत के लिए हिंदी सीखना जरूरी लगा. मैं हिंदी सीखने के लिए ढेरों हिंदी किताबें लेकर आई. लोगों से घुलती-मिलती ताकि बोलना सीख जाऊं. इसमें कई साल निकल गए.



एक रोज मंदिर से घर के रास्ते एक घायल बछड़ा मिला. बुरी तरह से जख्मी था. सब रुककर देखते लेकिन मदद के लिए कोई तैयार नहीं था. तब मैं उसे अपने साथ ले आई. डॉक्टर को बुलवाया. अगले कई दिनों तक मैं उसकी दवा-दारू, खाने-पीने में लगी रही. वो ठीक हुआ. लावारिस था तो मैंने साथ रख लिया. ऐसे ही गायों का परिवार बढ़ता चला गया. शुरुआत में ज्यादातर गाएं ऐसी थीं जो बूढ़ी-बीमार या दूध न देने की हालत में होतीं. बीमार बछड़ों को भी लोग सड़क पर मरने के लिए छोड़कर चले जाते. मुझे काफी तकलीफ होती. छोड़कर आते नहीं बनता था. मैंने मथुरा में ही बड़ी जमीन ली और गौशाला चलाने लगी.

घरवालों ने पहले तो मना किया. देश लौटो, पढ़ो, शादी कर लो. फिर मेरी जिद के आगे उनका भी मन बदल गया. पिताजी मिलने आए. मुझे कच्चे-पक्के घर में गायों के बीच रहते देखा. उसके बाद से हर साल जर्मनी से वे मुझे पैसे भेज रहे हैं.

गौशाला में रोज नई-नई गायें आती हैं. कोई अंधी है, कोई अपाहिज तो कोई उम्रदराज. बार-बार जख्मी हो जाती हैं. देखभाल के लिए शुरुआत में दूसरों का मुंह ताका करती. बीमार या चोट लगी है तो डॉक्टर का इंतजार करती. भूखी हैं तो चारे के लिए किसी कामगार का. धीरे-धीरे सब खुद सीख लिया. गांवों की लड़कियों के साथ चारा काटने जाती. ग्वालों से दूध दुहना सीख लिया. बछड़ों की मांएं दूध नहीं पिला पाती हों तो मैं बोतल से दूध पिला देती हूं. दवाइयां जानती हूं. छोटे-मोटे जख्मों का इलाज खुद करती हूं. गायों की संख्या बढ़ी तो मदद के लिए लोग भी रखे. आज मेरे साथ 70 लोग गौ सेवा का काम कर रहे हैं.



जर्मन और भारतीय खाने में फर्क पर सुदेवी माता हंसते हुए कहती हैं- मैंने तो अन्न ही छोड़ दिया. खाना बनाना आता नहीं था, बने-बनाए खाने का मिर्च-मसाला सहन नहीं होता था. खाने के कितने तो परहेज थे. तब मैंने अन्न खाना बंद ही कर दिया. दूध, दही, फल, सूखे मेवे, मूंगफली खाती हूं. हर साल एक बार जर्मनी जाना होता है. तब पापा को पहले ही चेतावनी दे देती हूं कि मैं आऊं तो घर में 'वो सब' न बने.

वो सब यानी क्या! भर्राई आवाज में एक खास लहजे के साथ हिंदी में वे साफ करती हैं- गायें मेरे लिए बच्चे जैसी हैं. कोई कहे कि मैं तुम्हारे बच्चों को खाऊंगा तो मैं क्या उसे रोकूंगी नहीं. घर से निकाल न दूंगी. लेकिन गौकशी के शक में किसी को पीटना या हत्या करना भी सही नहीं.

61 साल की ब्रुइनिंग इसी गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री मिला है. इतने बड़े सम्मान के बाद जिंदगी में क्या फर्क आया? ब्रुइनिंग की मानें तो कुछ नहीं. पहले भी बेसहारा, अपाहिज गायों को पालती थी. अब भी यही करती हूं और यही करना चाहती हूं.

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(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human story पर क्लिक करें.)

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