#HumanStory: पहाड़ों पर रहता ये प्लास्टिक सर्जन मुफ्त में बना चुका है हजारों चेहरे

अमेरिका के उस शानदार अस्पताल में ड्यूटी पर था. तभी एक खूबसूरत लंबी-सी लड़की भीतर आई. चेहरा एक ओर से ढंक रखा था. कुर्सी पर बैठने के बाद चेहरा खोला. आंखों के करीब एक तिल. उसकी ओर इशारा करते हुए युवती ने कहा- डॉक्टर, मुझे इसे हटवाना है. फिर आई 75 साल की वो औरत, जिसे ब्रेस्ट कसवाना था. मुझे मेरा देश बेतरह याद आता. मैं लौट आया. यहां आग और एसिड से जले चेहरे मेरा इंतजार कर रहे थे.

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घना जंगल, तीन ओर बहता पानी, चारों ओर पहाड़. एक लड़की नदी से पानी लेकर लौटती है. अब वो खाना पका रही है. लड़की का आंचल चेहरे से हटता है. बुरी तरह से जला हुआ चेहरा. एक आंख बंद. नाक की जगह ठूंठ. होंठ गायब. खाना पका-खाकर वो एक मकान की ओर बढ़ती है. यहां उसका अधूरा चेहरा पूरा होगा. पढ़िए, प्लास्टिक सर्जन डॉ योगी एरन को, जिनकी जिंदगी किसी किस्से से कम दिलचस्प नहीं.

एक बार एक औरत आई. जंगल में महुआ बीनते हुए भालू ने उसपर हमला कर दिया था. पूरे चेहरे पर जख्म ही जख्म. दोनों जबड़े नहीं थे. एक आंख गायब. नाक की जगह दो गड्ढे. मैंने सर्जरी शुरू की. धीरे-धीरे जबड़े बने. फिर होंठ. नाक बनाने जा ही रहा था कि उसने टोक दिया. 'बस, हो गया डॉक्टर. होंठ बन गए हैं. अब बीड़ी पी सकती हूं. चाय पी सकती हूं. अपने आदमी से हंस-बोल सकती हूं. मुझे नाक की जरूरत नहीं.' मैं रोकता रहा और वो चली गई.





बाहर था तो ऐसे-ऐसे मामले आते कि अपने डॉक्टर होने पर गुस्सा आता. एक छोटे से तिल को हटवाने या पकी हुई उम्र में ब्रेस्ट कसवाने के लिए लोग लाखों खर्च करते. दूसरी तरफ भारत के जंगलों, गांवों में रहने वाले लोग. उनका चेहरा या हाथ-पैर जले हुए हैं- लेकिन इलाज के पैसे नहीं. इन्हीं लोगों के लिए साल 1983 में मैंने देहरादून शहर से थोड़ा हटकर अस्पताल खोला.
पहाड़ी गांवों में जलने के मामले आए-दिन होते रहते हैं. कई बच्चे तो जन्म के साथ ही जल जाते हैं. एक बच्चा आया. सिर से पांव तक भुट्टे की तरह झुलसा हुआ. एकाध हफ्ते का था. दादी उसे सिगड़ी के ऊपर रखकर आंच दे रही थी. हाथ हिला और बच्चा सिगड़ी पर गिर गया. ये इकलौता केस नहीं.

घर के भीतर आग जलता छोड़कर मां-बाप काम पर निकल जाते हैं. कभी पानी लाने, कभी मजदूरी पर. खेलता बच्चा आग में झुलस जाता है. काफी दिनों से एक 18 साल का लड़का आ रहा है. मां की गोद में. दोनों हाथ बचपन में जल गए थे. गांव में ही इलाज हुआ. केस बिगड़ गया. उन्हें पता ही नहीं कि जले हुए को ठीक किया जा सकता है. पट्टी कर लेते हैं और इंतजार करते रहते हैं. बाद में मेरे पास आते हैं.



एसिड अटैक की शिकार बच्चियां आती हैं. एक मुजफ्फरनगर से थी. चेहरा देखकर रूह कांप जाए, इस कदर जली. उसके पति को उसपर शक था. सोती हुई लड़की के चेहरे पर बाल्टीभर सल्फ्यूरिक एसिड डाल दिया. वो बहादुर लड़की थी. गजब का जीने का जज्बा था. मैंने पेट की जगह चीरा लगाकर बलून डाला. वहीं पर पूरा चेहरा तैयार किया. बहुत दिन लगे. धीरे-धीरे उस चेहरे को असल चेहरे की जगह लगा रहा था. तभी एक सुबह वो वॉर्ड में मरी हुई मिली. उस वाकये के बाद काफी दिनों तक परेशान रहा. एसिड बर्न के मामले ऐसे ही होते हैं. पता नहीं कब मरीज हिम्मत हार जाए. खुद मुझे हिम्मत जुटानी होती है.

एसिड से जली लड़कियां पुरानी तस्वीर साथ लाती हैं. फूल सी नाजुक बच्चियां, हंसती हुई, चमकती आंखें... अब नाक की तरह दो कोटर हैं. आंखें नहीं हैं. चेहरा तितर-बितर है. रोती हैं तो आंसू नहीं, एसिड टपकता है.

हर ऐसा मामला मुझे भीतर से हिला देता है. इन मरीजों को ठीक होने में सालभर भी लग जाता है. कई बार ज्यादा भी. ऐसे में ठंडे-सफेद कमरे वाले अस्पताल में रहना रोज उस जलने को जीने जैसा है. यही सोचकर मैंने जंगल और पानी के बीच ही अस्पताल बनाया. मरीज के तीमारदार और खुद मरीज भी जंगल में घूमे, पानी में नहाए और अपना खाना पकाए. ऐसा माहौल होता है माने छुट्टियां मनाने पहाड़ पर आए हों.



गरीबों का मुफ्त इलाज करता हूं तो अमीर बड़े परेशान होते हैं. छोटे-मोटे जख्म लेकर इलाज के लिए आ जाते है. खुद को गरीब बताते हैं. चेहरा देखकर झूठ पढ़ लेता हूं लेकिन इलाज करता हूं. इस लूट-खसोट की वजह से थोड़ा ज्यादा गरीब हो गया हूं. तसल्ली इतनी ही है कि साल में दो बार अमेरिकी डॉक्टर भी मदद के लिए आते हैं. खुद का प्लेन है लेकिन शानदार बिजनेस पर ताला डालकर यहां कच्चे -पक्के मकानों में रहते हैं. इलाज करते हैं. वे जब मुश्किलें झेल सकते हैं तो मैं तो इसी मिट्टी की पैदाइश हूं.

शादी के शुरुआती सालों में बीवी नाराज रही. कहती- डॉक्टर से शादी करके मैं गरीब हो गई. उसे ज्यादा कुछ तो नहीं, लेकिन थोड़ी आरामतलब जिंदगी चाहिए थी.

कार, बंगला, पति का वक्त और बढ़िया खाना. पति जंगल में रहने को कहता और इलाज के वक्त चाकू-छुरियां उबालने बोलता. पिता घर का किराया और महीने का राशन भेजते. उसका गुस्सा जायज था. लेकिन मेरी जिद भी गलत नहीं थी. धीरे-धीरे सबको आदत पड़ गई.

82 बरस का हूं. एक ही जगह खड़ा होकर लगातार 7-8 घंटे की सर्जरी कर लेता हूं. नजरें और ऊंगलियां अब भी जवान हैं.

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