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#HumanStory: पुलवामा हमलावर के भाई ने बताया, कैसे बन गया आतंकी

#HumanStory: पुलवामा हमलावर के भाई ने बताया, कैसे बन गया आतंकी

40 शहीदों के शव के साथ एक लाश भी शामिल थी. आदिल! वो मानव बम, जो 90 के दशक के बाद वादी में सेना पर सबसे भयावह आतंकी हमले का हिस्सा बना.

(14 फरवरी. सीआरपीएफ के जवान श्रीनगर जा रहे थे. जगह- एनएच 44. वक्त- दोपहर का सवा तीन. तरतीबवार चलती गाड़ियों के बीच एक स्कॉर्पियो तेजी से काफिले की तरफ बढ़ी और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाए, सेना की एक बस से टकरा गई. दहला देने वाला धमाका, खून, चीथड़े, चीख-पुकार...! 40 शहीदों के शव के साथ एक लाश भी शामिल थी. आदिल! वो मानव बम, जो 90 के दशक के बाद वादी में सेना पर सबसे भयावह आतंकी हमले का हिस्सा बना.  फ़रूख अहमद डार, आदिल का भाई, उस वक्त को याद करता है जब उसका भाई बच्चा था, पढ़ने और सपने देखने का शौकीन. Coordination: क़य्यूम ख़ान, न्यूज18, श्रीनगर) 

आदिल जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा हुआ था, वो संगठन जो मजहब या आजादी के नाम पर लोगों की जान लेता है. दुनिया इसी आदिल को जानती है लेकिन हमने इस आदिल को कभी नहीं देखा. मैंने देखा है उस पढ़ाकू आदिल को, जो डॉक्टर का सफेद कोट पहनना चाहता था. स्कूल से लौटने के बाद मन लगाकर पढ़ता. मैं उस आदिल को भी देखता जो अम्मी की एक आवाज पर दौड़-दौड़कर घर के काम में हाथ बंटाता था. छुट्टी के रोज अब्बू के साथ फेरी लगाता.

उसका सपना था कि वो डॉक्टर बने. लगभग 17 मिनट की बातचीत में फ़रूख कई बार दोहराते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर


डॉक्टर होने का सपना मानव बम बनने तक कैसे पहुंचा!
ये है दक्षिणी कश्मीर का गुंडीबाग गांव. आदिल का गांव. जिस दुनिया में आदिल पला-बढ़ा, वो आम बच्चों का संसार नहीं.  वहां का आसमान आतिशबाजी नहीं, गोले-बारूद से रोशन होता है. वहां की जमीन खून की सुर्खी लिए हुए है. वहां बच्चे घरों से बाहर खेलने वाले खेल नहीं जानते. इसी बचपन के साथ बड़ा हुआ आदिल. पिता फेरीवाले थे. साइकिल पर घूमते हुए मौसमी कपड़े बेचा करते. नन्हा आदिल कभी पिता की मदद करता, कभी अम्मी की. घर के बाहर आए-दिन कश्मीरियों, आतंकियों और सेना के बीच मुठभेड़ होती. आदिल ने इससे अलग एक दुनिया बना ली थी, जिसमें वो खुद को डॉक्टर बना देखा करता.

वक्त के साथ बाहरी दुनिया उसकी इस दुनिया से टकराने लगी थी.

फरूख़ ने बताया, कि एक रोज आदिल से भी पूछताछ हुई. तब तो आदिल घर लौट आया लेकिन फिर ऐसा अक्सर होने लगा. एक रोज घर लौटा तो देर तक कमरे से बाहर नहीं आया. अम्मी की मदद को भी नहीं. खाने के लिए भी नहीं.
जब बाहर निकला तो उसकी आंखें सूजी हुई थीं. बाद में हमें पता चला कि उस रोज क्या हुआ था.

आदिल अहमद डार


डॉक्टरी पढ़ने के ख्वाब देखने वाला आदिल उस रोज कहीं खो-सा गया. अब जो आदिल था, वो गुस्से से भरा रहता. कभी एकदम गुमसुम हो जाता. कभी कश्मीरियों को हो रही तकलीफों की बात करने लगा. पहले वो इन मसलों पर कभी नहीं बोला था. हमें लगा गर्म खून है, संभल जाएगा. तब आदिल 18 बरस के आसपास था. अब वो अब्बू के साथ फेरी में नहीं जाता, कभी-कभार स्कूल जाता. मस्जिद अलबत्ते नियम से जाने लगा और युवाओं को प्यार में न पड़ने की हिदायत देने लगा.

कश्मीरी युवाओं से अपने आखिरी पैगाम में भी उसने कहा था- 'don't fall in love'.

मार्च 2018. आदिल 12वीं का इम्तिहान देने के लिए घर से निकला था. जाते वक्त और दिनों से अलग अम्मी से बेहद मुलायमियत से मिला, बहनों से बात की, मेरा हाथ पकड़ा. अब्बू को देखा. हमें लगा, गुस्सा ठंडा हो रहा है, पुराना आदिल जल्द लौटेगा. वो आखिरी दफा हमने उसे देखा था. इम्तिहान के बाद वो नहीं लौटा. आसपास फोन किया. खोज-ढूंढ की, वो नहीं मिला. लगा कि किसी रिश्तेदार के यहां गया होगा. तीन दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई. पुलिस के पास फोटो दी. हमारा आदिल गुमशुदा था.

घाटी में आमतौर पर लड़के के खोने के 'कई' मतलब नहीं होते. गुमशुदा की तलाश में पुलिस हमारे घर भी आई.

फोटो क्रेडिट- क़य्यूब ख़ान


तकरीबन महीनेभर बाद सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हुई. आदिल जैश-ए-मोहम्मद में शामिल हो चुका था.

उसका नया नाम था वकस कमांडो. हाथ में AK 47 थी. आदिल मिल चुका था लेकिन हमने अपने भाई को हमेशा के लिए खो दिया था. फिर तो घर पर दबिश दी जाने लगी. सुराग खोजने में पूरा सामान तितर-बितर कर दिया जाता. पूछताछ होती. हम वो सब बताते, जो हम जानते थे- कुछ न जानना. इसके बाद सेना और पुलिस को कई बार आदिल की भनक मिली.

पुलिस रिकॉर्ड में वो 'C' श्रेणी का आतंकी था. यानी ऐसा आतंकी, जिससे खौफ की कोई खास वजह नहीं थी. अम्मी दस्तरख्वान बिछाते हुए रोती. अब्बा और ज्यादा गुम रहने लगे थे. कहीं न कहीं हम जानते थे कि हमारा आदिल अब कभी नहीं लौटेगा. इंतजार था तो बस उस दिन का, जब ये बात पक्की हो जाए.
फरुख़ ने कहा कि उसका खून गर्म था किसी को अंदाजा भी नहीं था कि वो इतना बड़ा कदम उठाएगा. 14 फरवरी को हमने जो जाना, हम उस आदिल से कभी मिले ही नहीं थे.

फाइल फोटो


मैंने अपना भाई खोया है. अम्मी बेजान पड़ी रहती है. आदिल के साथ-साथ हम उन लोगों को भी सोचते हैं जो उस रोज मारे गए. कितने बच्चे यतीम हो गए. कितनों की औलाद गई. कितनी औरतें बेवा हो गईं. क्या गुजरती होगी उनपर! हमने भी बेटा खोया है, उनका दर्द समझ पाते हैं.

कश्मीरी और खूनखराबा नहीं चाहते.

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(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human story पर क्लिक करें.)

Tags: CRPF, Human story, Indian army, Jammu and kashmir, Jammu kashmir, Pakistan, Pulwama, Pulwama attack, Surgical strike by indian army in LOC

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