लाइव टीवी

#HumanStory: मुस्लिम झंडा कारोबारी का कबूलनामा- नाम सुनकर लोग झंडा लेने से कतराते हैं

News18Hindi
Updated: January 27, 2020, 9:53 AM IST
#HumanStory: मुस्लिम झंडा कारोबारी का कबूलनामा- नाम सुनकर लोग झंडा लेने से कतराते हैं
दिल्ली के सदर में ये 50 सालों से झंडे का कारोबार कर रहे हैं (प्रतीकात्मक फोटो)

70 बरस के अब्दुल्लाह देश का झंडा तैयार करते हैं. इस काम में तकरीबन 50 साल खर्च चुके बड़े मियां कहते हैं- मेरे ज्यादातर दोस्त गैरमजहब से हैं. पेशे में जब भी बड़ा घाटा हुआ, उन्होंने अपने कंधे जोड़कर भरा. अब माहौल में अजब-सी बू है. बम फटे या रसोई में दावत पके- लोग शक की निगाह से देखते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 27, 2020, 9:53 AM IST
  • Share this:
किसी शहर को शहर बनाने में रिहाइशी इलाके जितने खास होते हैं, उतने ही खास होते हैं बाजार. फल-सब्जी, रोटी-मिठाई से लेकर इत्र-फुलेल या गाड़ियों-इमारतों को बनाने वाले बाजार. दिल्ली का सदर बाजार  (sadar bazaar, delhi) ऐसा ही एक इलाका है. वक्त के साथ भी अपने तमाम पुरानेपन को सहेजे हुए. इसी पुरानेपन का एक हिस्सा हैं अब्दुल्ला (पहचान बदली हुई ), जो लगभग 50 सालों से झंडे का कारोबार कर रहे हैं.

सन 52 की पैदाइश अब्दुल्ला ने आजाद मुल्क के तमाम उतार-चढ़ाव देखे हैं.

एक के बढ़कर एक लजीज दास्तानों से भरे अब्दुल्ला बताते हैं- वालिद कपड़ों का कारोबार करते थे. मैंने चुनावी झंडे बनाने से शुरुआत की. पहली ही रोज सीधे 100 रुपए कमाकर घर लौटा तो सबकी आंखें चौकोर हो गई थीं. उसके बाद से कारोबार के मेरे फैसले पर किसी ने एतराज नहीं जताया.

साल 76 की बात होगी

इमरजेंसी लगी थी. चौराहों पर 4 आदमी खड़े दिखे तो सरकारी कान खड़े हो जाया करते. बाजार के लिए भी आदेश था कि हर दुकान पर राष्ट्रीय झंडे के बाजू में संजय गांधी की तस्वीर लगे. जैसे जलजला आया हो. खूब चहल-पहल वाले बाजारों से भी रौनक गुम थी. सन्नाटा पसरा रहता था लेकिन मेरे पेशे की तब खूब बरकत हुई. ढेरों-ढेर झंडों का ऑर्डर आया करता.

आवाज में हल्के गुरूर के साथ वे बताते हैं- काम करने वाले लड़के खोज-खोजकर हमारे पास पहुंचते. हम भी किसी को लौटाते नहीं थे. खासकर चुनावों के मौसम में रात-दिन काम चलता.

पैकिंग के समय बड़ी एहतियात रखते. किसी भी झंडे में जरा कोंच (खरोंच) न लग जाए (प्रतीकात्मक फोटो)
दोपहरों में घर से खाना आता तो मालिक-कामगार साथ मिलकर खाते थे. फिर राष्ट्रीय झंडे बनाने का काम ज्यादा करने लगा. अच्छा लगता था. हमारे हाथों से निकलकर झंडा किसी ऊंची इमारत की शान बनेगा. पैकिंग के समय बड़ी एहतियात रखते हैं. किसी भी झंडे में जरा कोंच (खरोंच) न आने पाए. मुल्क की पहचान शान से लहराए.

हर दिन एक-सा नहीं होता. अंग्रेजी हुकूमत के इकबाल की तरह हमारा भी काम नीचे लुढ़का.

एक बार एक बड़ा ऑर्डर आया था. तब उसी गुरबत से जैसे-तैसे निकला था. कारोबार में लगाने को पैसे नहीं थे. एक हिंदू दोस्त (तब हम उन्हें खालिस दोस्त ही कहा-माना करते थे) अनिल शर्मा ने काफी मदद की थी. बिना ब्याज के पैसे दिए. सबसे बड़ी बात कि बिना लिखापढ़ी के दिए. उन्हें डर था कि लिखापढ़ी हो जाए और मैं चुका न सकूं तो तो आने वाली पीढ़ियां खून-खच्चर करेंगी.

नाम के कारण शक 
वक्त बदला. आज भी अक्टूबर 2005 की वो शाम याद है. दिल्ली में एक के बाद एक सीरियल ब्लास्ट हुए. फिर तो अगले कई हफ्तों तक जो भी मिला, सबकी आंखों की कोरों में या तो शक था या सवाल. सब बिना पूछे मानो पूछते हों- ये काम किसका है! कुछ तो कहो. थोड़ा तो अंदाजा होगा.

मैं भी किन-किनसे कहूं- मियां, मेरा नाम अब्दुल्ला है, इसका मतलब ये नहीं कि मैं उनमें से एक हूं. ये मुल्क, यहां के बाशिंदे मुझे भी उतने ही अजीज हैं. मैं भी तुम-सा ही गमजदा हूं.

लंबे वक्त से साथ काम कर रहे कई कारोबारियों ने तब मिलकर काम करने से इन्कार कर दिया था. दबी जुबान से वे कहते- मुस्लिम नाम सुनने पर बाजार में कई जगह रुकावट आती है. लोग यकीन नहीं कर पाते.

तब दोबारा काम में बड़ा नुकसान हुआ था लेकिन वो नुकसान दिल के जख्मों से गहरा नहीं था.

झंडा बनाना हमारा कारोबार ही नहीं, हमारी इबादत भी है (प्रतीकात्मक फोटो)


मुस्लिम हूं इसलिए झंडा नहीं लेते
थोक का कारोबार करने वाले अब्दुल्ला रिटेल में भी काम करते हैं. झंडों की बिक्री करते हुए अलग-अलग तरह से लोगों से साबका पड़ता है. ऐसा ही एक वाकया याद करते हुए वे बताते हैं- आजादी और गणतंत्र पर लोग खूब झंडे लेने आते हैं. कई बार अपने पेरेंट्स के साथ बच्चे भी होते हैं. ऐसा ही एक परिवार दुकान के सामने से गुजर रहा था. बच्चे ने झंडा लेने की जिद की. उसके साथ के बड़े दुकान में घुसते हुए एकाएक ठिठक गए. शायद उन्होंने दुकान का नाम पढ़ लिया था. वे वापस लौट गए और पास की एक दुकान से झंडे लिए. मैं शटर के पास ही खड़ा था. सारा माजरा समझ रहा था. उस रोज मेरा किसी काम में मन नहीं लगा. मन करता था बच्चों के मां-बाप को बुलाकर पूछूं- क्या हम हमवतन नहीं! लेकिन उम्र और बिजनेस के तकाजे ने मुझे रोक दिया.

झंडा बनाना हमारा कारोबार ही नहीं, इबादत भी है. वंदे मातरम कहें या मादरे वतन, बात तो एक ही रहेगी.

संजीदगी से बात करते अब्दुल्ला एकाएक चिड़चिड़ी आवाज में कहते हैं- अब बताइए, मुझसे इंटरव्यू भी इसीलिए हो रहा है क्योंकि मैं मुसलमान हूं. और झंडे का कारोबार करता हूं. दरअसल सारा माहौल पार्टियों और आप लोगों की मीडिया ने खराब कर रखा है. वही बदगुमानी कर रहे हैं.

उन्हीं की मेहरबानी है कि अब हमारे यहां दावतों में गोश्त पकता है तो लोग भौंहें टेढ़ी कर लेते हैं.

(नोट- गणतंत्र दिवस के मौके पर ये कहानी दोबारा दी जा रही है.)

और पढ़ने के लिए क्लिक करें-

#HumanStory: 'अब्बू यहीं जन्मे, औलादें यहीं पलीं, अब बुढ़ापे में अपना मुल्क छोड़ कहां जाऊं!'

#HumanStory: 70 की उम्र में जंगल में लकड़ियां काटा करती, आज इटली में सजी है इनकी पेंटिंग

#HumanStory: वो शख्स जो 'ऑर्डर' पर लिखता है इज़हार-ए-मोहब्बत के ख़त

#HumanStory: क्या होता है पाकिस्तानी जेल में हिंदुस्तानी के साथ, पढ़ें, वहां से लौटे जासूस को

#HumanStory: भाड़े पर रोनेवाली की दास्तां- दिनभर रोने के मिलते 50 रुपये

#HumanStory: सेक्सोलॉजिस्ट का क़बूलनामा: पहचान छिपाने को मरीज हेलमेट पहन आते और मर्ज़ बताते हैं

#HumanStory: 'लैट्रिन' साफ करने पर 2 बासी रोटियां और महीने के 5 रुपए मिलते

#HumanStory: लोग समझाते- लड़का गे होगा, तभी वर्जिनिटी जांचने से कतरा रहा है

#HumanStory: गटर साफ करते हुए कभी पैरों पर कनखजूरे रेंगते हैं तो कभी कांच चुभता है 

#HumanStory: दास्तां स्पर्म डोनर की- ‘जेबखर्च के लिए की शुरुआत, बच्चे देखकर सोचता हूं, क्या मेरे होंगे ये?’ 

#HumanStory: कहानी उस गांव की, जहां पानी के लिए मर्द करते हैं कई शादियां

#HumanStory: क्या होता है जेल की सलाखों के पीछे, रिटायर्ड जेल अधीक्षक की आपबीती

#HumanStory: सूखे ने मेरी बेटी की जान ले ली, सुसाइड नोट में लिखा- खेत मत बेचना 

#HumanStory: एक साथ 11 मौतों के बाद ये है 'बुराड़ी के उस घर' का हाल, मुफ्त में रहने से भी डरते हैं लोग

#HumanStory: अब्बू की उम्र का शौहर मिला, पिटने और साथ सोने में कोई फर्क नहीं था

#HumanStory: नशेड़ी का कुबूलनामा: सामने दोस्तों की लाशें थीं और मैं उनकी जेब से पैसे चुरा रहा था

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए human story पर  क्लिक करें.) 

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए ह्यूमन स्‍टोरी से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 26, 2020, 10:51 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर