#HumanStory: NRC में बता दिया बांग्लादेशी, अब डिटेंशन कैंप में कैद है 50 बरस की ‘विदेशी मां’!

सलामत अली की मां जौन निसा (jonn nisa) 2 साल से ज्यादा वक्त से नजरबंदी में है (प्रतीकात्मक फोटो)

सलामत अली की मां जौन निसा (jonn nisa) 2 साल से ज्यादा वक्त से नजरबंदी में है (प्रतीकात्मक फोटो)

मां का पूरा खानदान हिंदुस्तानी (Indian) है. मां-बाप से लेकर भाई-बहन और शौहर से लेकर हम बच्चे तक. बस मां ही बांग्लादेशी (Bangladeshi ) है. शायद वो जमीन फाड़कर निकली थी! एक रोज पुलिस (police) उठाकर ले गई और डिटेंशन कैंप (detention camp) में छोड़ दिया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 20, 2019, 10:00 AM IST
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कहानी शुरू होती है साल 1979 से. उस साल असम के एक चुनाव (election) में वोटरों की संख्या काफी ज्यादा थी. जांच हुई तो बांग्लादेशी 'घुसपैठी' वजह बताए गए. भड़के हुए असमिया समुदाय ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया. दोनों ओर से कत्लेआम मचा. सैकड़ों जानें गईं. तब 1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने असम समझौता (Assam Accord) किया. इसके तहत साल 1971 के बाद असम में आए लोग बाहरी माने गए. अब नई समय सीमा लागू हो गई है. मूल निवासी इसे 'हकछिनौती' बता रहे हैं. इधर कागज-पत्तरों की उलझन में 'घुसपैठी' अलग भड़के हुए हैं.

आंकड़ों के इस ठंडेपन या दिल्ली-लखनऊ की रैलियों से परे एक और कहानी भी है- उन परिवारों की जिनमें कहीं मां विदेशी है तो कहीं बच्चे. पढ़ें, सलामत अली की कहानी, जिनकी मां जौन निसा (jonn nisa) 2 साल से ज्यादा वक्त से नजरबंदी में है.

वो कहते हैं- मेरे नानू हिंदुस्तानी मरे, नानी हिंदुस्तानी मरीं. अब मां को बाहरी मुल्क का बता रहे हैं.



25 साल के सलामत जब ये कहते हैं तो उनकी आवाज की खराश साफ सुनाई देती है. ये खराश ठंडे मौसम की वजह से नहीं, बल्कि मां की नामौजूदगी की वजह से है. गुवाहाटी से तकरीबन 90 किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गांव है नगरबेड़ा (Nagarbera).

सलामत और उनकी मां इसी शांत गांव के बाशिंदे थे (प्रतीकात्मक फोटो)

सलामत और उनकी मां इसी शांत गांव के बाशिंदे थे. खेती के मौसम में खेती करते. बाकी मौसमों में आने वाले साल की तैयारी करते. ढर्रे पर चलती जिंदगी में एकाएक उथल-पुथल मची, जब एनआरसी (NRC) की जांच में मां जौन निसा को नोटिस मिला.

वो याद करते हैं- बॉर्डर पुलिस एक FIR लेकर आई. उसपर मां के पिता का नाम जैनल हक था. मां के पास जो कागज थे, उसपर पिता का नाम जैनल अली था. दरअसल जैनल अली ही असल नाम है.

लेकिन कागज दलीलें नहीं सुनते, वो तो कागजों की ही बोली सुनते हैं.

मां के हाथों की छाप ली गई. फोटो खींची गई. और नए कागज पर वो विदेशी हो गईं. मेरी मां, जिसकी पैदाइश यहीं की है, जिसका बचपन और फिर जचपन भी यहीं बीता, वो 50 साल की उम्र में विदेशी हो गई.

एक रोज पुलिस आई और रोती हुई मां को पकड़कर ले गई. हम रो रहे थे. मेरे बच्चे अपनी दादी का पल्लू खींच रहे थे. लेकिन ले जाने वालों ने इतना भी वक्त नहीं दिया कि मां अपने कपड़े ठीक से रख सके. या फिर अपने परिवार से मिल सके.

जांच में मां जौन निसा को नोटिस मिला (प्रतीकात्मक फोटो)

मां को कोकराझाड़ (kokrajhar) कैंप में ले जाया गया. घर से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर. वो गर्मी का वक्त था. मैं पसीना सुखाने पंखे में बैठता तो मां याद आती. वहां एस्बेस्टस की छत के नीचे मां कैसे रहती होगी! मां से मिलने पहुंचा. कागजी कार्रवाई हुई. अपनी ही मां, जिसका मैं पेटजाया हूं, उससे मिलने के लिए ऐसे कागज बने, जैसे मैं किसी खूंखार कैदी से मिल रहा हूं.

पहली मुलाकात में मां फूटकर रो पड़ी. धीरे-धीरे रोना शिकायतों में बदलने लगा कि कैसा खाना मिलता है, कितनी तंग जगह में सोना होता है. फिर शिकायतें भी खत्म हो गईं. अब जब मिलता हूं, मां सूनी आंखों से देखती है जैसे भूलने लगी हो. या फिर जो चल रहा है, उसपर राजी हो चुकी हो.

पता नहीं, मां के दिल में क्या है! सलामत की टूटती हुई सी आवाज फोन-पार से आती है.

खूब शौकीन थी. पकाने की भी और खाने की भी. बावर्चीखाने में पहुंचती तो पूरा पड़ोस महमहा जाता. सिर्फ घी में छौंक भी डाल देती तो अलग स्वाद आता था. अब वहां पनियल दाल के साथ अधपके या जले चावल खाने लगी है.

पहले-पहले मिलने पहुंचता तो शिकायतें की पोटली खोल देती थी. देख, ऐसा खाना मिलता है. देख, मुंह में छाले रहने लगे हैं. देख, एक कमरे में कितनी सारी औरतें सोती हैं. देख...

पहली मुलाकात में मां फूटकर रो पड़ी (प्रतीकात्मक फोटो)

अब कुछ नहीं कहती. कभी-कभार पूछ लेती है कि तीन साल कब बीतेंगे. या फिर जमानत की अर्जी कब लगेगी.

जैसे दीवार पार से आप दूसरे के घर का हाल नहीं जान पाते. बस आवाजें आती हैं. वैसे ही आपको भी हमारी हालत का कोई अंदाजा नहीं. कभी-कभार आवाज ऊंची हो, तो आप लोग चौंक जाते हैं. फोन कर लेते हैं, जैसे आजकल कर रहे हैं.

सर्द-सख्त आवाज में सलामत जैसे धिक्कार रहे हों.

लंबी चुप्पी के बाद सलामत कहते हैं- घर पर दिन-दोपहर रसोई और बच्चों में जुटी मां को तकलीफ है कि वहां करने को कुछ नहीं. बाहर थी. थकती तो गुस्से से बड़बड़ाती. अब हर वक्त उसी टिन की छत वाले हॉल में रहती है. बेकाम. उन्हीं 50-60 औरतों से कहती-सुनती है. और फिर ऊबकर सो रहती है.

एक ही बार मां ने हंसते हुए कहा था- यहां शाम के 6 बजे तक रात का खाना मिल जाता है और फिर सब बंद. यहां बड़ा आराम है.

खाने बैठता हूं तो हर दिन 'आराम' फरमाती मां का गिरता वजन याद आ जाता है. 

(Interview Coordination and interpretation- Azmal Haque, ex-army officer)

टीप- कहानी के लिए बातचीत के दौरान असम में इंटरनेट सेवा बंद रही इसलिए इंटरव्यू देने वाले की तस्वीरें नहीं मिल सकीं.

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